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“जाने के दिन उन्होंने खीर खाने की इच्छा जाहिर की। कृष्ण ने तत्काल खीर की थाल मँगवाई। उन्होंने थोड़ी–सी खीर खाने के बाद कृष्ण की ओर देखा, कहा–‘अपने कपड़े उतारो।’ बूढ़े कृष्ण थोड़ा सकुचाए, फिर कपड़े उतार दिये। ‘वह लँगोट भी।’ डाँटकर दुर्वासा ने कहा। ‘हाँ, ठीक! अब अपनी देह पर यह खीर पोतो। ध्यान रखना, कोई अंग छूटे नहीं।’ जब तक कृष्ण खड़े–खड़े खीर पोतते रहे, दुर्वासा सिर झुकाए बैठे रहे। जब सिर से लेकर अँगूठों तक खीर पुत चुकी, तब उन्होंने खाँसकर ऋषि को संकेत किया। दुर्वासा ने कहा–‘रुक्मिणी को बुलाओ।’ रुक्मिणी आई और नंग–धड़ंग सफेद कृष्ण को देखकर भय से सिहर उठी। ‘सब कपड़े उतारो!’ रुक्मिणी ने आभूषणों के साथ ही साड़ी, ब्लाउज, अँगिया, साया सब उतार दिया। दुर्वासा ने अपने हाथों से उसके पूरे शरीर पर खीर पोतकर कहा-’छकड़ा मँगाओ!’ शकट मँगवाया गया। दुर्वासा सामने से नौकरों-चाकरों को हटाते हुए छकड़े के पास पहुँचे, बैल की जगह रुक्मिणी के कन्धे पर जुआ रखा, चाबुक के साथ छकड़े पर बैठे और रुक्मिणी के कन्धे पर चाबुक मारते हुए चीखकर कहा-’दक्षिणद्वार पुष्पदन्त की ओर चलो!’ दक्षिणापथ के दोनों ओर द्वारकावासियों की अपार भीड़। बूढ़े, बच्चे, जवान, औरतें भी। आँखें फटीं। साँसे टँगी। छकड़े के पीछे दौड़ते-ठिठकते बूढ़े, को पहचान में न आने वाले सफेद द्वारकाधीश। बैल की जगह उसमें जुती अधेड़, खीर में नहाई, चाबुक की मार खाती, नंगी पटरानी रुक्मिणी। छकड़े को हाँकता यज्ञोपवीत पहने मरियल, हड्‌डियों का ढाँचा-दुर्वासा। रुक्मिणी से छकड़ा खिंच नहीं रहा था। सत्यभामा यादव थी, जाम्बवती आदिवासी थी। वे कर्मठ और मेहनती थीं। वे होतीं तो खींच ले जातीं, लेकिन रुक्मिणी क्षत्राणी थी। राजा की बेटी थी। न मायके में अपने हाथ से गिलास या कटोरा उठाया था, न द्वारका में। दोनों जगहें ऐसे कार्यों के लिए नौकर-चाकर थे। वह बीच-बीच में रोती हुई ठिठक जाती और फिर कन्धे या पीठ पर ‘सटाक्’। कृष्ण अपराधी की तरह कभी दौड़ते थे, कभी हाँफते थे, कभी चलने लगते थे। रास्ते भर उनका न कभी सिर उठा, न आँखें। द्वारका अपने ‘ईश्वर’ की ऐसी-तैसी होते देखती रही-अवाक् और असहाय। गाड़ीवान दुर्वासा ने पुष्पदन्त द्वार के पहले ही जंगल की ओर गाड़ी मोड़ दी। थोड़ी दूर जाकर दुर्वासा छकड़े से उतरे, रुक्मिणी के कन्धों से जुआ हटाया और कृष्ण के आने का इन्तजार किया। ‘कृष्ण! लौटोगे तो महल को वैसा ही पाओगे, जैसा मेरे आने से पहले था।’ दुर्वासा बोले- ‘तुमने खड़े-खड़े सारे बदन में खीर लगाई, तलवा वैसे ही रह गया था। तुम्हारी मृत्यु उसी तलवे में है। एक सामान्य आदमी जैसी मृत्यु। और रुक्मिणी। तुम्हारी देह से सुगन्ध आती रहेगी और सौन्दर्य”

काशीनाथ सिंह, Upsanhar
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Upsanhar (Hindi Edition) Upsanhar by Kashinath Singh
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