ठिठुरता हुआ गणतंत्र Quotes

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ठिठुरता हुआ गणतंत्र ठिठुरता हुआ गणतंत्र by Harishankar Parsai
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“जनता के द्वारा न आकर अगर समाजवाद दफ़्तरों के द्वारा आ गया तो एक ऐतिहासिक घटना हो जाएगी।”
Harishankar Parsai, ठिठुरता हुआ गणतंत्र
“पिछले पच्चीस सालों से फ़िल्में देख रहा हूँ। पच्चीस सालों से रईस का बेटा ग़रीब की लड़की से शादी कर रहा है। फिर भी लोग पूँजीवाद के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। अज़ीब बदतमीज़ी है।”
Harishankar Parsai, ठिठुरता हुआ गणतंत्र
“पैसे कम हों, तो आदमी परमहंस हो जाता है। सच्चा संन्यासी पैसे की तंगी का शुभ परिणाम है।”
Harishankar Parsai, ठिठुरता हुआ गणतंत्र
“इस देश के बुद्धिजीवी सब शेर हैं, पर वे सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं।”
Harishankar Parsai, ठिठुरता हुआ गणतंत्र
“संविधान में जूते मारने का बुनियादी अधिकार तो होना ही चाहिए। आदमी के पेट में अन्न न हो, शरीर पर कपड़े न हों, पर पाँवों में जूता ज़रूर होना चाहिए, जिससे वह जब चाहे, बुनियादी अधिकार का उपयोग कर सके।”
Harishankar Parsai, ठिठुरता हुआ गणतंत्र
“इस देश में जो जिसके लिए प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा है।”
Harishankar Parsai, ठिठुरता हुआ गणतंत्र
“झूठ बोलने के लिए सबसे सुरक्षित जगह अदालत है। वहाँ सुरक्षा के लिए भगवान और न्यायाधीश हाजि़र होते हैं।”
Harishankar Parsai, ठिठुरता हुआ गणतंत्र
“एक साहब के एलबम में सैकड़ों उन्हीं की फ़ोटो हैं—विभिन्न मुद्राओं, विभिन्न स्थानों पर, विभिन्न प्रसंगों में। उनसे अगर कोई पूछे कि सबसे सुन्दर प्राकृतिक दृश्य कौन-सा है तो वे कहेंगे—“मेरा चेहरा। दाढ़ी वन है, मुँह गुफा और नाक पहाड़ी।” अगर कोई कलाकार लैंडस्केप चित्रण के लिए सुन्दर दृश्य की तलाश में हो, तो वे कहेंगे—“इधर-उधर क्यों भटकते हो! मेरा चेहरा तो हाजि़र है। इसी का चित्रण करो।”
Harishankar Parsai, ठिठुरता हुआ गणतंत्र
“वह तनख़्वाह का कम-से-कम दसवाँ हिस्सा ऐसे महँगे होटल में ख़र्च करेगा—इज़्ज़त के लिए, प्रतिष्ठित दिखने के लिए। वहाँ एक रुपये की कॉफ़ी के साथ पाँच रुपये की इज़्ज़त भी मिलती है।”
Harishankar Parsai, ठिठुरता हुआ गणतंत्र
“कितने लोग हैं जो ‘चरित्रहीन’ होने की साध मन में पाले रहते हैं, मगर हो नहीं सकते और निरे ‘चरित्रवान’ होकर मर जाते हैं।”
Harishankar Parsai, ठिठुरता हुआ गणतंत्र
“निन्दा में अगर उत्साह न दिखाओ तो करनेवालों को जूता-सा लगता है। वे तीन बार यह बात कह चुके और मैं चुप रहा, तो तीन जूते उन्हें लग गए। अब मुझे दया आ गई। उनका चेहरा उतर गया था।”
Harishankar Parsai, ठिठुरता हुआ गणतंत्र