Sankshipt Quotes
Sankshipt
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Harsh Ranjan6 ratings, 2.83 average rating, 0 reviews
Sankshipt Quotes
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“गुंजन ने प्रभात को बुलाया था। दोनों बातें एक साथ हुई। हस्पताल में मंजू पड़ी थी और प्रभात वहाँ से निकल पड़ा। इतने दिनों बाद गुंजन…उसे लगा था कि वो अब नहीं आयेगी। उसके सामने थे उसके फलैट के वही रास्ते! वही मोड़। गुंजन ने उसे देखकर आँखें बंद कर ली थी! ऐसा लगा जैसे डर गयी हो। वह खुद भी पहचान में नहीं आ रही थी। इन कमरों में उसे हमेशा लाल कपड़ों में देखा जाता था! माथे पर सिंदूर और हाथों में ढेर सारी चूड़ियाँ पर आज…ऐसा लग रहा है जैसे कि कोई सन्यासिन…
-वो तो मैं बनना चाहती थी और बार-बार मैंने आपको भी उसी तरह बदलने की कोशिश की पर मुझे ही झुकना पड़ा।
प्रभात ने कमरे में एक शक्ति की अनुभूति की जो संभवतः उसकी ही थी और कमरे का माहौल हर बार से बिल्कुल बदला हुआ था। ये कमरा उसकी बाहरी जिन्दगी के उन क्षणों का प्रतिबिम्ब होता था जो कि वो आपने साथ गुजरती थी।
गुंजन की आँखों की चमक अलग थी और उसमें एक सादापन नजर आ रहा था जो कि उसमें कभी नहीं देखा गया था।
वह कह नहीं पायी पर उसकी आँखों में वो शक्ति जैसे कि उभरी हो। वह प्रभात के उस दूसरे चेहरे से वह उसका शरीर माँग रही थी।
गुंजन को मंजू के बारे में पता था। … मंजू! … उसका दर्द … उसकी गोद में अब एक छोटा सा बच्चा था! बहुत प्यारा बच्चा … उसकी आँखें …….उसकी नाक …. उसका मुँह…. उसका चेहरा ……. चेहरा!
प्रभात ने उस दूसरे चेहरे को ढूंढ़ा पर शायद उस बच्चे ने उसकी गोद में आने के बाद चुपके से उसे उतार लिया था।
प्रभात ने उस बच्चे को उतारकर वापस मंजू की गोद में दे दिया। मंजू की आँखों में खुशी थी। उसका चेहरा प्रभात को गुंजन के चेहरे से मिलता लग रहा था! जिसे वह अभी-अभी देखकर यहाँ आया है।
वहाँ गुंजन भी मुस्करा रही थी और यहाँ मंजू भी। प्रभात के पास जैसे कि अब कोई भी चेहरा नहीं बचा था। उस बच्चे ने उसके सिर पर से एक भारी बोझ उतार दिया। वह चुपचाप बाहर चला गया।
उसे काफी दिनों बाद उस शरीर को देखने का मौका मिला था जिसके दर्द को वह बहुत दिनों से केवल अनुभव ही कर पा रहा था।
उसने अपने आप को टटोला! लगा कि उसके दोनों चेहरों के बाद अब यहाँ केवल घाव थे। हर एक से पस और खून रिस रहा था।
उसकी कूबड़ी परछाई ने उसका पीछा करना छोड़ दिया था और उसका मन खुद उसे हल्का लग रहा था। उसे लगा कि जैसे अब कोई उलझन नहीं! कोई काम नहीं ….
उसने अपनी धीरे – धीरे थमती हुई नसें टटोली …… आस-पास गुजर रहे लोग जैसे हल्के – फुल्के ;अपने अपने हिसाब से चेहरे उसे पहनाते रहे और वो अपने घायल! थके बीमार शरीर को समेटकर चुपचाप सड़क के एक किनारे पर बैठ गया।”
― Sankshipt
-वो तो मैं बनना चाहती थी और बार-बार मैंने आपको भी उसी तरह बदलने की कोशिश की पर मुझे ही झुकना पड़ा।
प्रभात ने कमरे में एक शक्ति की अनुभूति की जो संभवतः उसकी ही थी और कमरे का माहौल हर बार से बिल्कुल बदला हुआ था। ये कमरा उसकी बाहरी जिन्दगी के उन क्षणों का प्रतिबिम्ब होता था जो कि वो आपने साथ गुजरती थी।
गुंजन की आँखों की चमक अलग थी और उसमें एक सादापन नजर आ रहा था जो कि उसमें कभी नहीं देखा गया था।
वह कह नहीं पायी पर उसकी आँखों में वो शक्ति जैसे कि उभरी हो। वह प्रभात के उस दूसरे चेहरे से वह उसका शरीर माँग रही थी।
गुंजन को मंजू के बारे में पता था। … मंजू! … उसका दर्द … उसकी गोद में अब एक छोटा सा बच्चा था! बहुत प्यारा बच्चा … उसकी आँखें …….उसकी नाक …. उसका मुँह…. उसका चेहरा ……. चेहरा!
