Ashtavakra Geeta Quotes

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Ashtavakra Geeta (Hindi Edition) Ashtavakra Geeta by Prakhar Pragyanand
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“जब भीतर की वासना शांत होगी, तभी निरोध होगा। उन्हें जागकर देखने, साक्षी-भाव से देखने तथा बोधपूर्वक देखने से निरोध होगा, अन्यथा नहीं।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“विषयों के प्रति आकर्षण का कारण भीतर चित्त में छिपी वासना है, जिससे वह उनके पीछे दौड़ता है। वास्तव में संसार इसका कारण नहीं है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“उद्देश्य-प्राप्ति के बाद सहारा छोड़ देना पड़ता है, तभी व्यक्ति निष्काम और निरालंब होता है। मन-बुद्धि की ऐसी अवस्था ही मुक्ति है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“सुख ज्ञान का फल है। अज्ञानी को सुख कहाँ?”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“जिसने जान लिया, मौन हो जाता है,”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“परमात्मा इतना विराट् है कि वह क्षुद्र बुद्धि के घेरे में समाता ही नहीं।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“करना मात्र मन से होता है, क्योंकि मन का भोजन ही कर्म है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“ज्ञानी पदार्थों को नहीं देखता, वह केवल उसी अविनाशी आत्मा को देखता है। इस द्रष्टा का ज्ञान ही धर्म है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“इच्छा करना ही अशांति का कारण है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“व्यक्ति स्वयं ब्रह्म हो जाता है, जो वह है ही, केवल जान लेता है। साधना का अभ्यास करने की कोई आवश्यकता नहीं, केवल निश्चयपूर्वक जान लेना है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“आत्मज्ञान एवं मोक्ष के लिए अपने को समर्पित भाव से छोड़ देना ही पर्याप्त है। अभ्यास मात्र छोड़कर निश्चेष्ट भाव से अपने को समर्पित कर देना चाहिए। यही आत्मज्ञान है, यही मुक्ति है। क्रिया से बाहरी ज्ञान तो मिल सकता है, पर आत्मज्ञान नहीं। इसके लिए अक्रिया ही मार्ग है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“स्व के सागर में डुबकी लगाना ही मोक्ष है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“ज्ञानी मूढ़वत् व्यवहार इसलिए करता है कि उसके कार्य में बाधा न पड़े।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“अहंकार पहले उद्देश्य निश्चित करता है, फिर कर्म में प्रवृत्त होता है। उसे फल चाहिए, जिससे उसकी वासना की तृप्ति हो सके।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“मुक्ति के लिए कर्म नहीं छोड़ना है प्रत्युत अहंकार छोड़ना”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“अहंकार ही मूल पाप है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“जिसने संसार को भोगा है तथा जो चिंतन की पराकाष्ठा पर पहुँचा है, वही आत्मज्ञान के फल को प्राप्त करता है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“बुद्धिजीवी अनेक प्रकार के विचारों में उलझा रहता है। वह संसार, कर्म, भोग, अध्यात्म, ईश्वर, परमात्मा, आत्मा आदि अनेक विषयों का अध्ययन, चिंतन एवं मनन करता है; किंतु उसे शांति नहीं मिलती।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“संन्यास लिया नहीं जाता, होता है। यह कार्य नहीं है, अनुभूति है, उत्कृष्ट जीवन की ओर बढ़ा हुआ एक कदम है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“संन्यास संसार के अनुभवों का सार या निचोड़ है, उनकी निष्पत्ति है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“इंद्रियों के भोगों से तृप्त हो जाता है, उसे उसमें कोई सार नहीं दिखाई देता, उसे उसमें रस नहीं आता, तब संन्यास का जन्म होता है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“मुक्ति भी ज्ञान से होती है, कर्म से नहीं।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“ज्ञानी पुरुष इच्छामात्र का ही त्याग कर देता है। वह न त्याग की इच्छा करता है और न ग्रहण की। वह केवल आत्मा में रमण करता हुआ निर्मल चित्तवाला होकर शाश्वत सुख का उपभोग करता है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“ज्ञानी अपने आग्रह का त्याग करके, प्रकृति-रूपी वायु से प्रेरित होकर कार्य करता है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“जो चेतना है, वही उसकी आत्मा है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“सर्वस्र एक ही ब्रह्म की अनुभूति होती है, फिर कौन किसका चिंतन करे! ज्ञान की यही चरम स्थिति अद्वैत की है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“ज्ञानी वासना-रहित हो जाने के कारण संसार को देखता हुआ भी नहीं देखता है। वह नित्य आत्मा को ही सर्वस्र देखता है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“मन की अच्छी-बुरी सभी वृत्तियों का शांत हो जाना ही मोक्ष है। सभी भेद समाप्त कर उस एक परम तत्त्व में स्थित हो जाना ही मुक्ति है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“सदा ही आत्मा का सर्वस्र अनुभव करता हुआ नित्य आत्मानंद में ही मग्न रहता है। आत्मज्ञानी अहंकार एवं संकल्प-विकल्प से रहित होने पर हर स्थिति में अनाग्रहपूर्वक रहकर स्वाभाविक जीवन जीता है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta
“सृष्टि ही परमात्मा है। ऐसा निश्चयपूर्वक वही जानता है, जिसे इसका अनुभव हो गया है। यह स्वयं के भीतर प्रवेश करने से, निःशब्द, शांति, मौन में शून्य होने से ही जाना जा सकता है। जब तुम मिटोगे, तभी परमात्मा है।”
Prakhar Pragyanand, Ashtavakra Geeta

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