Ramdhari Singh 'Dinkar' > Quotes > Quote > Apoorva Singh liked it
“और मातृ-पद को पवित्र धरती, यद्यपि, कहती है,
पर, माता बनकर नारी क्या क्लेश नहीं सहती है?
तन हो जाता शिथिल, दान में यौवन गल जाता है,
ममता के रस में प्राणों का वेग पिघल जाता है।
रुक जाती है राह स्वप्न-जग में आने-जाने की,
फूलों में उन्मुक्त घूमने की, सौरभ पाने की।”
― उर्वशी
पर, माता बनकर नारी क्या क्लेश नहीं सहती है?
तन हो जाता शिथिल, दान में यौवन गल जाता है,
ममता के रस में प्राणों का वेग पिघल जाता है।
रुक जाती है राह स्वप्न-जग में आने-जाने की,
फूलों में उन्मुक्त घूमने की, सौरभ पाने की।”
― उर्वशी
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