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प्रतिनिधि कहानियां Quotes
प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
by
Gajanan Madhav Muktibodh37 ratings, 4.14 average rating, 1 review
प्रतिनिधि कहानियां Quotes
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“उत्तेजनापूर्ण और असंयत जीवन से उसका चेहरा बिगड़ गया, आकृति बिगड़ गई, और वह इस बिगाड़ को अच्छा समझने लगा। दाढ़ी बढ़ा ली, जैसे कोई बैरागी हो, शरीर दुर्बल हो गया। और यदि कोई व्यक्ति उसके इस विद्रूप व्यक्तित्व के विरुद्ध मज़ाक़ करता या आलोचना करता तो वह उसका शत्रु हो जाता।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“नौजवानी में वे दुखान्त नाटक सुखान्त नाटक में भी बदल जाते। लेकिन, ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती गई, भावना कम होती गई और अहंकार की बाढ़ आती गई, त्यों-त्यों परस्पर आकर्षण के अभाव में एक-दूसरे के प्रति कठोरता उत्पन्न होती गई। माता”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“उसने न मालूम कितने ही दर्शनों और विचारधाराओं, व्यक्तियों और व्यक्तित्वों में दोष निकाले। उन दोषों को वह इतनी कड़वाहट के साथ कहता मानो उसकी कोई निजी हानि हुई हो। वह बात इस तरह करता मानो उन चीज़ों का उससे कोई आत्मीय रहस्यमय सम्बन्ध हो। निषेध, निषेध, निषेध!”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“सब लोगों का प्यार वह अपने में नहीं सँभाल सकता। उसका दिल मिट्टी का घड़ा है, उसमें ज़्यादा भरोगे तो वह टूट जाएगा।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“शरीर के अस्वास्थ्यजनित विषों ने उसकी नस-नस में घुसकर उसे कमज़ोर और विक्षुब्ध कर दिया था। और उस विक्षोभ ने उसके मन में आत्मनाशक सपने और भाव तैरा दिए थे। यही वे घटनाएँ थीं, जो पकड़ में आती नहीं थीं, जो सिर्फ़ एक मानसिक वातावरण बनकर उसे खाए जा रही थीं। किन्तु”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“शरीर के अस्वास्थ्यजनित विषों ने उसकी नस-नस में घुसकर उसे कमज़ोर और विक्षुब्ध कर दिया था।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“उस दृश्य में इतनी ठंडक और ताज़गी थी कि दिल की मनहूसियत हवा हो गई और एक अजीब-सी थिरकन नाचने के अन्दाज़ में उभर उठी। और फिर भी वह गम्भीर ही रहा।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“आजकल हमारे अवचेतन में हमारी आत्मा आ गई है, चेतन में स्व-हित और अधिचेतन में समाज से सामंजस्य का आदर्श–भले ही वह बुरा समाज क्यों न हो! यही आज के जीवन-विवेक का रहस्य है।...”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“हमारे अपने-अपने मन-हृदय-मस्तिष्क में ऐसा ही एक पागलख़ाना है, जहाँ हम उन उच्च, पवित्र और विद्रोही विचारों और भावों को फेंक देते हैं जिससे कि धीरे-धीरे या तो वे ख़ुद बदलकर समझौतावादी पोशाक पहन सभ्य, भद्र हो जाएँ, यानी दुरुस्त हो जाएँ या उसी पागलख़ाने में पड़े रहें!”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“हर बार छोड़ दिया गया। उसने घोषित किया कि वह पापी है, पापी है, उस दंड मिलना चाहिए, उसने निरपराध जनों की हत्या की है, उसे दंड दो। हे ईश्वर! लेकिन, अमरीकी व्यवस्था उसे पाप नहीं, महान कार्य मानती थी। देश-भक्ति मानती थी। जब उसने ईथरली की ये हरकतें देखीं तो उसे पागलख़ाने में डाल दिया। टेक्सॉस प्रान्त में वाको नाम की एक जगह है–वहाँ उसका दिमाग़ दुरुस्त नहीं हो सका।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“उसने कहा, ‘क्लॉड ईथरली वह अमरीकी विमान चालक है, जिसने हिरोशिमा पर बम गिराया था।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“आज की निगाह से क्या मतलब?’ उसने भौंहें समेट लीं। मेरी आँखों में आँखें डालकर उसने कहना शुरू किया, ‘जो आदमी आत्मा की आवाज़ कभी-कभी सुन लिया करता है और उसे बयान करके उससे छुट्टी पा लेता है, वह लेखक हो जाता है। आत्मा की आवाज़ जो लगातार सुनता है, और कहता कुछ नहीं है, वह भोला-भाला सीधा-सादा बेवक़ूफ है। जो उसकी आवाज़ बहुत ज़्यादा सुना करता है और वैसा करने लगता है, वह समाज-विरोधी तत्त्वों में यों ही शामिल हो जाया करता है। लेकिन जो आदमी आत्मा की आवाज़ ज़रूरत से ज़्यादा सुन करके हमेशा बेचैन रहा करता है और उस बेचैनी में भीतर के हुक्म का पालन करता है, वह निहायत पागल है। पुराने ज़माने में सन्त हो सकता था।