“वाकई, गुरु कुछ नहीं करता। और न ही उसे कुछ करना है। क्या सूर्य की मौजूदगी में रात हो सकती है? सूर्य उदय होता है, और अँधकार चला जाता है। इसके लिए सूर्य कुछ नहीं करता। उसका स्वभाव ही यह है। गुरु भी ठीक इसी प्रकार होता है। गुरु का शाब्दिक अर्थ है ‘अँधकार को दूर करने वाला’। लेकिन सूर्य की ही तरह वह भी अँधकार को दूर करने के लिए कुछ नहीं करता। वह तो जैसा है, वैसा है।” “कली पर जैसे ही सूर्य की किरणें पड़ती हैं, वह धीरे-धीरे खिलने लगती है। क्या सूर्य को इसके लिए कुछ करना पड़ता है? क्या कली को कुछ करना पड़ता है? यह तो बस हो जाता है।” “इसलिए गुरु ख़ुद कुछ नहीं करता। यह तो उसकी मौजूदगी है जो सब कुछ करती है। और उसकी मौजूदगी तभी कार्य करती है जब जिज्ञासु का हृदय पुष्पित होने के लिए तैयार हो। कली को जबरन खोलने का प्रयास उसे बर्बाद ही करेगा। अगर गुरु को हम पर कार्य करना पड़े तो वह एक थोपी हुई चीज़ होगी। यह विध्वंसकारी होगा। इसलिए गुरु ऐसा नहीं करेगा।”
―
The Heartfulness Way (Hindi)
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