उर्वशी Quotes

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उर्वशी उर्वशी by Ramdhari Singh 'Dinkar'
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उर्वशी Quotes Showing 1-30 of 80
“एक मूर्ति में सिमट गईं किस भाँति सिद्धियाँ सारी?
कब था ज्ञात मुझे, इतनी सुन्दर होती है नारी?”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“वक्ष के इस तल्प पर सोती न केवल देह, मेरे व्यग्र, व्याकुल प्राण भी विश्राम पाते हैं।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“हम भी हैं मानवी कि ज्यों ही प्रेम उगे, रुक जाएँ,
मिले जहाँ भी दान हृदय का, वहीं मग्न झुक जाएँ?
प्रेम मानवी की निधि है, अपनी तो वह क्रीड़ा है;
प्रेम हमारा स्वाद, मानवी की आकुल पीड़ा है।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“पृथ्वी पर है चाह प्रेम को स्पर्श-मुक्त करने की,”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“संघर्षों से श्रमित-श्रान्त हो पुरुष खोजता विह्वल सिर धरकर सोने को, क्षण भर, नारी का वक्षस्थल। आँखों में जब अश्रु उमड़ते, पुरुष चाहता चुम्बन, और विपद् में रमणी के अंगों का गाढ़ालिंगन।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“श्रुतिपुट पर उत्तप्त श्वास का स्पर्श और अधरों पर, रसना की गुदगुदी, अदीपित निश के अँधियाले में रस-माती, भटकती उँगलियों का संचरण त्वचा पर; इस निगूढ़ कूजन का आशय बुद्धि समझ सकती है?”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“चित्र और प्रतिमा, इनमें जो जीवन लहराता है, वह सूझों से नहीं, पत्र-पाषाणों में आया है, कलाकार के अन्तर के हिलकोरे हुए रुधिर से। क्या”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“मैं दो विटपों के बीच मग्न नन्हीं लतिका-सी सो जाऊँ, छोटी तरंग-सी टूट उरस्थल के महीध्र पर खो जाऊँ। आ”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“किल्बिष के मल का लेश नहीं, यह शिखा शुभ्र पावक केवल, जो किए जा रहा तुझे दग्ध कर क्षण-क्षण और अधिक उज्ज्वल।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“जब तक भीतर यह वैश्वानर। जब तक यह पावक शेष, तभी तक सखा-मित्र त्रिभुवन तेरा,”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“प्राण की चिर-संगिनी यह वह्नि, इसको साथ लेकर भूमि से आकाश तक चलते रहो। मर्त्य नर का भाग्य! जब तक प्रेम की धारा न मिलती, आप अपनी आग में जलते रहो। एक ही आशा, मरुस्थल की तपन में ओ सजल कादम्बिनी! सिर पर तुम्हारी छाँह है।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है, सिंह से बाँहें मिलाकर खेल सकता है, फूल के आगे वही असहाय हो जाता, शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“यह शिला-सा वक्ष, ये चट्टान-सी मेरी भुजाएँ, सूर्य के आलोक से दीपित, समुन्नत भाल, मेरे प्राण का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है। सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं, काँपता है कुंडली मारे समय का व्याल, मेरी बाँह में मारुत, गरुड़, गजराज का बल है। मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं, उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूँ मैं। अन्ध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ, बादलों के सीस पर स्यन्दन चलाता हूँ।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“टूटता तोड़े नहीं यह किसलयों का दाम, फूलों की लड़ी जो बँध गई, खुलती नहीं है। कामनाओं के झकोरे रोकते हैं राह मेरी, खींच लेती है तृषा पीछे पकड़कर बाँह मेरी। सिन्धु–सा उद्दाम, अपरम्पार मेरा बल कहाँ है?”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“कहाँ, किस लोक में हूँ? कौन है यह वन सघन हरियालियों का, झूमते फूलों, लचकती डालियों को? कौन है यह देश जिसकी स्वामिनी मुझको निरन्तर वारुणी की धार से नहला रही है?”