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हजारी प्रसाद द्विवेदी

“अगर विशाल ऐश्वर्य देखकर मैं अभिभूत न हो गया होता, तो निश्चय ही इसका उपयुक्त उत्तर देता। वस्तुतः जब मैं बाहर निकल आया, तो मेरे मन में हजार-हजार उत्तर उद्‌भूत और विलीन होने लगे। मैं अपने विष से आप ही दीर्घकाल तक जलता रहा। मुझे उस समय अपने प्राणों की कोई परवा नहीं थी; परन्तु फिर भी ऐसा उत्तर नहीं दे सका, जो उचित कहा जा सकता है; जो महाराजाधिराज को यह अनुभव करा देता कि महाराजा होने मात्र से किसी को किसी के विषय में अनर्गल विचार रखने का अधिकार नहीं हो जाता।”

― हजारीप्रसाद द्विवेदी, Banbhatt Ki Aatmakatha
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