महाभोज Quotes

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महाभोज महाभोज by Mannu Bhandari
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महाभोज Quotes Showing 1-30 of 42
“क्योंकि वह ज़िंदा था! ज़िंदा रहने का मतलब समझते हैं न आप?”
Mannu Bhandari, महाभोज
“जो ज़िंदगी को इतना प्यार करता हो...अपनी ही नहीं, हर किसी की ज़िंदगी को...वह आत्महत्या करेगा? नहीं साहब, नहीं...नहीं! उसे मारा गया है!’ ‘पर किसने मारा? क्यों मारा?”
Mannu Bhandari, महाभोज
“मन में जैसे धीरे-धीरे कोई कराह रहा”
Mannu Bhandari, महाभोज
“आवेश उसका सिसकियों में बदल जाता है और गर्जना कराह में।”
Mannu Bhandari, महाभोज
“कहाँ से होगी दूसरी क्रांति और कौन करेगा उस क्रांति को”
Mannu Bhandari, महाभोज
“हज़ार प्रश्नों के सलीब पर टँगा हुआ उनका मन”
Mannu Bhandari, महाभोज
“भीतरी उबाल और बाहरी दबाव के बीच”
Mannu Bhandari, महाभोज
“एक ख़ास तरह की तुर्शी और तेज़ी आ गई उसके मिज़ाज में।”
Mannu Bhandari, महाभोज
“धोती के नीचे सभी नंगे और ससुरी इस राजनीति में तो धोती के बाहर भी नंगे।”
Mannu Bhandari, महाभोज
“ऊँचे क़िस्म की घाघ और घुन्नी चीज”
Mannu Bhandari, महाभोज
“सहमते मन से सब अपनी-अपनी कुर्सियों के पाए सहलाने लगे!”
Mannu Bhandari, महाभोज
“इस तरह की भाषणबाज़ी करते हुए तुम काफ़ी बड़े चुग़द लगते”
Mannu Bhandari, महाभोज
“कुछ बातें, कुछ तथ्य, कुछ स्थितियाँ प्रचलित होते-होते सबके बीच इस तरह स्वीकृति पा लेती हैं कि वे फिर लोगों की सोच की सीमा में रहती ही नहीं।”
Mannu Bhandari, महाभोज
“स्वर में आवेश क़तई नहीं होता, पर इस हद तक का ठंडापन कि सुननेवाला जम जाए पूरी तरह।”
Mannu Bhandari, महाभोज
“लोगों के बीच ही नहीं, लोगों के मन में जगह बनाना ही असली उद्देश्य”
Mannu Bhandari, महाभोज
“आदमी जब अपनी सीमा और सामर्थ्य को भूलकर कामना करने लगे तो समझ लो, पतन की दिशा में उसका क़दम बढ़ गया।”
Mannu Bhandari, महाभोज
“लोगों के घर, ज़मीन और गाय-बैल ही रेहन नहीं रखे हुए हैं जोरावर और सरपंच के यहाँ, उनकी आवाज़ और जबान तक बंधक रखी हुई है।”
Mannu Bhandari, महाभोज
“उसकी आँखों के डोरों में फिर सुर्ख़ी उभर आई,”
Mannu Bhandari, महाभोज
“और जो ज़िंदा हैं, वे अब जी नहीं सकते अपने इस देश में। मार दिए जाते हैं, कुत्ते की मौत!”
Mannu Bhandari, महाभोज
“मत टसुए बहा, हरामज़ादी! मेरे भीतर सुलगती आग इन आँसुओं से ठंडी हो गई तो सबकी तरह ज़नख़ा हो जाऊँगा मैं भी।”
Mannu Bhandari, महाभोज
“बस समझ लीजिए सर, हम सब लोगों के ज़िंदा रहने पर प्रश्नचिन्ह लगाकर वह मर गया”
Mannu Bhandari, महाभोज
“आँखों की कोरों से दो बूँदें ढुलककर झुर्रियों में ही बिला गईं।”
Mannu Bhandari, महाभोज
“अपनी पनीली आँखें ज़मीन में गाड़ दीं।”
Mannu Bhandari, महाभोज
“जनता की एकता–कुर्सी के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है।”
Mannu Bhandari, महाभोज
“उम्मीद की डोर से बँधा हुआ आदमी भी बहुत कुछ कर गुज़रता है कभी-कभी!”
Mannu Bhandari, महाभोज
“ओस-भीगी दूब पर घूमने से केवल नेत्रों की ज्योति ही नहीं बढ़ती, मन-मस्तिष्क में भी ऐसी तरावट आती है कि सारा दिन आदमी तनाव-मुक्त होकर काम कर सकता है। मन शांत, चित्त प्रफुल्लित!”
Mannu Bhandari, महाभोज
“आत्मा के साथ बलात्कार करने की व्यथा क्या होती”
Mannu Bhandari, महाभोज
“दूसरों के हुकुम पर चलकर अपना वजूद रख सकेंगे”
Mannu Bhandari, महाभोज
“नज़रें ज़मीन पर और मन गड्‌ढे में।”
Mannu Bhandari, महाभोज
“आस्था से कही बात और आस्था से किया काम दूसरे तक न पहुँचे, यह हो ही नहीं”
Mannu Bhandari, महाभोज

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