“मैं कुछ नहीं कहूँगा। मुझे कुछ भी नहीं कहना है।’’ सहदेव ने दृढ़तापूर्वक कहा, ‘‘क्योंकि मैं जो कुछ भी कहूँगा, वह भविष्यवाणी हो जाएगी। समय की भाषा को सुलझा सकें, ऐसे कुछ अभागे लोगों में से एक हूँ मैं।’’ कुछ पल को वह अटका, फिर कृष्ण की आँखों में आँखें डाल उसने कहा, ‘‘आप क्या नहीं जानते हैं कि समय को जाननेवाले भी काल को नहीं जान सकते हैं। मैं महाकाल के समक्ष खड़ा हूँ और रक्त अधर्मी का हो या धर्मनिष्ठ व्यक्ति का, उसका रंग तो लाल ही होता है। मेरी ऐसी प्रार्थना थी कि रक्त मात्र रक्तवाहिनियों में ही बहे तो अच्छा, धरती पर न बहे। हम सबकी प्रार्थनाओं के उत्तर तो अवश्य मिलते ही हैं; परंतु कभी-कभी वे उत्तर ‘इनकार’ भी हो सकते हैं। यह बात अपना मन स्वीकार करने को तैयार नहीं होता।”
―
कृष्णायन
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