शिव पुराण Quotes
शिव पुराण
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शिव पुराण Quotes
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“भगवान शिव का गोकर्ण नामक एक और तीर्थ है, जो कि उत्तर दिशा में स्थित है। यह महान ज्योतिर्लिंग संपूर्ण पापों का नाश करने वाला है। यह गोकर्ण क्षेत्र महा पवित्र है। इसी के पास एक सुंदर रमणीय महावन भी स्थित है। उसी महावन में चंद्रमौलि भगवान शिव वैद्यनाथ के रूप में स्थापित हैं, जो कि संसार के समस्त चराचर जीवों को सुख देने वाले, उनका कल्याण करने वाले तथा उनकी कामनाओं को पूरा करने वाले हैं। उनकी महिमा अद्भुत और अद्वितीय है। यहीं पर मिश्रर्षि नामक एक सुंदर मनोरम तीर्थ स्थल है। इसी स्थान पर महर्षि दधीचि द्वारा स्थापित दधीचेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग है।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“दोनों ज्योतिर्मय रूप धारण करके क्रौंच पर्वत पर सदा के लिए प्रतिष्ठित हो गए। उसी दिन से वह पवित्र लिंग मल्लिकार्जुन नाम से जगप्रसद्धि हुआ। मल्लिका देवी पार्वती का नाम है तथा अर्जुन शब्द शिव का समानार्थी है। उसी दिन से मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग में शिव-पार्वती का निवास माना जाता है।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“शिव बोले—हे चंद्रमा! मैं प्रजापति दक्ष के शाप को समाप्त नहीं कर सकता, पर उसका प्रभाव कम कर सकता हूं। माह के कृष्ण पक्ष में पंद्रह दिनों में तुम्हारी कलाएं क्षीण होंगी तथा शुक्ल पक्ष के पंद्रह दिनों में ये कलाएं बढ़ेंगी। चंद्रमा ने शिवजी से प्रार्थना करते हुए निवेदन किया कि आप देवी पार्वती सहित यहीं पर निवास करें। तब उनकी प्रार्थना को स्वीकारते हुए चंद्रमा के नाम से ही शिवजी सोमेश्वर कहलाए व संसार में सोमनाथ नाम से विख्यात हुए।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“शिव के मन में विचार आया कि इस संसार के सभी प्राणी तो कर्मपाश में बंधे रहेंगे। सांसारिक मोह-माया में पड़कर भला वे मुझे किस प्रकार पा सकेंगे। ऐसा सोचकर त्रिलोकीनाथ कल्याणकारी भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से पांच कोस नगरी उतारकर ब्रह्माण्ड से अलग की। तत्पश्चात उसमें अपने अविमुक्ति ज्योतिर्लिंग की स्थापना कर दी। यही पंचकोसी, कल्याणदायिनी, ज्ञानदात्री एवं मोक्षदात्री नगरी काशी कहलाई।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“यहां पर तो ऐसा कोई स्थान नहीं है जहां तपस्या की जा सके। तब भगवान शिव ने पांच कोस लंबे-चौड़े शुभ व सुंदर नगर की तुरंत रचना कर दी। वे दोनों त्रिलोकीनाथ भगवान शिव के चरणों का स्मरण करके वहां तपस्या करने लगे। उन्हें इस प्रकार तपस्या करते-करते बहुत समय बीत गया। उनकी कठिन तपस्या के कारण उनके शरीर से पसीने की बूंदें निकलीं। उन श्वेत जल की बूंदों को गिरता हुआ देखकर भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपना सिर हिलाया तभी उनके कान से एक मणि गिरी और वह स्थान मणिकर्णिका नाम से प्रसिद्ध हो गया।