Arastu Quotes
Arastu
by
Sukesh Kumar14 ratings, 3.86 average rating, 0 reviews
Arastu Quotes
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“अरस्तू ने यह निश्चय कर लिया था कि चक्राकार गति का केंद्र ही भौतिक वस्तुओं में निरंतर गति उत्पन्न कर सकता है। अब उनके सामने यह प्रश्न था कि वह कौन सी वस्तु है। उन्होंने देखा कि अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी में से किसी में भी चक्राकार गति की सामर्थ्य नहीं है। ये चारों तत्त्व रेखाकार गति ही कर सकते हैं। अग्नि और वायु का स्वभाव ऊपर जाने का है, पृथ्वी और जल का स्वभाव नीचे जाने का है। इसलिए उन्होंने अनुमान लगाया कि इन चार भौतिक तत्त्वों से भिन्न कोई पाँचवाँ तत्त्व है, जिसका स्वभाव अहर्निश चक्र की भाँति घूमने का है। इसे अरस्तू ने ‘ईथर’ कहा। ‘ईथर’ का अर्थ सदैव भागते रहनेवाला होता है।”
― Arastu
― Arastu
“आगमन की विधि से प्राप्त किया हुआ ज्ञान वैज्ञानिक विधि से प्राप्त किए हुए ज्ञान से स्वतंत्र तथा ऊँचे स्तर का है।”
― Arastu
― Arastu
“पारस्परिक संबंधों का जो सहज ज्ञान होता है, वह आगमनात्मक है—जैसे सभी मनुष्य नश्वर हैं।”
― Arastu
― Arastu
“ज्ञान के दो ही क्षेत्र मिले—भौतिक जगत् का वह भाग, जिसमें नियमित रूप से परिवर्तन होते हैं और प्रकृति को उद्वेलित करनेवाला गति का अचल केंद्र, जिसकी न कभी उत्पत्ति हुई थी और न कभी जिसका विनाश ही होगा।”
― Arastu
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“अरस्तू का ईश्वर जगत् में व्याप्त नहीं है, वह संसार के संचरण अथवा प्रक्रिया से परे और नितांत निर्लिप्त है। उसकी उत्कृष्ट सत्तामात्र में वह कमनीयता है कि भौतिक जगत् उससे प्रेरणा ग्रहण करके गतिमान बना रहता है और उत्तरोत्तर विकास को प्राप्त होता रहता है।”
― Arastu
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“अरस्तू का ईश्वर शुद्ध क्रिया है, पर ऐसी क्रिया जो गतिरहित है। ईश्वर की क्रिया शुद्ध चिंतन स्वरूप है और इस चिंतन का विषय वह स्वयं अपने आप है। वह स्वयं चिंतन करता है और उसका चिंतन चिंतन के विषय में है, क्योंकि इस चिंतन क्रिया में किसी प्रकार की विघ्न-बाधा नहीं है, इसीलिए यह निरंतर चलनेवाला चिंतन नित्य आनंद से समन्वित रहता है। ईश्वर स्वयं जगत् के विषय में निश्चिंत ही नहीं बेसुध है, पर उसकी सत्ता भौतिक जगत् में एक लालसा अथवा क्षुधा को जगाकर उसको निरंतर गतिमान बनाए रखती है।”
― Arastu
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“मानव जगत् में कुम्हार के द्वारा बने हुए घट को उदाहरणस्वरूप ले सकते हैं। इस प्रसंग में मिट्टी प्रथम कारण है, घट की विशिष्ट आकृति अथवा घट निर्माण का नियम दूसरा कारण है। कुंभकार जिसकी चेष्टा से घट बना तीसरा कारण है और वह उद्देश्य अथवा निमित्त जो घट के निर्माण से सिद्ध होता है, जिसके लिए घट बना—वह चौथा कारण है। कहीं-कहीं अरस्तू ने ‘एफीशिएंट कॉज”
― Arastu
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“वट कणिका में जो संभावना अर्थवती होने के कारण निहित थी, उसकी क्षमता पूर्ण वट वृक्ष के रूप तक पहुँचने की थी। इसके उपरांत वह स्वयं वट कणिकाओं को उत्पन्न करने लगती”
― Arastu
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“पराविद्या इन आधारभूत सिद्धांतों का भी परीक्षण और स्थापन करती है। मुख्यतया पराविद्या में आदिकारणों, सत्ता तत्त्व एवं उस नित्य अशरीरी और गतिशून्य का अनुसंधान किया गया है, जो जगत् की सब गतियों और आकृतियों का कारण है।”
― Arastu
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“मानवीय अच्छाइयाँ बतलाई हैं। ये स्वास्थ्य, सौंदर्य, शक्ति तथा अर्थ हैं। वह इन्हें व्यवस्थित जीवन में उपकारक मानते थे और इसीलिए उन्हें अर्जित करना सबके लिए आवश्यक समझते थे।”
― Arastu
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“प्लेटो ने एक बार फिर नैतिक प्रसंग उठाया है। यहाँ वह बुद्धिमत्ता, मिताचरण, न्याय और साहस को नैतिक गुण कहते हैं। इतना ही नहीं, वह इन्हें दैवीय गुण ठहराते हैं”
― Arastu
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“टाइमियस’ के अनुसार, आदि देव ने एक अमर आत्मा को उत्पन्न किया था। उसके पुत्रों अथवा देवताओं ने उसे पहले दो भागों में बाँटकर एक भाग को सिर में और दूसरे भाग को हृदय से कंठ तक स्थान दिया। दूसरे भाग के भी दो भाग किए। इनमें से एक को कंठ से रीढ़ की हड्डी तक और दूसरे को रीढ़ की हड्डी से नाभि तक सीमित कर दिया। इस प्रकार एक आत्मा के तीन विभाग बन गए। इनमें से सिर में रहनेवाली आत्मा अमर है, शेष दो प्रकार की नश्वर। शरीर के नीचे वाले भागों में स्थित आत्मा अमर आत्मा के अधीन रहती है।”
― Arastu
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“ऐंद्रिक ज्ञान और आत्मिक ज्ञान में भेद किया गया है, किंतु ऐंद्रिक ज्ञान को असत्य और भ्रम नहीं बतलाया गया है। वह केवल अपूर्ण है, पर शिक्षा और अनुभव से विकसित विश्लेषण और तुलना की शक्तियाँ उसे पूर्ण बना सकती हैं। पूर्ण होने पर वह सामान्य अथवा सार्वभौम होता है। यह प्लेटो का ज्ञान संबंधी दर्शन है।”
― Arastu
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“मूल सिद्धांतों का भली-भाँति परीक्षण करना चाहिए। संतोषप्रद परीक्षण के बाद मानव बुद्धि पर पूरा भरोसा न करके तर्क का अनुसरण करना चाहिए। इनमें भी सरलता और स्पष्टता का अनुभव होने पर ही समझना चाहिए कि अब अधिक छानबीन की आवश्यकता नहीं है।”
― Arastu
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