अनुपमा सरकार
Goodreads Author
Born
New Delhi, India
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Genre
Member Since
July 2019
URL
https://www.goodreads.com/anupama_sarkar
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फ़ुर्सत के पल
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“10 बाय 10 के कमरे में दो फुट के रोशनदान से आती रोशनी देखकर गढ़ लेती हूं, गुनगुने ख़्वाब... हाथ बढ़ाकर, खुली आंखों से छू लेती हूं, जगमग आग का गोला...
मन की खिन्नता, उंगलियां जला देती है.. पल भर की खुशी, दिल गुदगुदा जाती है... ठन्डे फर्श पर पाँव पटक, गुस्सा शांत करती हूं.. गरम कम्बल में कांपते हाथ छुपा, समेट लेती हूं ऊष्णता.. क्षणभंगुर जीवन को पलकों की आवाजाही सा महसूस करने लगी हूं...”
― फ़ुर्सत के पल
मन की खिन्नता, उंगलियां जला देती है.. पल भर की खुशी, दिल गुदगुदा जाती है... ठन्डे फर्श पर पाँव पटक, गुस्सा शांत करती हूं.. गरम कम्बल में कांपते हाथ छुपा, समेट लेती हूं ऊष्णता.. क्षणभंगुर जीवन को पलकों की आवाजाही सा महसूस करने लगी हूं...”
― फ़ुर्सत के पल
“शरारती मन मोहे है, किनमिनाते सप्तऋषि, अविचलित ध्रुव को भी अपनी टेढ़ी मुस्कान से सम्मोहित करता। पर दूसरे ही पल तटस्थ योगी दिखता है, चुप्पी साधे पूरब से पश्चिम की यात्रा पूरी करता।
नज़र भर देख लूं तो जाने क्या मंत्र फूंक देता है ये चांद मुझ पर। मन करे, रंग दूं इसके गालों को टेसू की अगन से, शर्माई का लाल छूटे न महीनों तक या हल्दी-चंदन का तिलक कर दूं इसके सलोने माथे पर। केसरिया बांका, ताव दिए घूमे मूंछों पर।”
― फ़ुर्सत के पल
नज़र भर देख लूं तो जाने क्या मंत्र फूंक देता है ये चांद मुझ पर। मन करे, रंग दूं इसके गालों को टेसू की अगन से, शर्माई का लाल छूटे न महीनों तक या हल्दी-चंदन का तिलक कर दूं इसके सलोने माथे पर। केसरिया बांका, ताव दिए घूमे मूंछों पर।”
― फ़ुर्सत के पल
“A craven can be as brave as any man, when there is nothing to fear. And we all do our duty, when there is no cost to it. How easy it seems then, to walk the path of honor. Yet soon or late in every man's life comes a day when it is not easy, a day when he must choose”
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“The first sign that you've evolved as a writer is when MS WORD fails to make you feel guilty by putting a green line under your passive voice sentence”
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“10 बाय 10 के कमरे में दो फुट के रोशनदान से आती रोशनी देखकर गढ़ लेती हूं, गुनगुने ख़्वाब... हाथ बढ़ाकर, खुली आंखों से छू लेती हूं, जगमग आग का गोला...
मन की खिन्नता, उंगलियां जला देती है.. पल भर की खुशी, दिल गुदगुदा जाती है... ठन्डे फर्श पर पाँव पटक, गुस्सा शांत करती हूं.. गरम कम्बल में कांपते हाथ छुपा, समेट लेती हूं ऊष्णता.. क्षणभंगुर जीवन को पलकों की आवाजाही सा महसूस करने लगी हूं...”
― फ़ुर्सत के पल
मन की खिन्नता, उंगलियां जला देती है.. पल भर की खुशी, दिल गुदगुदा जाती है... ठन्डे फर्श पर पाँव पटक, गुस्सा शांत करती हूं.. गरम कम्बल में कांपते हाथ छुपा, समेट लेती हूं ऊष्णता.. क्षणभंगुर जीवन को पलकों की आवाजाही सा महसूस करने लगी हूं...”
― फ़ुर्सत के पल
“What is honor compared to a woman's love? What is duty against the feel of a newborn son in your arms … or the memory of a brother's smile? Wind and Words”
― A Game of Thrones
― A Game of Thrones
“शरारती मन मोहे है, किनमिनाते सप्तऋषि, अविचलित ध्रुव को भी अपनी टेढ़ी मुस्कान से सम्मोहित करता। पर दूसरे ही पल तटस्थ योगी दिखता है, चुप्पी साधे पूरब से पश्चिम की यात्रा पूरी करता।
नज़र भर देख लूं तो जाने क्या मंत्र फूंक देता है ये चांद मुझ पर। मन करे, रंग दूं इसके गालों को टेसू की अगन से, शर्माई का लाल छूटे न महीनों तक या हल्दी-चंदन का तिलक कर दूं इसके सलोने माथे पर। केसरिया बांका, ताव दिए घूमे मूंछों पर।”
― फ़ुर्सत के पल
नज़र भर देख लूं तो जाने क्या मंत्र फूंक देता है ये चांद मुझ पर। मन करे, रंग दूं इसके गालों को टेसू की अगन से, शर्माई का लाल छूटे न महीनों तक या हल्दी-चंदन का तिलक कर दूं इसके सलोने माथे पर। केसरिया बांका, ताव दिए घूमे मूंछों पर।”
― फ़ुर्सत के पल
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Indian Readers
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