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“इस पृथ्वी लोक में दिखाई देने वाली प्रत्येक वस्तु सच्चिदानंद स्वरूप, निर्विकार एवं सनातन ब्रह्मरूप है। वह अद्वितीय परमात्मा ही सगुण रूप में शिव कहलाए और दो रूपों में प्रकट हुए। वे शिव ही पुरुष रूप में शिव एवं स्त्री रूप में शक्ति नाम से प्रसिद्ध हुए।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“ऋषिगण शिव-धर्म से विमुख होकर कांची नामक नगरी में चले गए। अट्ठाईसवां अध्याय वैद्यनाथेश्वर शिव माहात्म्य सूत जी बोले—हे ब्राह्मणो!”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“शिवजी को काले तिल चढ़ाएं। भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र भीम, महान, भीम, ईशान नामक आठ शिव नामों का उच्चारण करते हुए कमल और कनेर के फूल शिवजी पर चढ़ाएं।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“विमलोदयः, आत्मयोनिः, अनाद्यंतः, वत्सलः, भक्तलोकधृक्, गायत्रीवल्लभः, प्रांशु, विश्वावासः, प्रभाकरः, शिशुः, गिरिरतः, सम्राट, सुषेणः सुरशत्रुहा, अमोघरिष्टनेमिः, कुमुदः, विगतज्वरः, स्वयं ज्योतिस्तनुज्योतिः, आत्मज्योतिः, अचंचल, पिंगलः, कपिलश्मश्रुः, भालनेत्र, त्रयीतनुः, ज्ञानस्कंदो महानीतिः, विश्वोत्पत्तिः, उप्लवः, भगो विवस्वानादित्यः, योगपारः, दिवस्पतिः, कल्याणगुणनामा, पापहा, पुण्यदर्शनः, उदारकीर्तिः, उद्योगी, सद्योगी सदसन्मयः, नक्षत्रमाली, नाकेशः, स्वाधिष्ठानपदाश्रयः, पवित्रपापहारी, मणिपूरः, नभोगतिः, हृत्पुण्डरीकमासीनः, शक्रः, शांतः, वृषाकपिः, उष्णः, गृहपतिः, कृष्णः, समर्थ, अनर्थनाशनः, अधर्मशत्रुः, अज्ञेयः, पुरुहूतः पुरुश्रुतः, ब्रह्मगर्भः, बृहद्गर्भः, धर्मधेनुः, धनागमः, जगद्धितैषी, सुगतः, कुमारः, कुशलागमः, हिरण्यवर्णो ज्योतिष्मान्, नानाभूतरतः, ध्वनिः, अरागः, नयनाध्यक्षः, विश्वामित्रः, धनेश्वरः, ब्रह्मज्योतिः, वसुधामा, महाज्योतिरनुत्तमः, मातामहः, मातरिश्वा नभस्वान, नागहारधृक्, पुलस्त्यः, पुलहः, अगस्त्यः, जातूकर्ण्यः, पराशरः, निरावरणनिर्वारः, वैरंच्यः, विष्टश्रवाः, आत्मभूः, अनरिुद्धः, अत्रिः, ज्ञानमूर्तिः, महायशाः, लोकवीराग्रणीः, वीरः, चण्डः, सत्यपराक्रमः, व्यालाकल्पः, महाकल्पः। कल्पवृक्षः, कलाधरः, अंलकरिष्णुः, अचलः, रोचिष्णुः, विक्रमोन्नतः, आयुः शब्दपतिः, वेगी प्लवनः, शिखिसारथिः, असंसृष्टः, अतिथिः, शक्रप्रमाथी, पादपासनः, वसुश्रवाः, हव्यवाहः, प्रतप्तः, विश्वभोजनः, जप्यः, जरादिशमनः, लोहितात्मा तनूनपात्, बृहदश्व, नभोयोनिः, सुप्रतीकः, तमिस्रहा, निदाघस्तपनः, मेघः,”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“उनके क्रोध से तत्काल ही एक पुरुष उत्पन्न हो गया, उसका नाम भैरव था। भगवान शिव ने उस पुरुष को आदेश देते हुए कहा—हे कालराज! तुम साक्षात काल के समान हो। इसलिए आज से तुम जगत में काल भैरव के नाम से विख्यात होगे। तुम ब्रह्मा पर शासन करो और उनके गर्व को नष्ट करो तथा इस संसार का पालन करो। आज से मैं तुम्हें काशीपुरी का आधिपत्य प्रदान करता हूं।