याद भी एक जादू है
किसी जादूगर के शो में
स्टेज पर कभी नहीं होता गधा.
सब सामने कुर्सियों पर बैठते हैं.
* * *
गधा एक बुद्धिमान प्राणी है
ज़रा सा बोझ उठाकर
दुनिया भर की चिंताओं से हो जाता है मुक्त.
* * *
प्रेम की ही तरह
जादू सम्मोहन नहीं
यकीन की बात है.
* * *
मसखरे की नाकामी हो सकती है हंसी का सबब
मगर जादूगर के लिए सफाई को बुनना होता है नफासत से
कि जो मसखरे को भूलें माकूल है, जादूगर के लिए परेशानी का सबब.
टोपी से उड़कर कबूतर बैठ सकता है किसी ऊँची मुंडेर पर
खरगोश पड़ा रह सकता है शराब के नशे में किसी भी कोने में.
मगर ये इल्म तब काम आता जब हमारी ज़िन्दगी कोई जादू का तमाशा होती.
* * *
हो सकता है कि एक दिन
हम संभल जायेंगे
ढाल लेंगे खुद को हालत के हिसाब से
खुशी और सुख को तलाश लेंगे.
हो सकता है कि एक दिन
के लिए सीखा हो हमने सबकुछ
बोलें छायाओं की तरह
चलें आहटों की तरह
गुम हो जाएँ दिनों की तरह.
हो सकता है कि एक दिन
हम हों ही नहीं...
जो कुछ भी हो सकता है, उसे होना ही चाहिए.
* * *
याद भी एक जादू है. कोई जादू कभी धोखा नहीं होता. इसलिए कि धोखा तब तक मुकम्मल नहीं है जब तक वह आपने न दिया हो. हर चीज़ जो बाहर जैसी हमें दिखाई देती है, उसका सब आकार-प्रकार, रंग-लक्षण और प्रकृति हमारे भीतर से आती है. हम बिना छुए कैसे जान लेते हैं कि वह चीज़ तिकोनी है. इसलिए कि हमने सीख रखा है कि दिखाई पड़ने वाली त्रिआयामी वस्तु तिकोनी है. ऐसे ही हम अपने आप को अनेक सीख देते रहते हैं. ये सुख है. ये दुख है. और ऐसी अनेक सीखों के बोझ तले अव्यापार जमा करते हैं. इसी तरह जब हम दोष देते हैं वे दोष हमारे अपने होते हैं. उन सब दोषों का निर्यात नहीं किया जा सकता वे सब दोष उत्पादित या आयातित होते हैं. जैसे पानी गंदला नहीं होता अगर उसके भीतर मिट्टी नहीं होती. मिट्टी पानी के भीतर है. कोई आकाश धूसर न होता अगर हवा कुछ बारीक धूल उड़ा न लाती. कोई मिट्टी दलदल न होती अगर वह पानी को अपने पास न रखती. इसी तरह सब कुछ. मन के दर्पण पर जितनी खरोंचे हैं वे अपने ही नाखूनों की हैं. याद में जितने ज़हरीले कांटे हैं वे खुद के बोये हुए हैं. इससे भी बड़ी बात कि वे खरोंचे हैं या नहीं ये हमें नहीं मालूम, वे ज़हर भरे कांटे हैं ये भी एक अनुमान भर है.* * *
पेंटिंग अलेक्जेंडर की है शीर्षक है द मेजिसीयन.
स्टेज पर कभी नहीं होता गधा.
सब सामने कुर्सियों पर बैठते हैं.
* * *
गधा एक बुद्धिमान प्राणी है
ज़रा सा बोझ उठाकर
दुनिया भर की चिंताओं से हो जाता है मुक्त.
* * *
प्रेम की ही तरह
जादू सम्मोहन नहीं
यकीन की बात है.
* * *
मसखरे की नाकामी हो सकती है हंसी का सबब
मगर जादूगर के लिए सफाई को बुनना होता है नफासत से
कि जो मसखरे को भूलें माकूल है, जादूगर के लिए परेशानी का सबब.
टोपी से उड़कर कबूतर बैठ सकता है किसी ऊँची मुंडेर पर
खरगोश पड़ा रह सकता है शराब के नशे में किसी भी कोने में.
मगर ये इल्म तब काम आता जब हमारी ज़िन्दगी कोई जादू का तमाशा होती.
* * *
हो सकता है कि एक दिन
हम संभल जायेंगे
ढाल लेंगे खुद को हालत के हिसाब से
खुशी और सुख को तलाश लेंगे.
हो सकता है कि एक दिन
के लिए सीखा हो हमने सबकुछ
बोलें छायाओं की तरह
चलें आहटों की तरह
गुम हो जाएँ दिनों की तरह.
हो सकता है कि एक दिन
हम हों ही नहीं...
जो कुछ भी हो सकता है, उसे होना ही चाहिए.
* * *
याद भी एक जादू है. कोई जादू कभी धोखा नहीं होता. इसलिए कि धोखा तब तक मुकम्मल नहीं है जब तक वह आपने न दिया हो. हर चीज़ जो बाहर जैसी हमें दिखाई देती है, उसका सब आकार-प्रकार, रंग-लक्षण और प्रकृति हमारे भीतर से आती है. हम बिना छुए कैसे जान लेते हैं कि वह चीज़ तिकोनी है. इसलिए कि हमने सीख रखा है कि दिखाई पड़ने वाली त्रिआयामी वस्तु तिकोनी है. ऐसे ही हम अपने आप को अनेक सीख देते रहते हैं. ये सुख है. ये दुख है. और ऐसी अनेक सीखों के बोझ तले अव्यापार जमा करते हैं. इसी तरह जब हम दोष देते हैं वे दोष हमारे अपने होते हैं. उन सब दोषों का निर्यात नहीं किया जा सकता वे सब दोष उत्पादित या आयातित होते हैं. जैसे पानी गंदला नहीं होता अगर उसके भीतर मिट्टी नहीं होती. मिट्टी पानी के भीतर है. कोई आकाश धूसर न होता अगर हवा कुछ बारीक धूल उड़ा न लाती. कोई मिट्टी दलदल न होती अगर वह पानी को अपने पास न रखती. इसी तरह सब कुछ. मन के दर्पण पर जितनी खरोंचे हैं वे अपने ही नाखूनों की हैं. याद में जितने ज़हरीले कांटे हैं वे खुद के बोये हुए हैं. इससे भी बड़ी बात कि वे खरोंचे हैं या नहीं ये हमें नहीं मालूम, वे ज़हर भरे कांटे हैं ये भी एक अनुमान भर है.* * * पेंटिंग अलेक्जेंडर की है शीर्षक है द मेजिसीयन.
Published on September 06, 2014 23:11
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