किसी बात का तो है
जब गर्मी बढ़ती है तो हवा गर्म होकर ऊपर उठ जाती है। हवा के ऊपर उठने से खाली हुई जगह को भरने के लिए हवा आने लगती है। जितनी तेज़ गर्मी उतनी ही तेज़ हवा। फिर आंधी आने लगती है। गर्मी तब भी नहीं रुकती तो रेगिस्तान की बारीक धूल आसमान पर छा जाती है। सूरज के ताप और धरती के बीच धूल की चादर तन जाती है। ऊर्जा के अजस्र स्रोत के तेज़ को पैरों तले की धूल भी बेअसर कर देती है।
धूल सांस में घुलने लगती हैं। आंखों में भरने लगती है। दिखाई नहीं देता, सांस नहीं आती। हर शै पर गुबार धूल की चादर तान देता है। लगता है धूल का साम्राज्य स्थापित हो गया है। फिर पानी की चंद बूंदें धूल को बहाकर वापस धरती पर पैरों तले डाल देती है। पैरों की धूल हवा पर सवार होकर ख़ुद को आकाशवासी समझने लगती है लेकिन ये पल भर का तमाशा ठहरता है।
पानी के बरसते ही दबी कुचली घास हर जगह से सर उठाने लगती है। वनलताएँ सारी दुनिया को ढक लेना चाहती हैं। रास्ते मिट जाते हैं। जंगल पसर जाता है। कांटे ख़ुद को जंगल का पहरेदार समझ हर एक से उलझते और चुभते हैं। सहसा हवा की दो एक झांय से कोई चिंगारी निकलती है और जंगल अपने पसार के गर्व को धू धू कर जलता देखता है। हरियाली का दर्प राख हो जाता है।
तुमको भी थोड़ा सा गर्व तो है ही किसी बात का?
धूल सांस में घुलने लगती हैं। आंखों में भरने लगती है। दिखाई नहीं देता, सांस नहीं आती। हर शै पर गुबार धूल की चादर तान देता है। लगता है धूल का साम्राज्य स्थापित हो गया है। फिर पानी की चंद बूंदें धूल को बहाकर वापस धरती पर पैरों तले डाल देती है। पैरों की धूल हवा पर सवार होकर ख़ुद को आकाशवासी समझने लगती है लेकिन ये पल भर का तमाशा ठहरता है।
पानी के बरसते ही दबी कुचली घास हर जगह से सर उठाने लगती है। वनलताएँ सारी दुनिया को ढक लेना चाहती हैं। रास्ते मिट जाते हैं। जंगल पसर जाता है। कांटे ख़ुद को जंगल का पहरेदार समझ हर एक से उलझते और चुभते हैं। सहसा हवा की दो एक झांय से कोई चिंगारी निकलती है और जंगल अपने पसार के गर्व को धू धू कर जलता देखता है। हरियाली का दर्प राख हो जाता है।
तुमको भी थोड़ा सा गर्व तो है ही किसी बात का?
Published on May 11, 2019 22:12
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