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“सर्वप्रथम ‘ऋग्वेद’ भगवान शिव का स्मरण करते हुए बोले—हे ब्रह्मन्! हे श्रीहरि! जिसके भीतर समस्त भूत निहित हैं तथा जिसके द्वारा सबकुछ प्रवृत्त होता है, जिन्हें इस संसार में परम तत्व कहा जाता है, वह एक भगवान शिव ही हैं। तब ‘यजुर्वेद’ बोले कि उन परमेश्वर भगवान शिव की कृपा से ही वेदों की प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है। उन्हीं भगवान शिवशंकर को संपूर्ण यज्ञों तथा योग में स्मरण किया जाता है। तत्पश्चात ‘सामवेद’ बोले कि जो समस्त संसार के लोगों को भरमाता है और जिसकी खोज में सदा ऋषि-मुनि लगे रहते हैं, जिनकी कांति से सारा विश्व प्रकाशमान होता है वह त्र्यंबक महादेव जी हैं। इस पर ‘अथर्व’ बोल उठे, भक्ति से साक्षात्कार कराने वाले तथा समस्त दुखों का नाश करने वाले एकमात्र देव भगवान शिव ही हैं।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“सखी उषा के अनुरोध पर चित्रलेखा ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी की रात को द्वारका नगरी गई और वहां राजमहल से अनिरुद्ध को ले आई।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“उन्होंने इंद्रियों की चंचलता को दूर करने के लिए उसे भावना रूपी जल से प्रक्षालित किया”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“ज्योर्तिलिंग की स्थापना की। फिर शिवलिंग पर चंदन और यक्षकर्दम का लेप किया। राजचंपक, धतूर, कनेर, कमल, मालती, कर्णिकार, कदंब, मौलसिरी, उत्पल, मल्लिका (चमेली), शतपत्री, ढाक, सिंधुवार, बंधूकपुष्प, पुनांग, नागकेसर, केसर, नवमल्लिक, रक्तदला, कुंद मोतिया, मंदार, बिल्व पत्र, गूमा, मरुआ, वृक, गंठिवन, दौना, आम के पत्ते, तुलसी, देवजवासा, बृहत्पत्री, नांदरुख, अगस्त्य, साल, देवदारू, कचनार, कुरबक और कुरंतक के फूलों और अनेक प्रकार के पल्लवों से भगवान शिव की विधिवत पूजा-अर्चना की।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“शिवजी बोले—हे भृगुनंदन! आप मेरे लिंग मार्ग से शुक्र की तरह बाहर निकले हैं इसलिए आज से आप शुक्र नाम से विख्यात होंगे।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“शुक्राचार्य ने भगवान विद्येश (शिव) का स्मरण कर अपनी विद्या का प्रयोग आरंभ किया। उस विद्या का प्रयोग करते ही युद्ध में मृत पड़े दैत्य अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर इस प्रकार उठ खड़े हुए मानो इतनी देर से सोए पड़े हों।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“देवताओं ने ब्राह्मी, नारायणी, ऐंद्री, वैश्वानरी, याम्या, नैर्ऋति, वारुणी, वायवी, कौबेरी, यक्षेश्वरी और गारुड़ी देवी का रूप धारण किया हुआ था।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“विष्णो! लोग तुम्हें भगवान मानकर तुम्हारी पूजा करते हैं पर वास्तव में तुम पूजा के योग्य नहीं हो। तुम तो सिर्फ पत्थर हो। तुम्हारे मन में दयाभाव नाम की कोई वस्तु नहीं है। तुमने मेरे सतीत्व को भंग किया है और मेरे पति शंखचूड़ को मार डाला है। इसलिए मैं तुम्हें शाप देती हूं कि तुम आज, अभी से पत्थर के हो जाओगे।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“अलौकिक शक्ति द्वारा इस बात का ज्ञान हुआ कि शंखचूड़ की रक्षा करने वाला कवच और उसकी पतिव्रता स्त्री की शक्ति, अब उसके साथ नहीं रही, तो तुरंत ही उन्होंने अपना विजय नामक त्रिशूल उठा लिया”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“ब्राह्मण के रूप में ही दैत्यराज की पत्नी देवी तुलसी के पास गए। मायावी विष्णुजी देवताओं के कार्य को पूरा करने के लिए देवी तुलसी के साथ भक्तिपर्वूक विहार करने लगे।