Raghuvansh (Sanskrit Classics) Quotes

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Raghuvansh (Sanskrit Classics) (Hindi) Raghuvansh (Sanskrit Classics) by Kālidāsa
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“उस राजा से कहना कि तुम तो अग्नि-परीक्षा द्वारा मेरे चरित्र की विशुद्धता को जान चुके थे, फिर भी केवल झूठे लोकापवाद को सुनकर तुमने मेरा त्याग कर दिया, क्या यह काम यशस्वी रघुकुल के योग्य हुआ है? परन्तु तुम बुद्धिमान हो। तुमने मेरे साथ जो कुछ किया, उसमे दोष की आशंका क्यों करूं? मैं समझती हूं कि यह असह्य वज्राघात मेरे ही पूर्वजन्मों के पापों का फल है। जब साम्राज्य की लक्ष्मी तुम्हारे चरणों में लोट रही थी, तब उसे छोड़कर तुम मेरे साथ वन को चल दिये थे। उस असहिष्णु लक्ष्मी ने अधिकार पाते ही अपना बदला ले लिया। उसने मुझे तुम्हारे भवन से निकालकर बाहर कर दिया। तुमने मुझे शरणार्थिनी बनाकर दूसरों के साथ भेज दिया है। वनवास के समय राक्षसों के उत्पात से पीड़ा पाए हुए वनवासियों की स्त्रियों को मैं तुम्हारे बल पर शरण दिया करती थी। तुम्हारे जाज्वल्यमान रहते आज मैं शरणार्थिनी बनकर उन्हीं वनवासियों के पास कैसे जाऊंगी! मैं तो तुम्हारे द्वारा परित्यक्त होने पर इस अपमानित जीवन को ही समाप्त कर देती, परन्तु क्या करूं, मेरे शरीर में तुम्हारा जो तेज गर्भ के रूप में विद्यमान है, वह मुझे आत्मघात से रोकता है। सो मैं सन्तान होने तक सूर्य में ध्यान लगाकर तपस्या करने का यत्न करूंगी, जिससे दूसरे जीवन में भी तुम्हीं मेरे पति बनो, और तब इस जीवन की तरह हमारा वियोग भी न हो। मनु ने आदेश दिया है कि वर्णों और आश्रमों की रक्षा करना राजा का धर्म है; इस कारण यद्यपि तुमने मुझे घर से निकाल दिया है, तो भी साधारण तपस्विनी समझकर मुझपर अपनी सुरक्षा का हाथ तो रखना ही।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“जब जंगल में आग लगती है तब वायु निमन्त्रण के बिना ही उसका सारथि बन जाता है।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“यह स्मरण रखो कि मरना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है, और जीना कृत्रिम है। मनुष्य यदि क्षण-भर भी जी लेता है, तो यह लाभ की बात है, यह भी सोचने की बात है कि जब मनुष्य के जीव और देह का मेल ही टूट जानेवाला है, तो बन्धु-बान्धवों का मेल अटूट कैसे हो सकता है? फिर उनके वियोग में दु:ख कैसा?”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“जो जन्म लेते हैं उन पर आपत्तियां तो आती ही हैं।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“पृथ्वी ही राजाओं की असली पत्नी है।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“नारद मुनि दक्षिण-समुद्र के तटवर्ती गोकर्ण नामक स्थान की ओर महादेव की आराधना के लिए जाते हुए आकाश-मार्ग से गुजरे। अकस्मात् वेगवान वायु ने वीणा के अग्रभाग पर टंगी हुई दिव्यपुष्पों की माला का संभवतः उसकी सुगन्ध के लोभ से अपहरण कर लिया। उस माला की सुगन्ध के लोभ से जो भ्रमरों की पंक्ति उसके पीछे-पीछे चली, वह मानो पवन द्वारा अपमानित मुनि-वीणा की आंखों के अंजन से काली अश्रु-माला थी। दिव्यपुष्पों की माला पार्थिव पुष्पों की ॠतुजन्य विभूति को परास्त करती हुई नीचे आई और ठीक रानी इन्दुमती की छाती के मध्य भाग पर गिरी। उर:स्थल पर गिरी हुई माला को क्षण-भर तो इन्दुमती ने देखा, फिर आंखें बन्द कर लीं। उस आघात को वह सह न सकी। वह अचेत होकर गिर