मिट जाने तक कोई वैसे
तुम इस वक़्त बिस्तर की सलवटों में गुम हो
मैं इस वक़्त हूँ तुम्हारी याद के मुहाने पर
लड़के ने कहा- उस जादुई नदी का नाम हिनातुँ है.
आसमान से दो सितारे एक के बाद एक टूटे. लड़का उन टूटे तारों को देखने लगा. वह भूल गया कि उसने अभी जिस जादुई नदी का नाम लिया, उसे किसी ने सुना या नहीं. आसमान से गिरते सितारे बुझते हुए अंगारों के जैसे न होकर किसी पीले उजास के कम होते जाने जैसे थे. लड़के ने अपना हाथ आगे किया कि सितारों की राख़ उसकी हथेली को चूम ले. उसकी हथेलियाँ खाली पड़ी रहीं. उन पर अगर कोई गर्द बरसी थी तो वह उसे महसूस नहीं कर पाया था.
रात के बारह बजने को थे. वह अपने काम से घर जाते समय रास्ते के रेलवे पुल पर रुक गया था. वह खाली पुल टूटी हुई चूड़ी का टुकड़ा दिख रहा था. उसने पुल की चौड़ाई को देखकर सोचा कि ये पुल चूड़ी नहीं किसी भरवाँ कंगन का टुकड़ा है. पुल की सड़क को गहरा लाल या रात के कसूम्बल रंग में रंग दिया जाये तो ये किसी कलाई में सजा आधा कंगन हो. और वह इस कंगन की किनार पर खड़ा है.
वो गर्द नहीं आई. ये कंगन का टुकड़ा स्थिर रहा.
रेल के इंजन की रोशनी आई. पटरियों को चूमती और बलखाती हुई. मोड़ पर बबूलों के झुरमुट को चूमकर रौशनी ने प्लेटफ़ॉर्म की सीध में रास्ता कर लिया. रेल धक-धड़क की मद्धम हलकी आवाज़ करती हुई पुल के नीचे से गुज़र कर स्टेशन की ओर बढ़ गयी. लड़का वहीँ खड़ा था. उसने अपने हाथ समेट लिए.
क्या उसे हवा छू रही है. क्या हवा में ठंडक है? क्या रात की नमी है? क्या कुछ ऐसा है, जिसे वह लड़का महसूस कर सके. लड़का एक अचेत चलती फिरती देह में बदल गया था. उसे हवा, ठंड और नमी का अहसास नहीं हो रहा था. उसके पास एक ही अहसास था कि उसके सर में कुछ बह रहा है. वहां कोई आसवन हो रहा है. अपशिष्ट तल में जमते जा रहे हैं और निर्मल जल सुन्दर रोचक प्रवाह बुन रहा है.
लड़के के ख़याल कुंद थे. उनकी धार खत्म हो गयी थी. वह प्रेम के बारे में सोचने लगा. क्या उसे कोई इस तरह प्रेम नहीं कर सकता जैसे वह करता है. बस जिससे प्रेम हो उसके सिवा किसी की ज़रूरत न हो. लड़के ने खुद को समझाया. असल में वह दो दिन से खुद को समझा ही रहा था कि इस दुनिया में हर किसी को बहुत सी चीज़ों की ज़रूरत होती है. हर कोई इस तरह इकहरे प्रेम में नहीं जी सकता है. हर किसी को एकरस होने पर ऊब आती है. परिचितों, मित्रों, संगियों, सहपाठियों और इस तरह के जाने ही कितने सम्बन्ध ज़रूरी होते हैं.
उसने खुद से पूछा- मेरे लिए ऐसा सब क्यों ज़रूरी नहीं है? मैं क्यों इतना निष्ठुर हूँ कि सबकुछ ठुकरा कर जीए जाता हूँ. मुझे क्यों एक से ही चैन आता है. मैं क्यों इस तरह का जीवन नहीं जी सकता, जिसमें एक व्यवस्थित दिनचर्या हो. मित्र हों, परिवार और ज़रा कम या ज्यादा प्रेमी हो. मैं क्यों हर वक़्त एक ही ट्रांस में रहता हूँ. मैं गलत हूँ. मुझे सचमुच ठीक-ठीक रसायनों की ज़रूरत है.
कुछ साल पहले फिलिपिन्स में पानी के भीतर बनी गुफाओं के बीच बहने वाली रंगीन नदी के बारे में गोताखोरों को मालूम हुआ, जैसे उस लड़के को अचानक वह लड़की मिली. गहरे अवसाद के दिनों में नीली दवाओं के जादुई नशे के बीच. लड़के को लगा कि पानी में डूबी वे गुफाएं उसके दिमाग जैसी हैं. जाने कहाँ से शुरू होकर कहाँ खत्म होती हैं. एक से निकलो तो दूसरी शुरू हो जाती है. और उन गुफाओं के बीच बहने वाली नीले रंग की मीठी विद्युतीय चमक से भरी नदी, उसकी प्रिय लड़की ही है.
वह लड़की निरंतर निर्मल रूप में नदी की तरह उसके भीतर बह रही है.
नीले रंग के दो शेड्स को पहने हुए. नीले पानी के किनारे बैठी हुई. नीले आसमान के नीचे दूर खड़ी अट्टालिकाओं से सजे बैकड्राप से बनी तस्वीर उसके दिमाग में स्थिर है. एक प्रवाहमय स्थिर. शांत और मधुर. अचानक हलके रंग के अपर पर कुछ फूल खिल आये हैं. वो अपर रंग बदलता जा रहा है. फूल खिलकर उसे ढक रहे हैं. पानी के रंग की पत्तियां बढ़ी आ रही हैं. आहिस्ता से वह पल्लवित-पुष्पित दृश्य एक नदी में ढल जाता है.
लड़के ने सोचा कि काश उस लड़की ने अभी सुना होता जादुई नदी का नाम तो वह चहक कर कह उठती- हम दोनों वहां चलेंगे.
लेकिन आधा टूटा कंगन का टुकड़ा चुप पड़ा था. लड़के के दिमाग में नीली गोलियां घुल रही थी. हवा शांत थी. ज़िन्दगी उदास थी. मन अजनबी था. दुनिया थी मगर नहीं थी. बुझ गया था सबकुछ. लड़के ने रुआंसा होते हुए एक दुआ पढ़ी. ओ दुनिया के मालिक इस तकलीफ से तो अच्छा है कि सबकुछ बुझा ही दो.
लड़के ने लोहे की ठंडी रेलिंग पर अँगुलियों से लिखा- “मिट जाने तक कोई वैसे प्रेम नहीं कर सकेगा. तुम इस दुनिया से जाओगे इंतज़ार से भरे हुए और तन्हा.” इसके बाद लड़के ने कोलोन और केपिटल डी लिखा और चला गया.
* * *
[Painting courtesy ; Michele Traggakiss]
Published on November 06, 2015 19:10
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