देखना उसको, जैसे पेड़ के भीतर झांकना
ये उस साल के नम्बर की बात है जिस साल एक बूढ़ा फ़कीर अचानक सामने आ खड़ा हुआ. उसने कहा- क्या दिखाई दे रहा है? वे दोनों देर तक दूर-दूर तक देखते रहे. उन्होंने सही जवाब देने के लिए सबकुछ देख लेना चाहा. वे चाहते थे कि उनका जवाब सुनकर फ़कीर खुश हो जाये. फ़कीर ने एक हरे रंग का कुरता पहना हुआ था. उसके गले में आसमानी रंग के पत्थरों की माला थी. उसके हाथों में कत्थई रंग के मनके थे.
फ़कीर ने कहा- मेरे बच्चे ज़िन्दगी बहुत छोटी है. जल्दी देखो और जवाब दो.
वे दोनों अपनी चाहना के फलीभूत होने के लिए सबकुछ देखने में ही लगे थे मगर आख़िरकार फ़कीर चलने को हुआ तब उन्होंने कहा- हाँ हमने देखा. अब आप पूछिए.
फ़कीर ने फिर वही सवाल किया- तुमने क्या देखा मेरे बच्चों?
हड़बड़ी में वे एक साथ बोलने लगे. एक दूजे को बोलता सुनकर दोनों एक साथ रुके. फिर लड़के ने इशारा किया तुम रुको. मुझे बोलने दो. फ़कीर के चेहरे पर जवाब के इंतज़ार के सिवा कोई भाव नहीं था.
लड़के ने कहा- एक सड़क है. इसके किनारे पेड़ खड़ा है. इसके आगे विश्वविध्यालय का मुख्य दरवाज़ा है. उस दरवाजे के प्रवेश के पास एक घुमटी है. उसमें एक गार्ड बैठा है. दूर एक टेम्पो आ रहा है. उसके पीछे एक बड़ा शोरूम दिख रहा है.
फ़कीर ने कुछ न कहा. वह जाने क्या सोचता हुआ चुप खड़ा रहा.
फ़कीर कि चुप्पी को देखकर लड़की ने कहा- मुझे एक पेड़ दिख रहा है.
अचानक से बिना चमके ही फ़कीर की आँखें रोशन होने लगी. वह लड़की पर केन्द्रित होने लगा. लड़की से उसने कहा- और क्या देखा? लड़की ने कहा- शाखाएं देखीं.
फ़कीर ने झोली से एक कटोरा निकाला और कहा बेटी तुम्हारे पास जो पानी है उसे इसमें भर दो.
लड़की ने अपने पिट्ठू बैग से पानी की बोतल निकाली और पानी को कटोरे में उड़ेल दिया. पानी पीने के बाद फ़कीर ने कहा- बेटी शाख के आगे भी देखना. वहां कच्ची शाखाएं होंगी. उन पर पत्ते होंगे. देख सको तो देखना कि वहां कोंपलें भी होंगी.
वह चला गया.
लड़का उदास खड़ा रहा. उसे आशा थी कि फ़कीर कोई चमत्कार करेंगे. उसकी ज़िन्दगी संवर जाएगी. लड़की कहीं खो गयी थी. शायद पेड़ में.
अचानक उसने उदास लड़के का हाथ थामा और अपनी तरफ खीच लिया- तुम मुझसे प्रेम करते हो?
हाँ तो आओ मुझे प्रेम करो कैसे जैसे हम पेड़ के पत्ते-पत्ते को पढ़ें
वे दोनों भरी दोपहर एक दूजे में खोये रहे. उन्होंने प्रेम को हर जगह से चखा. वे सब कुछ भूल गए. यहाँ तक कि फ़कीर भी उनकी स्मृति में न रहा. ये सब देखते हुए समय कपूर की तरह उड़ गया. वे दोनों प्रेम में डूबे रहे.
उस फ़कीर को गए हुए एक साल बीत गया.
उन्होंने दुआ की- बहार का मौसम फिर आये. बवंडर के आने से पहले की ख़ामोशी की तरह कुछ समय बीता और अचानक वे एक दूजे करीब थे. उनके बीच में फासला न बचा था. वे दो थे और बाकी दुनिया उनकी बायीं या दायीं तरफ से शुरू होती थी.
उनके वहां से उठ जाने के बाद लड़की ने कहा- अब मुझे तुम्हारे साथ सोने से अधिक सुख तुम्हारे साथ घूमने से होता है.
एक तरफ टप टप टप रात टपकती रही. स्याही में कोई नया रंग नहीं दिखा. बदन ने अपने आपको छोड़ दिया. उदासे मन ने अपना चेहरा झुका लिया. वह कैसे जीएगा उस लड़की को छुए बिना. कैसे उसे बता पायेगा कि प्रेम क्या है? कैसे उनको सुख आएगा. अचानक लड़के को उस फ़कीर की खूब याद आने लगी. दूसरी तरफ लड़की ने सोचा कि यही वक़्त है. हम आगे बढ़ आये हैं. जब तक हम पेड़ के तने के पास थे, हम उसे बाहों में भर सकते थे. अब हम शाखों पर हैं तो टहनियों को हथेली में थाम सकते हैं. कल जब हम पत्तों के पास होंगे तब उनको सिर्फ होठों से चूम सकेंगे. पत्तों को बाहों में नहीं भरा जा सकेगा. फिर कभी हम कोंपलें देखेंगे तब सिर्फ उनको आँखों से सहला सकेंगे.