प्रभात ने उस दूसरे चेहरे को ढूंढ़ा पर शायद उस बच्चे ने उसकी गोद में आने के बाद चुपके से उसे उतार लिया था।
प्रभात ने उस बच्चे को उतारकर वापस मंजू की गोद में दे दिया। मंजू की आँखों में खुशी थी। उसका चेहरा प्रभात को गुंजन के चेहरे से मिलता लग रहा था! जिसे वह अभी-अभी देखकर यहाँ आया है।
वहाँ गुंजन भी मुस्करा रही थी और यहाँ मंजू भी। प्रभात के पास जैसे कि अब कोई भी चेहरा नहीं बचा था। उस बच्चे ने उसके सिर पर से एक भारी बोझ उतार दिया। वह चुपचाप बाहर चला गया।
उसे काफी दिनों बाद उस शरीर को देखने का मौका मिला था जिसके दर्द को वह बहुत दिनों से केवल अनुभव ही कर पा रहा था।
उसने अपने आप को टटोला! लगा कि उसके दोनों चेहरों के बाद अब यहाँ केवल घाव थे। हर एक से पस और खून रिस रहा था।
उसकी कूबड़ी परछाई ने उसका पीछा करना छोड़ दिया था और उसका मन खुद उसे हल्का लग रहा था। उसे लगा कि जैसे अब कोई उलझन नहीं! कोई काम नहीं ….
उसने अपनी धीरे – धीरे थमती हुई नसें टटोली …… आस-पास गुजर रहे लोग जैसे हल्के – फुल्के ;अपने अपने हिसाब से चेहरे उसे पहनाते रहे और वो अपने घायल! थके बीमार शरीर को समेटकर चुपचाप सड़क के एक किनारे पर बैठ गया।”
― Sankshipt
“- क्या बात है भईया आजकल अपनी क्लास की कम और गैर क्लास की लड़कियां पर आपका ज्यादा ध्यान है? - तुम किसके बारे में कह रहे हो? - एक ही तो है! - हर्ष ने कहा - मिस इंडिया! - असल बात मैं बताता हूँ! - वर्द्धन ने कहा - वो इस बार मैट्रिक की परीक्षा दे रही है। इसी में मैं उसकी मदद कर रहा हूँ। - भईया के पास तो फोन नंबर भी है उसका। - हर्ष ने मुस्कुराकर कहा। मैंने हसरत भरी निगाहों से उसे देखा। - नहीं! सोचो भी मत! - वर्द्धन साफ मुकर गया। - आप जो कहेंगे मैं सो करूँगा। - तमंचा सटा दोगे तो भी नहीं। - वर्द्धन ने कहा - खुद उससे पूछो। दे देती है नंबर तो अच्छी बात है। मुझे पहली बार अपने ‘मैं’ होने पर अफसोस हुआ और उसके ‘वो’ होने से ईर्ष्या हुई। क्लास में वो हर्ष की थी, क्लास से बाहर वो वर्द्धन की थी और घर लौटते वक्त मेरी ....... नहीं! मैं ऐसा नहीं कह सकता। मैं भारी चिंता में जी रहा था। कहाँ मेरी पैसेंजर ट्रेन और कहाँ नेहा की राजधानी एक्सप्रेस। मैं उसकी गति से गति कैसे मिलाऊँ, इसी चिंता में मैं जिया जा रहा था। हो सकता है कि कल वर्द्धन और नेहा एक ही कॉलेज में पढ़ने लगें। ऐसे में क्या होगा? मैं तो सीनियर्स की बराबरी नहीं कर सकता। मुझे लगने लगा कि मैं छोटा हूँ। इस छोटेपन के एहसास ने मुझे बड़ा रूलाया। खुद से बड़ी लड़की से प्यार करना कभी-कभी बड़ा कष्ट देता है। मुझे लगा कि मुझे नेहा का प्यार .......... प्यार बड़ी चीज है, कहें तो ध्यान पाने के लिये कम से कम वर्द्धन जैसा होना था, मतलब दो क्लास सीनियर और उम्र में”
― Sankshipt
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