“नारद मुनि दक्षिण-समुद्र के तटवर्ती गोकर्ण नामक स्थान की ओर महादेव की आराधना के लिए जाते हुए आकाश-मार्ग से गुजरे। अकस्मात् वेगवान वायु ने वीणा के अग्रभाग पर टंगी हुई दिव्यपुष्पों की माला का संभवतः उसकी सुगन्ध के लोभ से अपहरण कर लिया। उस माला की सुगन्ध के लोभ से जो भ्रमरों की पंक्ति उसके पीछे-पीछे चली, वह मानो पवन द्वारा अपमानित मुनि-वीणा की आंखों के अंजन से काली अश्रु-माला थी। दिव्यपुष्पों की माला पार्थिव पुष्पों की ॠतुजन्य विभूति को परास्त करती हुई नीचे आई और ठीक रानी इन्दुमती की छाती के मध्य भाग पर गिरी। उर:स्थल पर गिरी हुई माला को क्षण-भर तो इन्दुमती ने देखा, फिर आंखें बन्द कर लीं। उस आघात को वह सह न सकी। वह अचेत होकर गिर गई, और जैसे दीपक का गिरता हुआ तेल उसकी लौ को भी साथ ले जाता है, वैसे ही पृथ्वी पर गिरती हुई इन्दुमती ने पति को भी भूतल पर गिरा दिया। उनके गिरने पर समीपवर्ती सरोवर के पक्षी मानो सहानुभूति से शोर मचाने लगे। इस पर परिजन लोग वहां पहुंच गए, और अज तथा इन्दुमती को होश में लाने का यत्न करने लगे। अज को तो होश आ गया, पर इन्दुमती सचेत न हुई। उपाय भी तभी सफल होते हैं जब आयु शेष हो। तार-रहित बीणा के समान नि:शब्द और निर्जीव इन्दुमती को गोद में उठाकर जब अज वहां से चला, तब ऐसे प्रतीत होता था मानो प्रभातकाल में मलिन मृगलेखा को धारण किए चन्द्रमा आकाशमार्ग से जा रहा हा। इन्दुमती के वियोग में अज की स्वाभाविक धीरता जाती रही, और वह साधारण मनुष्य की तरह विलाप करने लगा। ठीक भी है, अधिक गर्मी मिलने पर लोहा भी कोमल हो जाता है, शरीर का तो कहना ही क्या? वह इस प्रकार विलाप करने लगा–यदि पुष्पों का सम्पर्क भी मनुष्य के प्राण ले सकता है तो और कौन-सी वस्तु है जिसे प्रहार की इच्छा होने पर विधाता अपना साधन नहीं बना सकता। अथवा विधाता का ढंग ही ऐसा है, वह कोमल वस्तु का संहार कोमल शस्त्र से ही करता है। वह कमल की कोमल पत्तियों को मारने के लिए ओस की शीत बूंद को काम में लाता है। परन्तु आश्चर्य है कि मैं इस माला को अपने हृदय पर रखता हूं तो यह मुझे नहीं मारती। यह भी ईश्वरेच्छा है। जो वस्तु एक के लिए विष है, वही दूसरे के लिए अमृत हो जाती है। यह मेरे भाग्य का ही दोष था कि जब बिजली गिरी तो वृक्ष बच गया, और उस पर आश्रित लता नष्ट हो गई। प्रिये, यदि मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया, तो भी तूने मेरा कभी अपमान नहीं किया। इस समय तो मुझसे कोई अपराध भी नहीं हुआ। फिर बोलना क्यों छोड़ दिया? परन्तु यह क्या, पवन से तेरे पुष्प-सुगन्धित घुंघराले केश हिल रहे हैं। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तू जाग पड़ेगी। हे प्रिये, जाग, उठ, और जैसे रात के समय गुफा में फैले हुए अन्धकार को तृणज्योति नाम की औषधि नष्ट कर देती”
―
Raghuvansh (Sanskrit Classics)
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