गई, और जैसे दीपक का गिरता हुआ तेल उसकी लौ को भी साथ ले जाता है, वैसे ही पृथ्वी पर गिरती हुई इन्दुमती ने पति को भी भूतल पर गिरा दिया। उनके गिरने पर समीपवर्ती सरोवर के पक्षी मानो सहानुभूति से शोर मचाने लगे। इस पर परिजन लोग वहां पहुंच गए, और अज तथा इन्दुमती को होश में लाने का यत्न करने लगे। अज को तो होश आ गया, पर इन्दुमती सचेत न हुई। उपाय भी तभी सफल होते हैं जब आयु शेष हो। तार-रहित बीणा के समान नि:शब्द और निर्जीव इन्दुमती को गोद में उठाकर जब अज वहां से चला, तब ऐसे प्रतीत होता था मानो प्रभातकाल में मलिन मृगलेखा को धारण किए चन्द्रमा आकाशमार्ग से जा रहा हा। इन्दुमती के वियोग में अज की स्वाभाविक धीरता जाती रही, और वह साधारण मनुष्य की तरह विलाप करने लगा। ठीक भी है, अधिक गर्मी मिलने पर लोहा भी कोमल हो जाता है, शरीर का तो कहना ही क्या? वह इस प्रकार विलाप करने लगा–यदि पुष्पों का सम्पर्क भी मनुष्य के प्राण ले सकता है तो और कौन-सी वस्तु है जिसे प्रहार की इच्छा होने पर विधाता अपना साधन नहीं बना सकता। अथवा विधाता का ढंग ही ऐसा है, वह कोमल वस्तु का संहार कोमल शस्त्र से ही करता है। वह कमल की कोमल पत्तियों को मारने के लिए ओस की शीत बूंद को काम में लाता है। परन्तु आश्चर्य है कि मैं इस माला को अपने हृदय पर रखता हूं तो यह मुझे नहीं मारती। यह भी ईश्वरेच्छा है। जो वस्तु एक के लिए विष है, वही दूसरे के लिए अमृत हो जाती है। यह मेरे भाग्य का ही दोष था कि जब बिजली गिरी तो वृक्ष बच गया, और उस पर आश्रित लता नष्ट हो गई। प्रिये, यदि मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया, तो भी तूने मेरा कभी अपमान नहीं किया। इस समय तो मुझसे कोई अपराध भी नहीं हुआ। फिर बोलना क्यों छोड़ दिया? परन्तु यह क्या, पवन से तेरे पुष्प-सुगन्धित घुंघराले केश हिल रहे हैं। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तू जाग पड़ेगी। हे प्रिये, जाग, उठ, और जैसे रात के समय गुफा में फैले हुए अन्धकार को तृणज्योति नाम की औषधि नष्ट कर देती”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“वह कमल की कोमल पत्तियों को मारने के लिए ओस की शीत बूंद को काम में लाता है। परन्तु आश्चर्य है कि मैं इस माला को अपने हृदय पर रखता हूं तो यह मुझे नहीं मारती।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“वह उस बाढ़ को ऐसे रोक रहा था, जैसे प्रलयकाल में उमड़ते हुए सागर के जल को विष्णु के वराहावतार ने रोका था।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“अज का शरीर रोमांचित हो रहा था, और इन्दुमती की अंगुलियां पसीज रही थीं।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“पुरोहित ने यज्ञ कुण्ड में अग्न्याधान करके उसमें आज्यादि सामग्री से होम किया”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“प्रतीत होता था कि अन्य सब इन्द्रियों की वृत्ति भी पूर्णरूप से चक्षुओं में ही प्रवेश कर गई है।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“स्वयंवर-मण्डप की दशा उस तालाब-सी हो रही थी, जिसमें उषाकाल में एक ओर कमलिनी खिल रही हो, दूसरी ओर कुमुदिनी मुरझा रही हो।