Mudrarakshasa of Visakhadatta Quotes

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Mudrarakshasa of Visakhadatta Mudrarakshasa of Visakhadatta by Viśākhadatta
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Mudrarakshasa of Visakhadatta Quotes Showing 1-7 of 7
“अरे! वही दुरात्मा या महात्मा कौटिल्य है! यह रत्नों के आकर समुद्र की भांति शास्त्रों का आगार है। हम इसके गुणों से ईर्ष्या करते हैं, प्रेम नहीं।”
Vishakdutt, Murdarakshas
“(रोते हुए) आर्य परदेश तो नहीं जा रहे, परलोक जा रहे हैं। अतः अब हम लौटकर क्या करेंगे? चंदनदास : आर्ये! ठीक है मेरा वध हो सकता है, पर मित्र के कार्य के कारण ही तो, फिर ऐसे हर्ष के अवसर पर भी रोती हो? कुटुम्बिनी : आर्य! यही बात है तो घरवाले क्यों लौट जाएँ? चन्दनदास : आर्ये! तो तुम्हारा क्या निश्चय है? कुटुम्बिनी : (रोकर) स्त्री को तो पति के चरणों का ही अनुगमन करना चाहिए। चंदनदास : आर्ये! यह दुराग्रह है। यह अबोध बच्चा है। इसपर तो दया करो। कुटुम्बिनी : कुलदेवता प्रसन्न होकर इस बालक की रक्षा करें। वत्स, आगे पिता नहीं रहेंगे! इनके चरणों को प्रणाम करो। पुत्र : (पांवों पर गिरकर) पिता! आप चले जाएंगे? अब मैं क्या करूं? चंदनदास : पुत्र! उस देश में चले जाना, जहां चाणक्य नहीं हो। चाण्डाल : आर्य चंदनदास, सूली गड़ चुकी है। सावधान हो जाओ! कुटुम्बिनी : आर्यो! रक्षा करो, रक्षा करो! चंदनदास : भद्र! क्षण-भर ठहरो। प्राणप्रिये, क्यों रोती हो? अब वे देव नन्द स्वर्ग चले गए जो नित्य स्त्रियों पर दया किया करते थे। एक चांडाल : अरे, वेणुवेत्रक! इस चन्दनदास को पकड़। घर के लोग अपने-आप लौट जाएंगे। दूसरा चांडाल : अरे, वज्रलोमक! अभी पकड़ता हूं। चंदनदास : भद्रमुख! एक क्षण और ठहर जाओ। मैं तनिक अपने पुत्र का आलिंगन कर लूं। (पुत्र से आलिंगन कर, स्नेह से उसका सिर सूंघकर) पुत्र! मृत्यु तो कभी न कभी वैसे भी होगी ही, इसलिए मैं मित्र का कार्य पूरा करते हुए इस समय मर रहा हूँ। पुत्र : तात, क्या यह हमारा कुल-परम्परा से आया धर्म है? (पैरों पर गिरता है।) दूसरा”
Vishakdutt, Murdarakshas
“मृत्यु की आशंका से मांस को छोड़कर केवल तिनकों पर जीने वाले भोले-भाले हिरन को मारने में ही शिकारी का विशेष हठ क्यों होता है!”
Vishakdutt, Murdarakshas
“जाने कितने ही शरीर पर अलंकार धारण करते हैं, पर क्या आभूषण-धारण से हर कोई स्वामी बनता है? तुम जैसे महिमावन्त वीर ही अपनी गरिमा से रहते हैं— जिनका शब्द न टले एक भी उनको जग स्वामी कहता है।”
Vishakdutt, Murdarakshas
“प्रसाद के प्रताप से”
Vishakdutt, Murdarakshas
“अट्टहास-निरत सदाशिव-सी शरद् ऋतु यह सुहानी, राजहंसों से सुशोभित, अब करे पीड़ा अजानी। दूर कर दे क्लेश ये सारे तुम्हारे रूपशालिनि! निर्मला कल्याण भर दे, सुख निरत भर दे सुहासिनि!”
Vishakdutt, Murdarakshas
“The ignorant rely on Providence they look to the stars for help instead of relying on themselves. Some artificiality creeps in: the hero is always the hero, the villain almost always acts villainously; there are few intermediate shades.”
Vishakhadatta, Mudrārākṣasa