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“चूमता हूँ दूब को, जल को, प्रसूनों, पल्लवों को, वल्लरी की बाँह भर उर से लगाता हूँ; बालकों-सा मैं तुम्हारे वक्ष में मुँह को छिपाकर नींद की निस्तब्धता में डूब जाता हूँ। नींद जल का स्रोत है, छाया सघन है, नींद श्यामल मेघ है, शीतल पवन है। किन्तु, जगकर देखता हूँ, कामनाएँ वर्त्तिका–सी बल रही हैं, जिस तरह पहले पिपासा से विकल थीं,”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“स्वर्णवर्णा वल्लरी में फूल-से खिलते हुए मुख,”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“याद आता है मदिर उल्लास में फूला हुआ वन,”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“हम वही जग हैं, जहाँ पर फूल खिलते हैं। दूब है शय्या हमारे देवता की, पुष्प के वे कुंज मन्दिर हैं जहाँ शीतल, हरित, एकान्त मंडप में प्रकृति के कंटकित युवती-युवक स्वच्छन्द मिलते हैं।’’ “इन कपोलों की ललाई देखते हो? और अधरों की हँसी यह कुन्द-सी, जूही-कली-सी? गौर चम्पक–यष्टि–सी यह देह श्लथ पुष्पाभरण से, स्वर्ण की प्रतिमा कला के स्वप्न–साँचे में ढली–सी?’’ “यह तुम्हारी कल्पना है, प्यार कर लो। रूपसी नारी प्रकृति का चित्र है सबसे मनोहर। ओ गगनचारी! यहाँ मधुमास छाया है। भूमि पर उतरो,”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“कोई सत्य हो तो, चाहता हूँ, भेद उसका जान लूँ। पथ हो सौन्दर्य की आराधना का व्योम में यदि शून्य की उस रेख को पहचान लूँ। पर, जहाँ तक भी उड़ूँ, इस प्रश्न का उत्तर नहीं है। मृत्ति महदाकाश में ठहरे कहाँ पर? शून्य है सब। और नीचे भी नहीं सन्तोष, मिट्टी के हृदय से दूर होता ही कभी अम्बर नहीं है।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“दृष्टि का जो पेय है, वह रक्त का भोजन नहीं है। रूप की आराधना का मार्ग आलिंगन नहीं है।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“मुझ को शान्ति से जीने न देती। हर घड़ी कहती, उठो, इस चन्द्रमा को हाथ से धर कर निचोड़ो, पान कर लो यह सुधा, मैं शान्त हूँगी, अब नहीं आगे कभी उद्भ्रान्त हूँगी। किन्तु, रस के पात्र पर ज्यों ही लगाता हूँ अधर को, घूँट या दो घूँट पीते ही न जानें, किस अतल से नाद यह आता, “अभी तक भी न समझा?”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“युवती नारी नहीं, प्रार्थना की कोई कविता हूँ। शमित–वह्नि सुर की शीतलता तो अज्ञात नहीं है;”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“यह भी कैसी द्विधा? देवता गन्धों के घेरे से निकल नहीं मधुपूर्ण पुष्प का चुम्बन ले सकते हैं। और देहधर्मी नर फूलों के शरीर को तजकर ललचाता है दूर गन्ध के नभ में उड़ जाने को।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“वह आलिंगन अन्धकार है, जिसमें बँध जाने पर हम प्रकाश के महासिन्धु में उतराने लगते हैं? और कहोगे तिमिर-शूल उस चुम्बन को भी जिससे जड़ता की ग्रन्थियाँ निखिल तन-मन की खुल जाती हैं?”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“अन्धकार की मैं प्रतिमा हूँ? जब तक हृदय तुम्हारा तिमिर-ग्रस्त है, तब तक ही मैं उसपर राज करूँगी? और जलाओगे जिस दिन बुझे हुए दीपक को, मुझे त्याग दोगे प्रभात में रजनी की माला-सी?”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“पुंडरीक के सदृश मृत्ति-जल ही जिसका जीवन है, पर, तब भी रहता अलिप्त जो सलिल और कर्दम से।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“किन्तु, पुरुष क्या कभी मानता है तम के शासन को? फिर होता संघर्ष, तिमिर में दीपक फिर जलते हैं।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“यह सब उनकी कृपा, सृष्टि जिनकी निगूढ़ रचना है। झुके हुए हम धनुष मात्र हैं, तनी हुई ज्या पर से किसी और की इच्छाओं के बाण चला करते हैं। मैं मनुष्य, कामना-वायु मेरे भीतर बहती है”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी
“नहीं बढ़ाया कभी हाथ पर के स्वाधीन मुकुट पर, न तो किया संघर्ष कभी पर की वसुधा हरने को। तब भी प्रतिष्ठानपुर वन्दित है सहस्र मुकुटों से, और राज्य-सीमा दिन-दिन विस्तृत होती जाती है।”
Ramdhari Singh 'Dinkar', उर्वशी

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