लू-गंध

स्कूल के पास बैठे हुए जुआरी जब ताश के पत्तों की शक्ल और रंगों से ऊब जाते हैं तब द्वारका राम को छेड़ते हैं. वह इसी लायक है. बनिए के घर पैदा हुआ मगर व्यापार छोड़कर किसानी करने लगा था. इस पर बहुत सारी गालियाँ भी हैं. ऐसी गालियाँ जिन्हें भद्र लोग देते हों. जैसे कि इसके बाप का पड़ोसी कौन था.

खद-खद हंसी से भरी गालियाँ.

सीरी ताश के पत्ते छोड़कर उठे तब तक द्वारका वहीँ जुआरियों के पास बैठा रहता है. क्या करेगा खेत में जाकर. वही गरम उमस भरी हवा और दूर तक बियाबान. काम सबके हिस्से एक ही काम साल के आठ महीने दिनों को काटो.

कभी कभी जलसे होते हैं तब द्वारका को सुनकर हर कोई मंत्र मुग्ध रहता है. तालियाँ बजती हैं. बाकी गाँव की पंचायत या किसी बात पर उसके साथ कोई नहीं चलता. पिछली बार दयाराम पंडित जी ने फैसला सुनाया कि जो कोई धर्म को मानता है उसको द्वारका से बात नहीं करनी चाहिए. जो बनिया होकर बनिया नहीं हुआ वह किसान होकर किसान क्या होगा.

द्वारका मगर जब भी खड़ा होता है लोग उसे कान लगाये सुनते रहते हैं. उसकी सब बातें लगभग यही होती हैं और यहीं से शुरू होती हैं.

"उन्होने कहा कि देखो मर गया वह विचार और उससे आने वाली सारी उम्मीदें।
मनुष्य की बराबरी के स्वप्न देखने वाले ढह चुके हैं। इस विचार को हम ख़त्म करार देते हैं। हम धर्म प्रिय लोगों से रखते हैं उम्मीद कि मनुष्यता को बचाने के लिए वे हर आधुनिक हथियार का प्रयोग करने में नहीं हिचकेंगे। मूर्खता की पराकाष्ठा की इस बात पर ही भले आदमियों को समझ जाना चाहिए था कि ये कितना बेवकूफाना होगा कि राजा और मजदूर एक जैसे जीएंगे। मंदिरों में घुस आएगा हर कोई, चर्च के फैसले लेने में सबसे ली जाएगी सलाह। हर कोई रखेगा एक ही बीवी और हरम के बिना भी राजा का चलेगा सुखी जीवन।

मगर लोग बहकावे में आ ही जाते हैं इसलिए ऐसे भोले और सीधे लोगों की रक्षा के लिए एक नौजवान हौसले वाला राजा होना चाहिए जिसने आँखें बंद करके कभी मार गिराया हो शैतान लोगों को भीड़ को।

धर्म अर्थात जिसे हम धारण करते हैं। आओ तुम मुझे धारण करो वरना तुम एक अधार्मिक और राष्ट्रद्रोही हो।"
गाँव के भले के लिए बुलाई गयी सब जनों की बैठक को सांप की तरह रेगिस्तान की लू सूंघने लगती है. लोग पत्थरों के बुतों की तरह हो जाते हैं. शाम तक जाने किस मन से लुढक कर कोई पत्थर अपने ठिकाने लगता है. द्वारका क्या करता है? हमें जोड़ता है कि अलग करता है. वह धर्म का नाश देखना चाहता है क्या? बुजुर्ग लोग कहते हैं द्वारका एक बीमारी है, उनके बच्चे पूछते हैं कौनसी बात के कारण है बीमारी बाबा?
हवा की सरगोशी बोरड़ी  की बाड़ से बातें करती रहती हैं. 
पीथे की माँ कहती है- हमारे छोरे भोले हैं. वे उनको मारेंगे.  पीथे का बाप जानता है कि यही होगा मगर वह दूसरी बात कहता है- कुछ न होगा कोई न मारेगा. अपने खेत में अपनी मजूरी अपनी बाजरी, बाकी सांवरियो गिरधारी. 

चिंता तो थी ही. कुछ लड़के ज़िद्दी होते जा रहे थे, वे द्वारका का अपमान होने पर बोलने लगते और उसके आस पास मंडराते रहते थे. * * *
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Published on September 05, 2014 22:18
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Kishore Chaudhary
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