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“रूप धारण किए हुए विष्णुजी बोले कि पहले प्रतिज्ञा करो कि मैं जो मांगूंगा, तुम मुझे दोगे। इस प्रकार जब शंखचूड़ ने ब्राह्मण को उसकी इच्छित वस्तु देने का वचन दे दिया, तब विष्णुजी ने उससे उसका कवच मांग लिया।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“यह बात पूर्णतः गलत है। मैं देवताओं और दानवों में कभी कोई भेद नहीं करता। मैं तो सदा से ही अपने भक्तों के अधीन हूं।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“हे देवाधिदेव! हालांकि आपकी बातों में कुछ सच्चाई है, परंतु क्या हमेशा हर बात में असुर ही गलत होते हैं, देवता हमेशा सही होते हैं? उनकी कभी कोई गलती नहीं होती। आपके अनुसार सारे दोष असुरों में हैं। जबकि वास्तविकता में ऐसा बिलकुल भी नहीं है। दोष केवल असुरों में ही नहीं, देवताओं में भी हैं। मैं उनका पक्ष लेने वाले आपसे पूछता हूं कि मधु और कैटभ नामक दैत्यों के सिरों को किसने काटा? त्रिपुरों को युद्ध करने के पश्चात क्यों भस्म कर दिया गया? आप सदा से ही देवताओं और दानवों में पक्षपात करते आए हैं। आप देवताओं का ही कल्याण करते हैं। जबकि ईश्वर होने के नाते आप देवताओं और असुरों दोनों के लिए ही आराध्य हैं।”
― शिव पुराण
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“आपका सुदामा नामक पार्षद इस समय दानव योनि में शंखचूड़ के रूप में सभी को दुख दे रहा है।”
― शिव पुराण
― शिव पुराण
“भगवान शिव जब इस प्रकार से देवताओं को शंखचूड़ के वध का आश्वासन दे ही रहे थे, तभी उनसे मिलने के लिए राधा के साथ श्रीकृष्ण वहां पधारे। भगवान शिव को प्रणाम करके वे प्रभु की आज्ञा से उनके पास ही बैठ गए। श्रीकृष्ण और राधा ने महादेव जी की मन में बहुत स्तुति की। जब भगवान शिव ने उनसे उनके आने का कारण पूछा, तब श्रीकृष्ण बोले—हे कृपानिधान! दयानिधि! आप तो सबकुछ जानते हैं। आप ही इस जगत में सनाथ हैं। आप तो जानते ही हैं कि मैं और मेरी पत्नी दोनों ही शाप भोग रहे हैं। मेरा पार्षद सुदामा भी शाप के कारण दानव की योनि में अपना जीवन जी रहा है।”
― शिव पुराण
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“तब उन बीजों में से कुछ दिन पश्चात धात्री, मालती और तुलसी नामक वनस्पतियां पैदा हुईं। देवी सरस्वती द्वारा दिए गए बीजों से धात्री, देवी महालक्ष्मी के बीजों से मालती और देवी गौरी के बीजों से तुलसी का आविर्भाव हुआ।”
― शिव पुराण
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“हे देवताओ! मैं ही तीन प्रकार से तीनों प्रकार के गुणों से अलग होकर निवास करती हूं। मैं सत्यगुण में गौरा बनकर, रजोगुण में लक्ष्मी और तमोगुण में ज्योति बनकर इस जगत को आलोकित करती हूं। इसलिए आप अपनी इच्छापूर्ति हेतु देवी जगदंबा की शरण में जाओ।”
― शिव पुराण
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“यह सारा जगत माया के अधीन है परंतु इस जगत की जननी मूल प्रकृति परम मनोहर महादेवी पार्वती इस माया के वशीभूत नहीं हैं। उन पर इस माया जाल का कोई असर नहीं पड़ता।”
― शिव पुराण
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