KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI Quotes
KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
by
Dinkar Joshi18 ratings, 4.33 average rating, 4 reviews
KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI Quotes
Showing 1-13 of 13
“जिस पुत्र ने परशुराम को भी परास्त किया, जिसने समग्र सृष्टि के राजाओं को परास्त करके तीन कन्याओं का हरण किया था, ऐसा नरश्रेष्ठ शिखंडी जैसे नपुंसक के कारण मृत्यु को प्राप्त हुआ, यह देखकर मेरा कलेजा विदीर्ण हो जाता है। उनके अंत का निमित्त शिखंडी बने, यह वक्रता मैं सहन नहीं कर सकती।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“भीष्म ने स्पष्ट कहा है कि जो कुछ सिद्धि मिली है वह मात्र कर्मानुसार, मात्र प्रारब्धवश है”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“गदायुद्ध में प्रतिस्पर्धी भीम को परास्त करने की एक योजना के एक भाग के रूप में दुर्योधन जो अभ्यास करता था, उसके लिए उसने भीम का पूरी तरह मिलता-जुलता वह पुतला बनवाया था। भीम को वह परास्त तो नहीं कर सका, उलटे वह पुतला ही भीम का जीवन-रक्षक बन गया। इसे कैसा न्याय कहा जाए! धृतराष्ट्र का नकटापन तो देखो। भीम के पुतले को भीम मानकर कुचल डालने के बाद उसने विलाप शुरू किया।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“अश्वत्थामा उसे शुभ समाचार देता है—‘पाँच द्रौपदीसुतों और छठे आचार्यघाती धृष्टद्युम्न का हमने वध कर डाला है। अब पांडव पक्ष में पाँच पांडव, छठे कृष्ण और सातवें सात्यकि बचे हैं।’ यह सुनकर दुर्योधन इतने उत्साह में आ जाता है कि वह कहता है—‘जो काम भीष्म, कर्ण अथवा मेरे पिता धृतराष्ट्र ने भी मेरे लिए नहीं किया, ऐसा प्रिय कार्य तुमने किया है। आज मैं अपने को इंद्र के समान समझता हूँ।’ और इतना कहते ही उसने प्राण त्याग दिए।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“गीता’ का मूल प्रश्न स्वधर्म है। अर्जुन का स्वधर्म यह था कि प्रवृत्ति युद्ध-विमुख नहीं होती।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“यदुनंदन! अब तो पुत्र-पौत्रों, पत्नी आदि में मन इतना डूब गया है कि ऐसा विचार भी नहीं किया जा सकता है।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“धर्म-विषयक वाक्य सुनकर युधिष्ठिर क्रोध में नहीं आते, उलटे वह इन वाक्यों की मधुशाला में बह जाते हैं”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“अर्जुन! आत्मप्रशंसा आत्मविलोपन के बराबर ही है। जिस प्रकार बड़े बंधु को कुवचन कहकर उसका वध किया, उसी प्रकार अब तू आत्मप्रशंसा करके विलोपन का प्रायश्चित्त कर ले।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“कंस की हत्या अथवा दुर्योधन को कैद करने की बात एक संकेत है। संकेत के इस पल को जो समझ सकते हैं, वे कृष्ण हैं; जो नहीं समझ सकते, वे धृतराष्ट्र हैं। भविष्य कृष्ण के साथ रहता है; कारण, कृष्ण विशाल धर्म की खातिर प्रकट अधर्म का भी आचरण करते हैं।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“वास्तव में, द्रौपदी को देखते ही चारों भाइयों के मुख पर जो लालसा प्रकट हुई थी, वह फूट का कारण न बने, इसलिए ही उसे साझा पत्नी का स्थान दिया गया हो,”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“राधा नंद के साले रायन की पत्नी थी और रायन कृष्ण के मामा थे। यह माना जाता है कि राधा उम्र में कृष्ण से काफी बड़ी थी। किंतु राधा को रूपक रूप में ही स्वीकार करके दूसरी रीति से उसकी गणना की गई है। इसमें कृष्ण की रासलीला मुख्य है। रास मंडल का अर्थ राशि मंडल किया गया है। ये राशियाँ नक्षत्र ही हैं। इन नक्षत्रों की कुल संख्या सत्ताईस है और इस राशि मंडल में—नक्षत्रों के ठीक मध्य में विशाखा नक्षत्र की गणना होती है। नक्षत्रों की गिनती कृतिका से शुरू होती है और बराबर चौदहवाँ नक्षत्र विशाखा है। इस विशाखा का एक नाम ‘राधा’ है और इस हिसाब से राशि मंडल में—कृष्ण के रास मंडल में बराबर राधा आती है। आकाशीय तत्त्वों के साथ तुलना करके राधा के समझने का यह आभास केवल बौद्धिक चमक जैसा लगता है।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“विष्णुपुराण के पाँचवें अंश के तेरहवें अध्याय में इस रासलीला का वर्णन आता है। कृष्ण की बाँसुरी को सुनकर ये कन्याएँ अपने-अपने घर छोड़कर उतावली के साथ दौड़ी आती हैं। कोई गोपिका बाँसुरी की लय के अनुरूप गीत गाने लगती है तो कोई ध्यानमग्न होकर कृष्ण को देखती रहती है। कोई कृष्ण के नाम का उच्चारण करके शरमा जाती है तो कोई घर के बाहर निकलते समय बड़ों की नजर पड़ते ही पीछे अंदर दौड़ जाती है। इससे अधिक कोई विलासिता उसमें नहीं है। ‘हरिवंश’ के विष्णुपर्व में जिस रासलीला का वर्णन है, उसमें गोपियाँ चंचल कटाक्ष फेंकती हैं। स्तन से उपसी हुई छाती के साथ कृष्ण को दबाती हैं। इस रासलीला की विलासिता की इतिश्री मात्र इतने उल्लेख से ही हो जाती है। दैहिक संबंधों और स्पर्श-सुख की बात का यहीं प्रवेश होता है। किंतु ‘भागवत’ इससे कहीं अधिक आगे निकल जाती है। विलास का उसमें खासा विस्तार हुआ है। दशम स्कंध के रास पंचाध्याय में ये स्त्रियाँ पतियों तथा पुत्रों तक को छोड़कर आती हैं। यह वर्णन किया गया है कि कृष्ण इन स्त्रियों से भेंट पड़ते हैं; शरीर को स्पर्श करके, स्तन खींचकर, नख की अणि मारकर वह गोपियों के काम को उत्तेजित करते हैं।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
“हिमालय मानव के गर्व का खंडन करता है।”
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
― KRISHNAM VANDE JAGADGURUM by DINKAR JOSHI: Revering Lord Krishna