लड़के ने दो दिन बाद लड़की से कहा- मैं समझ गया. लड़की की आँखों में वह फ़कीराना चमक नहीं आई. वह अब भी जानती थी कि ये पागल है. न समझा है, न समझेगा. एक दिन मेरे लिए अपने आप को मिटा देगा._______________________
[Painting Image : Darryl Steele]
फ़कीर ने कहा- मेरे बच्चे ज़िन्दगी बहुत छोटी है. जल्दी देखो और जवाब दो.
वे दोनों अपनी चाहना के फलीभूत होने के लिए सबकुछ देखने में ही लगे थे मगर आख़िरकार फ़कीर चलने को हुआ तब उन्होंने कहा- हाँ हमने देखा. अब आप पूछिए.
फ़कीर ने फिर वही सवाल किया- तुमने क्या देखा मेरे बच्चों?
हड़बड़ी में वे एक साथ बोलने लगे. एक दूजे को बोलता सुनकर दोनों एक साथ रुके. फिर लड़के ने इशारा किया तुम रुको. मुझे बोलने दो. फ़कीर के चेहरे पर जवाब के इंतज़ार के सिवा कोई भाव नहीं था.
लड़के ने कहा- एक सड़क है. इसके किनारे पेड़ खड़ा है. इसके आगे विश्वविध्यालय का मुख्य दरवाज़ा है. उस दरवाजे के प्रवेश के पास एक घुमटी है. उसमें एक गार्ड बैठा है. दूर एक टेम्पो आ रहा है. उसके पीछे एक बड़ा शोरूम दिख रहा है.
फ़कीर ने कुछ न कहा. वह जाने क्या सोचता हुआ चुप खड़ा रहा.
फ़कीर कि चुप्पी को देखकर लड़की ने कहा- मुझे एक पेड़ दिख रहा है.
अचानक से बिना चमके ही फ़कीर की आँखें रोशन होने लगी. वह लड़की पर केन्द्रित होने लगा. लड़की से उसने कहा- और क्या देखा? लड़की ने कहा- शाखाएं देखीं.
फ़कीर ने झोली से एक कटोरा निकाला और कहा बेटी तुम्हारे पास जो पानी है उसे इसमें भर दो.
लड़की ने अपने पिट्ठू बैग से पानी की बोतल निकाली और पानी को कटोरे में उड़ेल दिया. पानी पीने के बाद फ़कीर ने कहा- बेटी शाख के आगे भी देखना. वहां कच्ची शाखाएं होंगी. उन पर पत्ते होंगे. देख सको तो देखना कि वहां कोंपलें भी होंगी.
वह चला गया.
लड़का उदास खड़ा रहा. उसे आशा थी कि फ़कीर कोई चमत्कार करेंगे. उसकी ज़िन्दगी संवर जाएगी. लड़की कहीं खो गयी थी. शायद पेड़ में.
अचानक उसने उदास लड़के का हाथ थामा और अपनी तरफ खीच लिया- तुम मुझसे प्रेम करते हो?
हाँ तो आओ मुझे प्रेम करो कैसे जैसे हम पेड़ के पत्ते-पत्ते को पढ़ें
वे दोनों भरी दोपहर एक दूजे में खोये रहे. उन्होंने प्रेम को हर जगह से चखा. वे सब कुछ भूल गए. यहाँ तक कि फ़कीर भी उनकी स्मृति में न रहा. ये सब देखते हुए समय कपूर की तरह उड़ गया. वे दोनों प्रेम में डूबे रहे.
उस फ़कीर को गए हुए एक साल बीत गया.
उन्होंने दुआ की- बहार का मौसम फिर आये. बवंडर के आने से पहले की ख़ामोशी की तरह कुछ समय बीता और अचानक वे एक दूजे करीब थे. उनके बीच में फासला न बचा था. वे दो थे और बाकी दुनिया उनकी बायीं या दायीं तरफ से शुरू होती थी.
उनके वहां से उठ जाने के बाद लड़की ने कहा- अब मुझे तुम्हारे साथ सोने से अधिक सुख तुम्हारे साथ घूमने से होता है.
एक तरफ टप टप टप रात टपकती रही. स्याही में कोई नया रंग नहीं दिखा. बदन ने अपने आपको छोड़ दिया. उदासे मन ने अपना चेहरा झुका लिया. वह कैसे जीएगा उस लड़की को छुए बिना. कैसे उसे बता पायेगा कि प्रेम क्या है? कैसे उनको सुख आएगा. अचानक लड़के को उस फ़कीर की खूब याद आने लगी. दूसरी तरफ लड़की ने सोचा कि यही वक़्त है. हम आगे बढ़ आये हैं. जब तक हम पेड़ के तने के पास थे, हम उसे बाहों में भर सकते थे. अब हम शाखों पर हैं तो टहनियों को हथेली में थाम सकते हैं. कल जब हम पत्तों के पास होंगे तब उनको सिर्फ होठों से चूम सकेंगे. पत्तों को बाहों में नहीं भरा जा सकेगा. फिर कभी हम कोंपलें देखेंगे तब सिर्फ उनको आँखों से सहला सकेंगे. लड़के ने दो दिन बाद लड़की से कहा- मैं समझ गया. लड़की की आँखों में वह फ़कीराना चमक नहीं आई. वह अब भी जानती थी कि ये पागल है. न समझा है, न समझेगा. एक दिन मेरे लिए अपने आप को मिटा देगा._______________________
[Painting Image : Darryl Steele]
Published on November 04, 2015 09:02
No comments have been added yet.
Kishore Chaudhary's Blog
- Kishore Chaudhary's profile
- 16 followers
Kishore Chaudhary isn't a Goodreads Author
(yet),
but they
do have a blog,
so here are some recent posts imported from
their feed.

