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Leo Tolstoy

“प्रार्थनाओं को बार-बार दोहरा रहा था और जमीन पर झुकता था। मैंने नई प्रार्थनाएँ भी बनाईं और हर बार मैं कह रहा था, ‘अपना अस्तित्व मुझे बताओ।’ मैं अब शांत हो गया और जवाब का इंतजार करने लगा, पर कोई जवाब नहीं आया। ऐसा मालूम पड़ा, वहाँ जवाब देने के लिए कोई नहीं था। मैं बिलकुल अकेला था और मैं ही अपने सवालों के जवाब उसकी तरफ से दे रहा था, जैसे कि वह तो जवाब देगा नहीं। ‘‘मुझे किसलिए बनाया गया है?’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘भविष्य के जीवन में जीने के लिए।’’ ‘‘तब इतनी अनिश्चितता और पीड़ा क्यों है?मुझे भविष्य के जीवन में यकीन नहीं है। जब मैंने पूछा था, तब मुझे विश्वास था, पर मेरी पूरी आत्मा के साथ मुझे विश्वास नहीं है। अब मैं विश्वास कर भी नहीं सकता हूँ। यदि तुम्हारा अस्तित्व नहीं था, तुम मुझे या सभी लोगों को बता सकते थे; मगर तुम्हारा वजूद नहीं है और पीड़ा के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं है।’’ लेकिन मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता हूँ। मैंने इसकी खिलाफत की थी। मैंने उससे उसका अस्तित्व बताने के लिए कहा था। मैंने वह सब किया, जो प्रत्येक व्यक्ति करता है; पर उसने मुझे खुद के बारे में नहीं बताया। ‘‘माँगो और वह तुम्हें दिया जाएगा।’’ मैंने याद किया और व्याकुलता से कहना शुरू किया और ऐसा करने में मुझे कोई आराम नहीं मिला, बल्कि सिर्फ हताशा की समाप्ति ही थी। शायद मेरी तरफ से उससे गंभीर निवेदन नहीं था, बल्कि केवल उसको नकारना ही था। तुम उससे एक कदम पीछे हटते हो और वह तुमसे एक मील दूर हो जाता है। मुझे उसमें यकीन नहीं था, मगर फिर भी मैं उसमें प्रवेश कर रहा हूँ। लेकिन उसने मुझे अपने बारे में नहीं बताया।”

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