“यूं भी ‘मां’ यदि राजा कंस की बहन थी तो पिताजी भी राजकीय घराने से ही थे। वसुदेव जी की एक पत्नी, यानी मां-रोहिणी हस्तिनापुर जैसे विशाल राज्य के मंत्री विदुरजी की बहन थी। वहीं वसुदेवजी की अपनी बहन पृथा, जिसे उनके पिता शूरसेन ने अपने मित्र वृद्ध राजा कुन्तिभोज को दान में दे दिया था तथा उसका नाम कुन्ती पड़ गया था, वह हस्तिनापुर के राजा पांडु से ब्याही गई थी। ...वैसे भी मथुरा आने का सबसे बड़ा फायदा ही यह हुआ था कि मेरा दृष्टिकोण विशाल हो गया था। यहां आने के बाद मैंने ना सिर्फ धन की महत्ता जानी थी, बल्कि अच्छे खाने-पीने व पहनने का महत्त्व भी जाना था। वहीं राजकुमारी व युवराजों के ठाठ व प्रभाव ने मुझमें बड़ा आदमी बनने की इच्छा भी जागृत कर ही दी थी। ...वरना वृन्दावन में पड़े-पड़े तो शायद ज्यादा-से-ज्यादा गांव का मुखिया बनने तक ही सोच पाता। यानी बड़ा आदमी बनने के लिए बड़ा दृष्टिकोण आवश्यक है, और निश्चित ही वह विकसित नगरों और राज्यों से ही पाया जा सकता है।”
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मैं कृष्ण हूँ: Main Krishna Hoon
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