Dhyan Sutra Quotes
Dhyan Sutra
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Dhyan Sutra Quotes
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“मंसूर मनुष्य के इतिहास में सबसे ज्यादा पीड़ा से मारा गया। पहले उसके पैर काट दिए। जब उसके पैरों से खून बहने लगा, तो उसने खून को लेकर अपने हाथों पर लगाया। भीड़ इकट्ठी थी, लोग पत्थर फेंक रहे थे। उन्होंने पूछा, ‘यह क्या कर रहे हो?’ उसने कहा, ‘वजू करता हूं।’ मुसलमान नमाज के पहले हाथ धोते हैं। उसने अपने खून से अपने हाथ धोए। उसने कहा, ‘वजू करता हूं।’ और उसने कहा, ‘याद रहे मंसूर का यह वचन कि जो प्रेम की वजू है असली, वह खून से की जाती है, पानी से नहीं की जाती। और जो अपने खून से वजू करता है, वही नमाज में प्रवेश करता है।’ लोग बहुत हैरान हुए कि पागल है। उसके पैर काट दिए गए, फिर उसके हाथ काट दिए गए। फिर उसकी उन्होंने आंखें फोड़ दीं। और एक लाख लोग इकट्ठे हैं और पत्थर मार रहे हैं और उसका एक-एक अंग काटा जा रहा है। और जब उसकी आंखें फोड़ दी गयीं, तब वह चिल्लाया कि ‘हे परमात्मा, स्मरण रखना। मंसूर जीत गया।’ लोगों ने पूछा, ‘क्या बात है? किस बात में जीत गए?’ उसने कहा, ‘परमात्मा को कह रहा हूं। परमात्मा स्मरण रखना, मंसूर जीत गया। मैं डरता था कि शायद इतनी शत्रुता में प्रेम कायम नहीं रह सकेगा। तो स्मरण रखना परमात्मा कि मंसूर जीत गया। प्रेम मेरा कायम है। इन्होंने जो मेरे साथ किया है, मेरे साथ नहीं कर पाए। इन्होंने जो मेरे साथ किया है, मेरे साथ नहीं कर पाए। प्रेम कायम है।’ और उसने कहा, ‘यही मेरी प्रार्थना है और यही मेरी इबादत है।’ मंसूर उस वक्त भी हंस रहा था, उस वक्त भी मस्त था। लोग मौत के सामने खुश रहे हैं और हंसते रहे हैं। और हम जिंदगी के सामने उदास और रोते हुए बैठे हैं। यह गलत है। कोई उदास रास्ते, कोई विषाद से भरा हुआ चित्त कोई बड़े अभियान नहीं कर सकता है। अभियान के लिए उत्फुल्लता, अभियान के लिए बड़े आनंद से भरा”
― ध्यान-सूत्र – Dhyan Sutra
― ध्यान-सूत्र – Dhyan Sutra
“Buried in the deepest stratum of his unconscious, at the wellspring of man’s existence, lies an immense psychological force. In pure form, it is experienced as a longing, the object of which is constantly receding from him as the horizons of his world widen throughout his growth. It begins with the infant’s amazing discovery that the breast which brings it comfort is not part of himself. From that moment, longing drives the human organism to relate himself to, to comprehend, in the deepest sense to love, that which lies beyond him. This longing can become attached to many kinds of objects and pursuits. But to know it in its purity, without any object, is to know life itself. This longing is God, and to be this longing, pure and simple, without any content, is meditation.”
― Dhyan Sutra
― Dhyan Sutra
“फल बाहर से नहीं आते हैं, फल भीतर पैदा होते हैं। हम जो करते हैं, उसी की रिसेप्टिविटी हमारे भीतर विकसित हो जाती है। जो प्रेम चाहता है, प्रेम को फैला दे। और जो आनंद चाहता है, वह आनंद को लुटा दे। और जो चाहता है, उसके घर पर फूलों की वर्षा हो जाए, वह दूसरों के आंगनों में फूल फेंक दे। और कोई रास्ता नहीं है। तो करुणा का एक भाव प्रत्येक को विकसित करना जरूरी है साधना में प्रवेश के लिए। तीसरी बात है, प्रमुदिता, उत्फुल्लता, प्रसन्नता, आनंद का एक बोध, विषाद का अभाव। हम सब विषाद से भरे हैं। हम सब उदास लोग, थके लोग हैं। हम सब हारे हुए, पराजित, रास्तों पर चलते हैं और समाप्त हो जाते हैं। हम ऐसे चलते हैं, जैसे आज ही मर गए हैं। हमारे चलने में कोई गति और प्राण नहीं है। हमारे उठने-बैठने में कोई प्राण नहीं है। हम सुस्त हैं, और उदास हैं, और टूटे हुए हैं, और हारे हुए हैं। यह गलत है। जीवन कितना ही छोटा हो, मौत कितनी ही निश्चित हो, जिसमें थोड़ी समझ है, वह उदास नहीं होगा।”
― ध्यान-सूत्र – Dhyan Sutra
― ध्यान-सूत्र – Dhyan Sutra
“नियमित चौबीस घंटे में यह स्मरण रखें कि एक-दो काम ऐसे जरूर करें, जिनके बदले में आपको कुछ भी नहीं लेना है। चौबीस”
― ध्यान-सूत्र – Dhyan Sutra
― ध्यान-सूत्र – Dhyan Sutra
“जब आप नदी के किनारे बैठे हों, तो नदी की तरफ प्रेम भेजिए। इसलिए नदी का नाम ले रहा हूं कि किसी आदमी की तरफ प्रेम भेजने में थोड़ी दिक्कत हो सकती है। एक दरख्त के प्रति प्रेम भेजिए। इसलिए दरख्त की बात कह रहा हूं कि एक आदमी की तरफ भेजने में थोड़ी कठिनाई हो सकती है। सबसे पहले प्रकृति की तरफ प्रेम भेजिए। प्रेम का बिंदु सबसे पहले प्रकृति की तरफ विकसित हो सकता है। क्यों? क्योंकि प्रकृति आप पर कोई चोट नहीं कर रही है।”
― ध्यान-सूत्र – Dhyan Sutra
― ध्यान-सूत्र – Dhyan Sutra
