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Shivani

“हम शौक्याणियों का स्वस्थ शरीर, हँसमुख चेहरों पर नित्य थिरकनेवाली हँसी देखकर ही परदेशी लोग सन्देह से भड़क उठते हैं । हमें इस हँसी के लिए क्या कुछ नदीं करना पड़ता? बुरा मत मानना, राजी बहन !” उसने हंसकर राजी के हाथ पकड़कर कहा था, “हमारे घर के मर्द, जब तीखी घाटियों में ऊन का व्यापार करने जान हथेली पर धरे घूमते हैं, तब क्या हम अपनी मस्ती में डूबी उन्हें भूल जाती हैं? दु:ख तो दो तरह से सहा जाता है ! एक चेहरा लटकाकर, मनहूसी में अपने को डुबाकर, और दूसरा हँस-खेलकर, किस्से-कहानी कह, कताई-बुनाई में अपने दु:ख को भुलाकर! किसी की हिम्मत है, जो हमारे ‘मिलन’ में बैठी तुम्हारी पुत्री को कोई बुरी नजर से देख ले? वह यदि मेरा रणधीर भी होगा तो मैं स्वयं उसकी आँखें निकाल लूँगी ।”

Shivani, भैरवी
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भैरवी भैरवी by Shivani
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