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“इक्ष्वाकु के वंश में ककुत्स्थ नाम का एक वीर उत्पन्न हुआ, जो राजाओं में ककुद के समान उन्नत और श्रेष्ठ था और चक्रवर्ती के लक्षणों से युक्त था। उत्तरकोसल देश के शासक उसी वीर के नाम से ककुत्स्थ कहलाते हैं। उस पराक्रमी ककुत्स्थ के वंश में यशस्वी और कुल को उज्ज्वल करनेवाले उस राजा दिलीप ने जन्म लिया, जिसने निन्यानवे राजसूय यज्ञ करके सौवां यज्ञ केवल इसलिए अधूरा छोड़ दिया कि देवताओं के राजा इन्द्र के मन को पीड़ा न पहुंचे। उसके राज्यकाल में जब नाचनेवाली स्त्रियां थककर क्रीड़ा-स्थान के मध्यमार्ग में सो जाती थीं, तब वायु का साहस नहीं होता था कि उनके कपड़ों को हिलाए, हाथ तो डाल ही कौन सकता था! उस राजा दिलीप का पुत्र रघु अब शासन कर रहा है। सम्राट् रघु ने दिग्विजय करके विश्वजित् नामक यज्ञ को पूर्ण किया और यज्ञ की समाप्ति पर चारों दिशाओं से एकत्र हुई विभूति का दान कर दिया, जिससे उसके पास केवल मिट्टी के बर्तन शेष रह गए। उसका यश आज पृथ्वी की सीमाओं को पार कर गया है। वह पहाड़ों से ऊँचा चला गया है, समुद्रों से पार हो गया और पाताल को छेदकर उसके भी नीचे फैल गया है, जैसे स्वर्ग के स्वामी इन्द्र का जयन्त नाम का पुत्र है, उसी प्रकार यह कुमार राजा रघु का तेजस्वी उत्तराधिकारी है, जो पिता के लिए शासनभार उठाने में समानरूप से सहायक हो रहा है। कुल, कान्ति, चढ़ती आयु और अनेक विद्या, शील आदि गुणों में यह तुम्हारे समान है। हे राजकुमारी, तुम इसके गले में वरमाला पहना दो। हीरा स्वर्ण से मिल जाए। सुनन्दा का वचन समाप्त होने पर नैसर्गिक लज्जा को दबाकर इन्दुमती ने प्रसन्न और निर्मल दृष्टि से कुमार अज को इस प्रकार स्वीकार कर लिया, मानो वरमाला पहना दी हो। राजकुमारी वहां मुग्ध-सी होकर खड़ी रह गई। कुलीनता के कारण मुंह से कुछ न कह सकी। उसके मन की अभिलाषा का अनुमान केवल शरीरव्यापी रोमांच से हो रहा”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“ब्रह्मज्ञानी राजा कार्तवीर्य का नाम तुमने सुना होगा। जब वह संग्रामभूमि में उतरा था, तब शत्रु उसे सहस्त्रबाहु-सा अनुभव करते थे। उसने अठारहों द्वीपाें में अपने यज्ञों के यूथ गाड़ दिए थे। प्रजारंजन के कारण ‘राजा’ यह विशेषण उसमें असाधारण रूप से अन्वर्थक जंचता था। प्रजा पर उसका ऐसा आतंक था कि मन में अपराध का विचार आते ही धनुर्धारी राजा की मूर्ति मन के सामने आ जाती और मानसिक अपराध भी रुक जाता था। जिस रावण ने इन्द्र को भी जीत लिया था, कार्तवीर्य के कारागृह में उसी रावण की भुजाएं धनुष की प्रत्यंचा से बंधी हुई थीं, और मुखों से निरन्तर जोर-जोर से सांस निकल रहे थे और उसे तब तक बन्दी रहना पड़ा था जब तक राजा का अनुग्रह न हुआ। उस कार्तवीर्य के वंश में वेदवेत्ताओं की सेवा करनेवाले इस ‘प्रतीप’ नामक राजा ने जन्म लिया है, जिसने अपनी दृढ़ता के कारण श्री का ‘चंचलता’ अपयश धो दिया है। इस तपस्वी ने तपस्या द्वारा अग्निदेवता को प्रसन्न करके सहायता का वर प्राप्त किया है। उसके प्रभाव में क्षत्रियों के संहारकर्ता परशुराम के परशु की धार को यह कमलपत्र की धार से भी अधिक कोमल समझता है। यदि महिष्मती नगरी की चहारदीवारी के चारों ओर कमरबन्द की तरह लिपटी हुई और केशवेणी के समान लहरें खाते हुए जलप्रवाह से सुन्दर रेखा नदी को देखने की इच्छा है, तो तुम इस राजा की गृहलक्ष्मी बन जाओ।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“यह महाकाल-मन्दिर के निवासी भगवान् चन्द्रमौलि महादेव के समीप ही रहता है, इस कारण अंधेरी रातों में भी यह चांदनी से चमकती हुई रातों का अनुभव करता है।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“सैकड़ों आंखों की एक लक्ष्य, विधाता की उस अद्भुत रचना के सम्मुख आने पर सब नरेश अन्त:करणों से उसके समीप जा पहुंचे, सिंहासनों पर तो केवल उनके शरीर ही रह गए।