Vikramorvasiyam Of Kalidasa Quotes
Vikramorvasiyam Of Kalidasa: Critically Edited With Introduction And English Translation
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Vikramorvasiyam Of Kalidasa Quotes
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“बिना सच्चे प्रेम के स्त्रियों से चाहे कितने ही मीठे शब्दों में अनुनय-विनय क्यों न करें, किन्तु वह अनुनय-विनय स्त्रियों के मन में पैठती ही नहीं। ठीक वैसे ही जैसे ऊपर से चढ़ाया हुआ रंग मणि के अन्दर तक नहीं पैठता और कुशल जौहरी उसे चट पहचान लेते हैं।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“प्रचण्ड प्रेम बहुत असहिष्णु होता है।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“अपने मनोरथ पूरे होने से पहले यह रात जैसी सौगुनी लम्बी मालूम होती थी, यदि अब तुम्हारे मिल जाने पर भी यह वैसी ही लम्बी बनी रहे,”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“मनचाही वस्तु मिल जाने पर प्रतिकूल वस्तुएँ भी अनुकूल हो उठती हैं;”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“कुमुद चन्द्रमा की किरणों से ही खिला करता है, सूर्य की किरणों से नहीं।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“यदि सूर्य की कृपा से अग्नि अत्यधिक देदीप्यमान हो उठती है, तो निशा की कृपा से चन्द्रमा भी तो कान्तिमान हो उठता है।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“राजा का तेज भी बड़ा दुरन्त है!”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“उनकी शकुन्तला, गौरी, उर्वशी, मालविका, इन्दुमती सभी नायिकाएँ उनकी लेखनी द्वारा अमर सुन्दरी बन गई हैं।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“सिंह, बाघ, वराह, हिरण, महिष, हाथी तथा तोते और मोर भी”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“मालिनी नाम की नदी”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“देवदारु, प्याल, सेमल, पारिजात”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“भले ही रत्न खान में उत्पन्न हुआ हो और अच्छी कोटि का भी हो, फिर भी उसे सोने में जड़ना ही पड़ता है।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“ऐसा कहते हैं कि आनेवाले सुख या दुःख को मनुष्य का मन पहले ही कह देता है।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“मेरा हृदय कमलिनी के पत्ते पर पड़ी हुई पानी की बूँद के समान काँप रहा है।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“मेरा मन उस कमल के समान एकसाथ ही दुःखी और सुखी होने लगता है, जिसपर साथ-ही-साथ धूप भी पड़ रही हो और वर्षा भी गिर रही हो।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“पालतू कबूतर पिंजड़े से निकलकर बिल्ली के सामने आ पड़ा।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“जैसे माधवीलता आम के वृक्ष से लिपट जाती है।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“काम केवल बुद्धि के बल से ही पूरा नहीं हो जाता, अपितु कार्यसिद्धि का सूक्ष्म पथ स्नेह के द्वारा भी प्राप्त होता है।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“दरिद्र रोगी की भाँति आप यह चाहते हैं कि वैद्य आपको औषध भी अपने घर से ही दे।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“मालविका ने अपने अंगों द्वारा वचनों में निहित अर्थ को बिलकुल ठीक-ठीक ढंग से व्यक्त कर दिया। उसके पैर लय के साथ-साथ चल रहे थे और वह भावों में तन्मय हो गई थी। उसका अभिनय अत्यन्त आकर्षक था और उसको देखकर भाव परस्पर इस प्रकार टकरा-से रहे थे कि मन उनमें बँध गया-सा प्रतीत होता था।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“विद्वान मनुष्य के संसर्ग से मूर्ख भी विद्वान बन जाता है, जैसे निर्मली के बीज से मलिन जल भी स्वच्छ हो जाता है।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“यह सौन्दर्य कैसा सब दृष्टियों से निर्दोष है! देखो न, इसकी आँखें बड़ी-बड़ी हैं; शरद ऋतु के चन्द्रमा की भाँति उज्ज्वल मुख है; बाँहें कन्धों पर से झुकी हुई हैं; छाती उभरे हुए कठोर स्तनों से भरी हुई हैं; दोनों कांखें खूब चिकनी हैं; कमर इतनी पतली है कि मुट्ठी में आ जाए; जाँघें खूब भारी हैं; और पैरों की अँगुलियाँ झुकी-झुकी सी हैं।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“मित्र, मेरी आँखें नेपथ्य में खड़ी हुई मालविका के दर्शन के लिए इतनी अधीर हैं कि जैसे वे परदे को हटा डालने का प्रयत्न-सी कर रही हैं। विदूषक : (ओट करके) आपकी आँखों का मधु अब सामने उपस्थित है; परन्तु मधुमक्खी भी पास ही बैठी हैं। हाँ, ज़रा सावधान होकर ही देखिए।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“यह शर्मिष्ठा द्वारा रचित एक चतुष्पदी है, जो मध्य लय में है। अब उसके छलिक नामक अभिनय को महाराज ध्यानपूर्वक देखें।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“यद्यपि मैं बहुत धैर्य रखने का प्रयत्न कर रहा हूँ, परन्तु यह मुरज वाद्य से उठा हुआ राग मेरी गति को तीव्र कर रहा”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“अन्धकार में दीपक के बिना आँखोंवाले व्यक्ति को भी कुछ दिखाई नहीं पड़ता।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“उन्होंने यह देखकर कि यह बालिका नाट्यकला सीखने के योग्य है, अपनी बहिन महारानी के पास उपहार के रूप में भेज दी है।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“नाट्यकला देवताओं का शान्त रस-भरा चाक्षुष यज्ञ है। स्वयं महादेव ने भी उमा से विवाह करने के उपरान्त इस नृत्य को ताण्डव और लास्य नामक दो भागों में विभक्त करके अपने शरीर में धारण किया था। नृत्य में सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों से युक्त और अनेक रसों से पूर्ण लोकचरित दृष्टिगोचर होता है। यद्यपि लोक-समाज की रुचि भिन्न-भिन्न होती है, फिर भी इस अकेले नृत्य द्वारा प्राय: सभी लोगों का मनोरंजन हो जाता है।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“मनोहर प्रकृतियों के प्रति प्रेम उत्पन्न हो ही जाता है।”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
“[भरत वाक्य] जो लक्ष्मी और सरस्वती सदा एक-दूसरे की विरोधिनी हैं, और जिनका एक स्थान पर मिलकर रह पाना कठिन है, वे लक्ष्मी और सरस्वती सज्जनों के कल्याण के लिए परस्पर मिलकर रहने लगें। और साथ ही सब लोग कठिनाइयों को पार कर जाएँ; सब लोगों के भले दिन आ जाएँ; सबकी कामनाएँ पूरी हों; और सब सदा आनन्द मनाते रहें!”
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
― Vikramovarshi (Sanskrit Classics)
