Daur-e-Ishq (Poetry Book 2) Quotes
Daur-e-Ishq (Poetry Book 2)
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Satbir Singh30 ratings, 3.87 average rating, 3 reviews
Daur-e-Ishq (Poetry Book 2) Quotes
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“कोहरा आँखों में जमने लगा है 'ग़ालिब', राहें जहां की बड़ी सर्द हैं आज कल, पथरा गईं हैं दिल की हसरतें भी सारी, कटता नहीं, गिर के बिखरता है हर पल, जवाब मांगने के हक में नहीं सवाल मेरे, गर साथ चल सकता है मेरे तो साथ चल।
कभी मिले था क्या तुम मुझसे पहले? कहीं मिलोगे क्या फिर मुझसे कल?”
― Daur-e-Ishq (Poetry Book 2)
कभी मिले था क्या तुम मुझसे पहले? कहीं मिलोगे क्या फिर मुझसे कल?”
― Daur-e-Ishq (Poetry Book 2)
“जुम्बिश-ए-तहरीर”
― Daur-e-Ishq (Poetry Book 2)
― Daur-e-Ishq (Poetry Book 2)
“ज़िन्दगी अब तुझसे डर लगता है| देख पानी बारिश का, सहजे ही उछल पड़ते थे पहले, अब पैर भिगोने से भी डर लगता है | उड़ते परिंदों के साथ ही उड़ जाता था मन कभी, अब घिरती घटाओं को देख डर लगता है | साईकिल की बजती घंटियों में, बेधड़क घूमते थे हंसी के पहिये, अब हर आते मोड़ की आहट से डर लगता है | दूधिया कोहरा कभी आग़ोश में भर लेता था, सुला लेता था गोद में अपनी, आज एकांत में खो जाने से डर लगता है | जाने क्यों ज़िन्दगी, जाने क्यों सहमा सा यह घर लगता है, जाने क्यों अब तुझसे डर लगता है...”
― Daur-e-Ishq (Poetry Book 2)
― Daur-e-Ishq (Poetry Book 2)
