लोई का ताना Quotes
लोई का ताना
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रांगेय राघव9 ratings, 4.11 average rating, 2 reviews
लोई का ताना Quotes
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“लोई चिल्लाई, ‘सुल्तान! तेरा पाप तुझे डरा रहा है। देख! तेरे सामने वह किस शान से खड़ा है। सत्य के तेज ने उसे आग बना दिया है। और तू सोने के सिंहासन पर चढ़कर भी मिट्टी ही बना रहा!”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“तू मुझसे डराता है। तेरे यह सिपाही मुझे क्या मार सकते हैं? मेरा मैं तो कभी का छूट गया, जब डरने वाला ही नहीं रहा, तो फिर मुझे किसका डर है?’ भीड़ चिल्लाई, ‘जय कबीर!”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“कबीर ने मुड़कर कहा, ‘कौन-सा नतीजा है। जिससे डरकर मैं झूठ बोलूं?’ लोई ने चिल्लाकर कहा, कंत अमर है। तू गरीबों की आन है।’ सिकन्दर मुड़ा। पूछा, ‘कौन है यह औरत?’ ‘हुजूर’ काजी ने कहा–‘इसकी बीवी है।’ सिकन्दर के माथे पर बल पड़ गए। लोई कह रही थी, ‘मार डालो। डराते किसे हो? अरे इस देश की धूल में जाने कितने हुकूमत करने वाले सिर पटककर मर गए। पर गरीब अमर हैं। मेहनत और ईमान की कमाई खाने वाला कभी नहीं मर सकता।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“पहले यह मन काग था करता जीवन घात अब तो मन हंसा भया मोती चुंगि चुंगि खात। कबिरा मन परबत हता अब मैं पाया कानि टांकी लागी शब्द की निकसी कंचन खानि।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“जो जल बाढ़ै नाव में घर में बाढ़ै दाम दोऊ हाथ उलीचिये यहि सज्जन कौ काम।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“सेज बिछावै सुन्दरी अन्तर परदा होय तन सौंपे मन दे नहीं सदा सुहागिन सोय!”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“पहले सगुण मानते थे। फिर वे रहस्य की ओर झुके। रहस्य ने शून्य पर पहुंचाया। शून्य ने साधू बनाया। साधू बनकर भीख मांगनी पड़ी तो घृणा हो गई। पेट के लिए इज़्ज़त ने पुकारा। इज़्ज़त ने कहा–मेहनत कर। मेहनत ने ईमान की ओर भेजा। ईमान ने उन्हें ठोस तार्किक बना दिया।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“सहजयानी और नाथ, सूफी और शाक्त सब गुरु को एक आडम्बर बना बैठे थे। ब्राह्मणों तक पर इसका प्रभाव था।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“गुरु सिकलीगर कीजिए मनहिं मस्कला देय”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“ढोंग श्रद्धा पैदा करवाने के लिए था, श्रद्धा चमत्कारों पर पलती थी। चमत्कार ही ढोंग था, जो रोटी सुरक्षित करने के लिए किया जाता था...”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“वन गेह की वासना नास करे कब्बीर सोई बैरागी है।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“शून्य की आस वनखंड जावै। कहहिं कब्बीर बनखंड में क्या मिलै दिलहि को खोज दीदार पावै।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“नारी माया है, पर कब? उनके लिए जो भोग को ही जीवन का सब कुछ मान लेते हैं। वे तो असल में कभी प्रेम की पवित्रता को नहीं जान पाते।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“भगवान् हमारे दिन-रात के कामों में ही है, बाहर नहीं है।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“हेरत हेरत हे सखी हेरत गया हेराय बूंद समानी समुंद में सो कित हेरी जाय। आदि होत सब आप में सकल होत ता मांहि ज्यों तरवर के बीज में डार पात फल छांहि। कबिरा मैं तो तब डरौं जो मुझ ही में होय मीच बुढ़ापा आपदा सब काहू में सोय।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“लोई! चुपड़ी रोटी ईमान और मेहनत से नहीं मिलती। उसके लिए पाप करना पड़ता है। दूसरों को लूटना पड़ता है। गला काटना पड़ता है: राजा किसान को लूटता है, महन्त शिष्यों को बहकाता है, जोगी भीख के करतब दिखाता, डराता, धमकाता है।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“सत्य भी उसी का है, वह माया इस सत्य को ढंकती है। अत: यह भी उसी की है। पर यह माया जड़ नहीं है कि मनुष्य इससे निकल न सके। वह जान-बूझकर उसमें फंसता है।’ ‘तो माया क्या है, दादा?’ ‘धन, रूप के बन्धन।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“उस सृष्टि की शक्ति का, जो इस सब संसार और ब्रह्माण्ड में फैली हुई है। उसमें सब शक्ति है, सत्य है,”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“किसको छोड़कर किसका भजन करूं बेटा। खाली नाम का क्या लेना, और त्याग का मोह भी किसलिए? भजन करने के लिए कोई दिखता है तुझे?”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“भजूं तो को है भजन को तजूं तो का है आन? भजन तजन के मध्य में सो कबीर मन मान।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“माया का अर्थ है मनुष्य के वे बन्धन जो उसे मनुष्य होने से रोकते हैं।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“जा मरने से जग डरै मेरे मन आनन्द कब मरिहौं कब पाइहौं पूरन परमानन्द।’ उन्होंने”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“वह पुरुष विकृत वासना ही है जो इसे देखकर केवल कामिनी देखता है। वह इसकी आत्मा के पूर्णत्व को नहीं देखता।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“जो है जाको भावता सो ताही के पास।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“रति एक तन में संचरै सब तन कंचन होय।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“एक तरफ मरघट है, योग है, त्याग है, वन है, संन्यास है, दूसरी तरफ दुनिया है, लोगों का लाभ है, मदद है, पाप का पर्दाफाश करना है, दुख उठाकर भागना नहीं, यहीं रहकर सचाई के लिए लड़ना है।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“और दीपाधारों में लटकती दीपशिखाएँ जगमग-जगमग कर रही थीं। असंख्य दर्शनी आते, घण्टों को बजाते और फिर भीतर चले जाते, शिवलिंग का दर्शन करते और लौट आते। भीतर से कभी-कभी समवेत वेदध्वनि उठती और तब गन्धधूम और फूलों की सुगन्धि काँपने लगती।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“सबको मैंने अपनी-अपनी आग में ही जलते हुए देखा।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“यह तत वह तत एक है एक प्रान दुइ गात, अपने जिय से जानिए मेरे जिय की बात।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
“माल मुलुक हरि देत हैं हरिजन हरि ही देत।”
― लोई का ताना
― लोई का ताना