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“सजे हुए टेबल पर रखे कीमती फाउंटेन पेन-जैसे नीरव-शब्दांकनवादी हमारे व्यक्तित्च, जो बहुत बड़े ही खुशनुमा मालूम होते हैं–किन्हीं महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों के कारण–जब वे आँगन में और घर-बाहर चलती हुई झाड़ू–जैसे काम करनेवाले दिखाई दें,”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“एकान्त में प्रत्यावर्तित और पुन: प्रत्यावर्तित प्रकाश के कोमल वातावरण में मूल-रश्मियों और उनके उद्गम-स्रोतों पर सोचते रहना, ख़यालों की लहरों में बहते रहना कितना सरल, सुन्दर और भद्रता-पूर्ण है। उससे न कभी गरमी लगती है, न पसीना आता है, न कभी कपड़े मैले होते हैं। किन्तु प्रकाश के उद्गम के सामने रहना, उसका सामना करना, उसकी चिलचिलाती दोपहर में रास्ता नापते रहना और धूल फाँकते रहना कितना त्रासदायक है!”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“भोले-भाले आदिवासियों की उस कुल्हाड़ीजैसा है जो जंगल में अपने बेईमान और बेवफ़ा साथी का सिर धड़ से अलग कर देती है। बारीक बेईमानियों का सूफ़ियाना अन्दाज़ उसमें कहाँ!”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“ठाठ से रहने के चक्कर से बँधे हुए बुराई के चक्कर तोड़े जा सकते हैं। प्राणशक्ति शेष है, शेष!”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“भरी दोपहरी में श्यामला के साथ पल-भर उस पेड़ के तले बैठने को मेरी भी तबीयत हुई। बहुत ही छोटी और भोली इच्छा है यह!”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“श्यामला का पार्श्व-संगीत चल ही रहा है, मैं”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“उतरे हुए चेहरों को देखा है। बावज़ूद श्रेष्ठ पोशाक और ‘अपटूडेट’ भेस के, सँवलाया हुआ गर्व, बेबस गम्भीरता, अधीर उदासी और थकान उनके व्यक्तित्व पर राख-सी मलती”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“यौवन के मोह-स्वप्न का गहरा उद्दाम आत्मविश्वास अब मुझमें नहीं हो सकता। एक वयस्क पुरुष का अविवाहिता वयस्का स्त्री से प्रेम भी अजीब होता है। उसमें उद्बुद्ध इच्छा से आग्रह के साथ-साथ जो अनुभवपूर्ण ज्ञान का प्रकाश होता है, वह पल-पल पर शंका और सन्देह को उत्पन्न करता है। श्यामला के बारे में शंका रहती है। वह ठोस बातों की बारीकियों का बड़ा आदर करती है। वह व्यवहार की कसौटी पर मनुष्य को परखती है। यह मुझे अखरता है। उसमें मुझे एक ठंडा पथरीलापन मालूम होता है। गीले-सपनीले रंगों का श्यामला में सचमुच अभाव है।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“अब तो मैं केवल आश्रय का अभिलाषी हूँ, ऊष्मापूर्ण आश्रय का...”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“गहन साहचर्य के सम्बन्ध-सूत्र तड़प रहे हैं और महसूस किए जा रहे हैं।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
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“काश, ऐसी भी कोई मशीन होती जो दूसरों के हृदय-कम्पनों को, उनकी मानसिक हलचलों को, मेरे मन के परदे पर, चित्र रूप में, उपस्थित कर सकती। उदाहरणत:, मेरे सामने इसी पलंग पर, वह जो नारी-मूर्ति बैठी है। उसके व्यक्तित्व के रहस्य को मैं जानना चाहता हूँ, वैसे, उसके बारे में जितनी गहरी जानकारी मुझे है, शायद और किसी को नहीं।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“तालाब, आसमान का लम्बा-चौड़ा आईना, जो थरथराते हुए मुसकराता है। और उसकी थरथराहट पर किरने नाचती रहती हैं। मेरे कमरे में जो प्रकाश आता है, वह इन लहरों पर नाचती हुई किरनों का उछलकर आया हुआ प्रकाश है।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“चले गए वे दिन जब वह किसी का मित्र तो किसी का पुत्र था। पेट भूखा ही क्यों न सही, आँखें तो सुन्दर दृश्य देख सकती थीं। और वह सुनहली धूप! आहा! कैसी ख़ूबसूरत! उतनी ही मनोहर जितनी सुशीला की त्वचा!!”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“जोकर अपनी भावनाएँ व्यक्त कर सकता है। चपत जड़ सकता है। एक दूसरे को लात मार सकता है, और, फिर भी, कोई दुर्भावना नहीं। वह हँस सकता है, हँसा सकता है। उसके हृदय में इतनी सामर्थ्य है।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“लक्ष्य आँखों ही आँखों में आँसू सोख लेने का था,”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“इसमें कोई शक नहीं कि जोकर का काम करना एक परवर्शन (अस्वाभाविक प्रवृत्ति) है! मनुष्य की सारी सभ्यता के पूरे ढाँचे चरमराकर नीचे गिर पड़ते हैं, चूर-चूर हो जाते हैं। लेकिन असभ्यता इतनी बुरी चीज़ नहीं, जितना आप समझते हैं। उसमें इंस्टिक्ट का, प्रवृत्ति का खुला खेल है, आँख मिचौनी नहीं।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“अपने इंस्टिक्ट के खुले खेल के लिए असभ्य और बर्बर वृत्ति के सामर्थ्य और शक्ति के प्रति खिंचाव रहना, मैं तो एक ढंग का परवर्शन ही मानता हूँ।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
“हृदय-रोग हो गया है–गुस्से का, क्षोभ का, खीझ का और अविवेकपूर्ण कुछ भी कर डालने की राक्षसी क्षमता का।”
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
― प्रतिनिधि कहानियां : मुक्तिबोध