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“मित्र, मेरे पास सम्मोहन नाम का गन्धर्व अस्त्र है, जिसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि शत्रु की हिंसा नहीं करनी पड़ती और जीत हाथ में आ जाती है। यह अस्त्र मैं तुम्हें देता हूं। इसमें लज्जा की कोई बात नहीं है। तुमने तीर का प्रहार करते हुए मुझपर मुहूर्त-भर जो दया का भाव प्रदर्शित किया, उसने मेरे हृदय में अपनापन पैदा कर दिया है। कृपया इस भेंट को लेने से इन्कार न करना।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“राजा ने वह धनराशि सैकड़ों ऊंटों और खच्चरों पर लादकर कौत्स के सुपुर्द करते हुए झुककर प्रणाम किया। सन्तुष्ट होकर विद्वान् ब्राह्मण ने राजा को आशीर्वाद दिया–राजन्, तुम जैसे प्रजा का पालन करने वाले शासक के लिए पृथ्वी कामधेनु हो, यह तो स्वाभाविक ही है। परन्तु तुम्हारा प्रभाव अचिन्तनीय है, जिसने आकाश को भी दुह लिया। संसार की सब विभूतियां तुम्हें प्राप्त हैं, अन्य जो भी शुभकामना की जाएगी वह पुनरुक्तिमात्र होगी। इस कारण मेरा इतना ही आशीर्वाद है कि जैसे तुम्हारे योग्य पिता ने तुम्हें प्राप्त किया था वैसे ही तुम भी अपने अनुरूप पुत्र प्राप्त करो।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“भगवन्, विद्यारूपी समुद्र को पार करके एक स्नातक गुरुदक्षिणा की खोज में रघु के पास आया और निराश होकर किसी दूसरे दानी के पास चला गया, यह अपकीर्ति मेरे लिए एक नई वस्तु होगी, जो मुझसे सहन नहीं हो सकेगी। अत: आप दो-तीन दिन तक मेरे यज्ञगृह में चतुर्थ अग्नि की भांति आदरपूर्वक निवास करने का अनुग्रह करें। इस बीच में मैं आपकी अभीष्ट धनराशि जुटाने का यत्न करता हूं।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“काली-काली मधुमक्खियों से सने हुए शहद के समान दीखनेवाले यवन लोगों के दढ़ियल चेहरों को काट-काटकर उसने पृथ्वी को ढक दिया। अन्त में वे मुकुट उतार कर उसके चरणों में झुक गए।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“योगी इन्द्रिय नाम के शत्रुओं को तत्वज्ञान से जीतने के लिए सन्नद्ध होता है। जैसे बरसात के अतिरिक्त अन्य ॠतुओं में सूर्य की प्रात:कालीन किरणें पद्मों को कुम्हला देती हैं, उसी प्रकार रघु के प्रताप ने यवन-स्त्रियों के सुरागन्ध वाले मुखकमलों को मुरझा दिया।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“जैसे प्रहर्षक होने के कारण निशानाथ चन्द्र और तेजस्वी होने के कारण सूर्य तपन कहलाता है, वैसे ही प्रजा के जन के कारण रघु का ‘राजा’ नाम सार्थक था। यद्यपि उसकी भौतिक आंखें विशालता के कानों को छू रहीं थीं, परन्तु उसके असली नेत्र तो शास्त्र थे, जिनसे वह सूक्ष्म समस्या की तह तक पहुंच जाता था।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“हे राजन् मैंने अपनी माया के बल से तेरी परीक्षा ली है, अन्यथा, ॠषि के प्रभाव से मुझपर तो यमराज भी आक्रमण नहीं कर सकता साधारण हिंसक पशुओं की तो बिसात ही क्या है! तूने अपने गुरु के प्रति भक्ति और मेरे प्रति दया के भाव से मुझे प्रसन्न कर लिया है। हे पुत्र, तू यथेष्ट वर मांग! मैं केवल दूध नहीं देती, कामनाओं की पूर्ति भी करती हूं।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)
“जो पूजा के योग्य हैं, उनका तिरस्कार करने से मनुष्य के सुखों का द्वार बन्द हो जाता है।”
Kālidāsa, Raghuvansh (Sanskrit Classics)