Padmavat Quotes

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Padmavat (Hindi Edition) Padmavat by Ramchandra Shukla
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Padmavat Quotes Showing 1-23 of 23
“लागीं सब मिलि हेरै, बूड़ि बूड़ि एक साथ। कोइ उठी मोती लेइ, काहू घोंघा हाथ॥ 7 ॥”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“खेलत मानसरोवर गईं। जाइ पाल पर ठाढ़ी भईं॥ देखि सरोवर हँसैं कुलेली। पदमावति सौं कहहिं सहेली॥ ए रानी! मन देखु बिचारी। एहि नैहर रहना दिन चारी॥ जौ लगि अहै पिता कर राजू। खेलि लेहु जो खेलहु आजू॥ पुनि सासुर हम गवनब काली। कित हम, कित यह सरवर पाली॥ कित आवन पुनि अपने हाथा। कित मिलि कै खेलब एक साथा॥ सासु ननद बोलिन्ह जिउ लेहीं। दारुन ससुर न निसरै देहीं॥ पिउ पियार सिर ऊपर, पुनि सो करै दहुँ काह। दहुँ सुख राखै की दुख, दहुँ कस जनम निबाह॥ 2 ॥ मिलहिं रहसि सब चढ़हिं हिंडोरी।”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“समंद=बादामी रंग का घोड़ा। हाँसुल=कुम्मैत हिनाई, मेहंदी के रंग का और पैर कुछ काले। भौंर=मुश्की। कियाह=ताड़ के पके फल के रंग का। हरे=सब्जा। कुरंग=लाख के रंग का या नीला कुम्मैत। महुअ=महुए के रंग का। गरर=लाल और सफेद मिले रोएँ का, गर्रा। कोकाह=सफेद रंग का। बुलाह=बोल्लाह, गर्दन और पूँछ के बाल पीले।”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“9”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“काहू भोग भुगुति सुख सारा। काहू बहुत भूख दुख मारा॥ सबै नास्ति वह अहथिर, ऐस साज जेहि केर। एक साज औ भाँजै, चहै सँवारै फेर॥ 6 ॥ अलख”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“उस अखंड ज्योति का आभास पाकर वह मानस (मानसरोवर और हृदय) जगमगा उठा। देखिए न, खिले कमल के रूप में उल्लास मानसर में चारों ओर फैला है। उस ज्योति के साक्षात्कार से अज्ञान छूट गया—प्रभात हुआ, पृथ्वी पर से अन्धकार हट गया। आनन्द से चेहरा (देही=बदन=मुँह) खिल उठा, बत्तीसी निकल आई13—कमल खिल उठे और उन पर भौंरे दिखाई दे रहे हैं। अन्तर्जगत् और बाह्यजगत् का कैसा अपूर्व सामंजस्य है, कैसी बिम्ब-प्रतिबिम्ब स्थिति है!”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“निर्जन स्थानों के बीच मर्मर करते हुए काननों में, झरनों में, उन पुष्पों की परागगन्ध में जो उस दिव्य चुम्बन के सुखस्पर्श से सोए हुए कुछ बर्राते से मुग्ध पवन को उसका परिचय दे रहे हैं। इसी प्रकार मन्द या तीव्र समीर में, प्रत्येक दौड़ते हुए मेघखंड की झंड़ी में, वसन्त के विहंगमों में, कलकूजन में तथा प्रत्येक ध्वनि में और नि:स्तब्धता में भी मैं उसी की वाणी सुनता हूँ।”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“बहुतै जोति जोति ओहि भई। रवि, ससि, नखत दिपहिं ओहि जोती। रतन पदारथ मानिक मोती॥ जहँ जहँ बिहँसि सुभावहिं हँसी। तहँ तहँ छिटकि जोति परगसी॥ नयन जो देखा कँवल भा, निरमल नीर सरीर। हँसत जो देखा हंस भा, दसनजोति नग हीर॥”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“हिन्दी के कवियों में यदि कहीं रमणीय और सुन्दर अद्वैती रहस्यवाद है तो जायसी में, जिनकी भावुकता बहुत ही ऊँची कोटि की है। वे सूफियों की भक्तिभावना के अनुसार कहीं तो परमात्मा को प्रियतम के रूप में देखकर जगत् के नाना रूपों में उस प्रियतम के रूपमाधुर्य्य की छाया देखते हैं और कहीं सारे प्राकृतिक रूपों और व्यापारों का ‘पुरुष’ के समागम के हेतु प्रकृति के श्रृंगार, उत्कंठा या विरहविकलता के रूप में अनुभव करते हैं। दूसरे प्रकार की भावना पद्मावत में अधिक मिलती है।”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“कबीरदास पर इस्लाम के कट्टर एकेश्वरवाद और वेदान्त के मायावाद का रूखा संस्कार भी पूरा-पूरा था। उनमें वाक्चातुर्य था, प्रतिभा थी, पर प्रकृति के प्रसार में भगवान् की कला का दर्शन करनेवाली भावुकता न थी।”