“इस प्रकार मनुष्य जाति के लिए निर्धारित विधि-नियमों के विरुद्ध आचरण करने वाले व्यक्ति सैकड़ों, हजारों नरकों से होते हुए जड़, कृमि, जलपशु,पक्षी, पशु, मनुष्य, धर्मात्मा, सज्जन, देवता के रूप में उत्तरोत्तर श्रेष्ठ जाति में जन्मते हुए मुमुक्षु रूप में मोक्ष के अधिकारी हो जाते हैं। प्रायश्चित्त न करने वाले लोग बार-बार नरकवास के फेर में पड़े रहते हैं। यद्यपि भिन्न-भिन्न पापों के लिए भिन्न-भिन्न तपस्या निश्चित हैं, किंतु फिर भी प्रमुख प्रायश्चित्त स्वरूप श्रीमन् नारायण विष्णु का स्मरण करते हुए जीव पाप के विनष्ट होने पर मोक्ष का भागी हो जाता है। जप और तप आदि से तो वह केवल इहलोक ही सुधारता है। किंतु परमपद विष्णु के श्री चरणों में ध्यान लगाने से वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होता हुआ परमपद को प्राप्त होता है। अतः मनुष्य के लिए विष्णु का स्मरण ही श्रेय है। पृथ्वी जितना विस्तार ही उपरिलोक का भी है।”
―
विष्णु पुराण [Vishnu Puran]
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