भैरवी Quotes

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भैरवी भैरवी by Shivani
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भैरवी Quotes Showing 1-19 of 19
“आनन्दस्वरूपिणी, बुद्धिस्वरूपा, शक्ति ही है । आलोक और अन्धकार- वही रात्रि है और वही ऊषाकाल, वही है मृत्यु और सहस्र सुन्दरियों के रूप में मुस्काती वही है तारों की छटा, कुमारी का सौन्दर्य और सहचरी का साहचर्य! गुरु, देखना, सब याद है मुझे?” अनोखे गर्व से उल्लसित”
Shivani, भैरवी
“हम शौक्याणियों का स्वस्थ शरीर, हँसमुख चेहरों पर नित्य थिरकनेवाली हँसी देखकर ही परदेशी लोग सन्देह से भड़क उठते हैं । हमें इस हँसी के लिए क्या कुछ नदीं करना पड़ता? बुरा मत मानना, राजी बहन !” उसने हंसकर राजी के हाथ पकड़कर कहा था, “हमारे घर के मर्द, जब तीखी घाटियों में ऊन का व्यापार करने जान हथेली पर धरे घूमते हैं, तब क्या हम अपनी मस्ती में डूबी उन्हें भूल जाती हैं? दु:ख तो दो तरह से सहा जाता है ! एक चेहरा लटकाकर, मनहूसी में अपने को डुबाकर, और दूसरा हँस-खेलकर, किस्से-कहानी कह, कताई-बुनाई में अपने दु:ख को भुलाकर! किसी की हिम्मत है, जो हमारे ‘मिलन’ में बैठी तुम्हारी पुत्री को कोई बुरी नजर से देख ले? वह यदि मेरा रणधीर भी होगा तो मैं स्वयं उसकी आँखें निकाल लूँगी ।”
Shivani, भैरवी
“रस की स्वामिनी रसातल में खींच ले जाई गई । मिशनरी स्कूल में राजेश्वरी की अन्तरंग सखी थी-उससे भी अधिक लावण्यमंडिना एक किशोरी ।”
Shivani, भैरवी
“ऐसा ही भयावह अन्धकार श्मशान की निकटता, हिमशीलता देवालय की धरा पर पड़ते सहमे कदम, ओर शिवलिंग को आलोकित का रहे ऐसे ही घृतदीप की ज्योति को थामे पीतल के पानस में गढ़ी चन्द वंश के राजाओं के शिल्प को अमर करती दिव्य मूर्ति ।”
Shivani, भैरवी
“प्रकृति की वनस्थली में स्वेच्छा से विचरण करती यह चंचल तितली”
Shivani, भैरवी
“सांख्य पराप्रकृति सूर्यपूजक महारजनी, बौद्ध तारा, जैनी श्री, ब्रह्मज्ञानी स्वधा, वैदिक गायत्री और अज्ञानियों की मोहनी, वही हो तुम महामाया महाविद्या ।’ उधर माया दी की उस दिन क्या अपूर्व रूपछटा थी, काले छिटके केश, कपाल में चढ़ी आँख, ललितासन में बैठी देवी की मूर्ति-सी ही जगमगा रही थीं–कहने लगीं, “तुम्हीं मेरे शिव हो गोसाई, और मैं तुम्हारी शिव शक्ति”
Shivani, भैरवी
“आमलकी के गहन वन, हरीतकी की हरीतिमा, कहीं-कहीं अरण्यपाल से खड़े नारियल के रौबदार वृक्ष, और कहीं वेणुवनों के झुरझुट से बहती, खोखले बाँस के रन्ध्र को भेदती वंशी की-सी मीठी मुखरा बयार।”
Shivani, भैरवी
“मसान का उल्लेख करते ही उस कपालकुंडला का पूरा चेहरा बदल गया । रुक्ष स्वर अत्यन्त मधुर बनता कोमल गन्धार को छूने लगा ।”
Shivani, भैरवी
“गुरु थे सिद्धामृत मार्ग के अनुयायी । तृषाक्रान्ता सिद्धयोगिनी अमृत-वारुणी के स्वर्ग-कलश को दूर से ही निहार सकती थी, निकट आकर स्पर्श कर भी लेती तो स्वामी के तेज से भस्मीभूत हो जाती”
Shivani, भैरवी
“कभी सुर-सुन्दरी नायिका और कभी पार्वती मातृ-स्वरूपा गौरी। यही तो है सिद्धयोगिनी की तान्त्रिक विजय”
Shivani, भैरवी
“सिद्धयोगिनी है, आँखों ही के भाले से सबको छेदकर रख सकती है”
Shivani, भैरवी
“लाल डोरीदार रसीली आँखों का!”
Shivani, भैरवी
“अर्द्ध चेतना से यथार्थ के धरातल पर खींच लाया”
Shivani, भैरवी
“एक लम्बी अवधि से, भीतर ही भीतर घोटी गई वेदना का उफान, अब उसके मौन को ठेलकर उफनता स्वयं ही बाहर गिरता जा रहा था ।”
Shivani, भैरवी
“मरद का मन, चाहे वह लाख साधे, औकात में होता है एकदम देसी कुता! सामने हड्‌डी रख दो, तो कितना ही सिखाया-पढ़ाया हो, कभी लार टपकाए बिना रह सकता है”
Shivani, भैरवी
“संसार की कौन माँ भला अपने पुत्र की प्रशंसा नहीं करती? अपना बच्चा तो बँदरिया को भी विधाता की सर्वश्रेष्ठ कृति लगता है”
Shivani, भैरवी
“जात का बछड़ा औकात का घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा-थोड़ा!”
Shivani, भैरवी
“आत्मसम्मान किसी कायर मित्र की ही भाँति दुबककर अदृश्य हो गया था”
Shivani, भैरवी
“उसने आँख बन्द कर लीं, पर कब तक वास्तविकता से ऐसे आंखें मूँदे अचेत पड़ी रहेगी?”
Shivani, भैरवी