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“रहस्यवाद को लेकर, जिसमें वेदान्त और सूफी मत दोनों का मेल था। पहले पहल नामदेव ने, फिर रामानन्द के शिष्य कबीर ने जनता के बीच इस ‘सामान्य भक्तिमार्ग’ की अटपटी वाणी सुनाई। नानक, दादू आदि कई साधक इस नए मार्ग के अनुयायी हुए, और ‘निर्गुण संत मत’चल पड़ा। पर इधर यह निर्गुण भक्तिमार्ग निकला उधर भारत के प्राचीन ‘सगुण मार्ग’ ने भी, जो पहले से चला आ रहा था, जोर पकड़ा और राम कृष्ण की भक्ति का स्रोत बड़े वेग से हिन्दू जनता के बीच बहा। दोनों की प्रवृत्ति में बड़ा अन्तर यह दिखाई पड़ा कि एक तो लोकपक्ष से उदासीन होकर केवल व्यक्तिगत साधना का उपदेश देता रहा पर दूसरा अपने प्राचीन स्वरूप के अनुसार लोकपक्ष को लिए रहा। ‘निर्गुन बानी’ वाले सन्तों के लोकविरोधी स्वरूप को गोस्वामी तुलसीदासजी ने अच्छी तरह पहचाना था।”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“सिन्ध प्रदेश ऐसे सूफियों का अड्डा रहा जो यहाँ वेदान्तियों और साधकों के सत्संग से अपने मार्ग की पुष्टि करते रहे। अतः मुसलमानों का साम्राज्य स्थापित हो जाने पर हिन्दुओं और मुसलमानों के समागम से दोनों के लिए जो एक ‘सामान्य भक्तिमार्ग’ आविर्भूत हुआ वह अद्वैती।”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“अवतारवाद के सिद्धान्त रूप से प्रतिष्ठित हो जाने के कारण भारतीय परम्परा का भक्त अपने उपास्य को बाहर लोक के बीच प्रतिष्ठित करके देखता है, अपने हृदय के एकान्त कोने में ही नहीं। पर फारस में भावात्मक अद्वैती रहस्यवाद खूब फैला। वहाँ की शायरी पर इसका रंग बहुत गहरा चढ़ा। खलीफा लोगों के कठोर धर्मशासन के बीच भी सूफियों की प्रेममयी वाणी ने जनता को भावमग्न कर दिया। इसलाम”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“भारतवर्ष में साधनात्मक रहस्यवाद ही हठयोग, तन्त्र और रसायन के रूप में प्रचलित था।”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“महाप्रभुजी की मंडली भी नाचते-नाचते मूर्छित हो जाती थी। यह मूर्छा रहस्यवादी सूफियों की रूढ़ि है। इसी प्रकार मद, प्याला, उन्माद तथा प्रियतम ईश्वर के विरह की दूरारूढ़ व्यंजना भी सूफियों की बँधी हुई परम्परा है। इस परम्परा का अनुसरण भी कुछ पिछले कृष्णभक्तों ने किया। नागरीदासजी इश्क का प्याला पीकर बराबर झूमा करते थे।”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“मीराबाई हुईं जो ‘लोकलाज खोकर’ अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के प्रेम में मतवाली रहा करती थीं। उन्होंने एक बार कहा था कि ‘कृष्ण को छोड़ और पुरुष है कौन? सारे जीव स्त्रीरूप हैं।”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“पति या प्रियतम के रूप में भगवान् की भावना को वैष्णव भक्तिमार्ग में ‘माधुर्य्य भाव’ कहते हैं। इस भाव की उपासना में रहस्य का समावेश अनिवार्य और स्वाभाविक है।”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“अवतारवाद के सिद्धान्त रूप में गृहीत हो जाने पर, राम और कृष्ण के व्यक्त ईश्वर विष्णु के अवतार स्थिर हो जाने पर रहस्यदशा की एक प्रकार से समाप्ति हो गई। फिर राम और कृष्ण का ईश्वर के रूप में ग्रहण व्यक्तिगत रहस्यभावना के रूप में नहीं रह गया। वह समस्त जनसमाज के धार्मिक विश्वास का एक अंग हो गया।”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“टा टुक झाँकहु सातौं खंडा। खंडै खंड लखहु बरम्हंडा॥ पहिल खंड जो सनीचर नाऊँ। लखि न अँटकु पौरी महँ ठाऊँ॥ दूसर खंड बृहस्पति तहँवाँ। काम दुवार भोगघर जहँवाँ॥ तीसर खंड जो मंगल मानहुँ। नाभि कँवल महँ ओहि अस्थानहु। चौथ खंड जो आदित अहई। बाईं दिसि अस्तन महँ रहई। पाँचवँ खंड सुक्र उपराहीं। कंठ माहँ औ जीभ तराहीं॥ छठएँ खंड बुद्धि कर बासा। दोउ भौंहन्ह के बीच निवासा॥ सातवँ सोम कपार महँ, कहा जो दसवँ दुवार। जो वह पवँरि उघारै, सो बड़ सिद्ध अपार॥”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“आपुहि आपु जो देखै चहा। आपनि प्रभुत आप से कहा॥ सबै जगत दरपन कै लेखा। आपुहि दरपन, आपुहि देखा॥ आपुहि बन औ आपु पखेरू। आपुहि सौजा, आपु अहेरू॥ आपुहि पुहुपे फूलि बन फूलै। आपुहि भँवर बासरस भूलै॥ आपुहि घट घट महँ मुख चाहै। आपुहि आपन रूप सराहै॥ दरपन बालक हाथ, मुख देखै, दूसर गनै।”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“जब चीन्हा तब और न कोई। तन मन, जिउ, जीवन सब सोई॥ ‘हौं हौं’ कहत धोख इतराहीं। जब भा सिद्ध कहाँ परछाहीं? चित्”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“सोऽहं सोऽहं’ बसि जो करई। सो बूझै, सो धीरज धरई॥”
Ramchandra Shukla, Padmavat
“हौं हौं कहत सबै मति खोई। जौ तू नाहिं आहि सब कोई॥ आपुहि गुरु सो आपुहि चेला। आपुहि सब औ आपु अकेला॥”
Ramchandra Shukla, Padmavat