पतझर Quotes
पतझर
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रांगेय राघव16 ratings, 4.00 average rating, 0 reviews
पतझर Quotes
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“वर्ग का वर्ग शोषण नहीं करता। एक वर्ग के अज्ञान का दूसरा वर्ग शोषण करता है अपने ज्ञान से।”
― पतझर
― पतझर
“मनुष्य बर्बर अवस्था में भी रहता है, मनुष्य साम्राज्यवाद और पूंजीवाद बनाकर भी रहता है, मनुष्य साम्यवाद का अधिनायकत्व बनाकर भी रहता है। इसके साथ हमारी पुरानी मान्यताएं धर्मों के रूप में भी विराजती हैं।”
― पतझर
― पतझर
“पुनर्जन्म होता है लेकिन आत्मा अमर नहीं होती। लेकिन वह बौद्धों के अनात्म जैसी भी नहीं होती, उसका अपना-अपना व्यक्तित्व होता है, तो वह इस बात को समझ नहीं पाया और मुझे यकीन है कि आप भी उसे समझ नहीं पा रहे हैं। कल मैंने उसको यह भी बताया कि मनुष्य तभी सुखी होगा जब यह परिवार नाम की चीज़ टूट जाएगी।”
― पतझर
― पतझर
“हमारे संत-महात्मा, गांधी, कार्ल-मार्क्स सब यही कहते थे कि सम्पत्ति के कारण सारे झगड़े हैं, इसको छोड़ देना चाहिए। यही हमारे तीर्थंकर कहते थे, यही हमारे गौतम बुद्ध कह गए हैं।”
― पतझर
― पतझर
“कुछ लोगों को यह वहम होता है कि वे बहुत समझदार हैं। इस तरह के वहम कभी-कभी इंसान को ऐसी जगह ला पटकते हैं कि उसे दिखाई देना बन्द हो जाता”
― पतझर
― पतझर
“आज का युवक इतनी तरक्कियां, इतने विकास देखकर एक तरह से हताश हो गया है। वह देख रहा है कि दुनिया में ईमानदारी काम नहीं दे रही है, वह ऐसे लोगों को सुख पाते हुए देखता है जो बिलकुल बेवकूफ हैं, जिनमें कोई कल्चर नहीं है।”
― पतझर
― पतझर
“हमको समाज में रहने के लिए दूसरों के लिए अपने मन को मारना उचित है या अपनी निरंकुश स्वच्छंदता में सबकी अवहेलना कर देना ठीक है? इन दोनों का मिलन कहां है डॉक्टर साहब?”
― पतझर
― पतझर
“दोनों का स्वार्थ एक जगह मिल जाता है, वह जगह है, जहां सन्तान के भविष्य का सवाल आता है; वहां पुरुष अपने पंजे समेटता है, स्त्री अपने सींग समेट लेती है और यों वास्तविक प्रेम जन्म लेता है ताकि लोक चल सके, दुनिया चल सके। विवाह के पहले का प्रेम वासना होता है और विवाह के बाद का प्रेम, जो दुनियादारी को निभाने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले लेता है, वास्तविक प्रेम होता है।”
― पतझर
― पतझर
“मुझे इस बात की कोई लज्जा नहीं है कि मैं स्त्री हूं। जिसने दुनिया में पुरुष बनाए हैं, मुझे स्त्री उसी ने बनाया है।”
― पतझर
― पतझर
“अनाचार? दक्षिण-भारत में मामा-भानजी की शादी होती है। मुसलमानों में दूध को छोड़कर लड़के-लड़कियों की शादी हो जाती है। विलायत में आपस में चचेरे भाई-बहिन की शादी होती है। गौतम बुद्ध के समय में खास सगी बहिन से शादी करने में गौरव माना जाता था ताकि रक्त की शुद्धि बनी रहे। यह भाई-बहिन! यह सब समाज के दायरे की चीज़ें हैं जो युग-युग के हिसाब से बदलती हैं।”
― पतझर
― पतझर
“मानता हूं कि मरने के बाद हमारी चेतना स्मृतियों को लेकर उसी प्रकार जीवित रह जाती है, जिस प्रकार दीपक के बुझ जाने पर भी प्रकाश की किरणें अन्तराल में भटका करती हैं।”
― पतझर
― पतझर
“रूस के वैज्ञानिक ने यह बताया है कि हमारा जल जो है यह समय की ऊर्जा है, एनर्जी। समझते हो न मेरी बात?”
― पतझर
― पतझर
“पेड़ की डाली बढ़ती है, जड़ के अख्तिायार में थोड़े ही होता है कि वह किस दिशा में बढ़े। यही हमारी अजीब ज़िन्दगी है,”
― पतझर
― पतझर
“पुराने ज़माने में लोग इस बात को समझते थे। वे दुनिया में रहकर भी यह समझते थे कि दुनिया तो बदलने वाली चीज़ है, इसलिए उसमें ज़्यादा चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए।”
― पतझर
― पतझर
“बच्चे हमारे ज़रिये ही आते हैं। बच्चों के असली मालिक हम नहीं हैं। वे तो जैसे एक सामान हैं। उसको सजा-धजाकर हम तैयार करते हैं, लेकिन वह तैयार होकर जब बाज़ार में जाता है, उसकी कीमत लगती है, उसकी कीमत को हम खा जाना चाहते हैं।”
― पतझर
― पतझर
“एक वह वक्त आता है जब जीवन के कठोर परिश्रम में उसकी गुंजान बनी रहने वाली रंगीनी झर जाती है और फिर भी उसको असन्तोष नहीं होता; और भी तेज़ी से वह धरती में से अपना रस खींचता रहता है। यही गृहस्थी है”
― पतझर
― पतझर
“इंसान फल और पत्ते देने के लिए पतझर के पेड़ों की तरह अपने-आपको नंगा भी करता है, फिर हरा होने के लिए, फिर फल देने के लिए।”
― पतझर
― पतझर
“पौधा ऊपर उठता है और ऊपर उठता चला जाता है। जब वह पेड़ बन जाता है तो वह जटाएं लटकाकर धरती को पकड़ने की कोशिश करता है। उसमें गुल आते हैं जिसे बहुत-से पक्षी इधर-उधर से आकर खा जाते हैं। समाज में रहकर हमारे परिश्रम का लाभ कौन उठा जाता है, यह हम नहीं जान पाते हैं। लेकिन एक वक्त आने पर हमें मजबूर होकर फल देने पड़ते हैं क्योंकि फल देना हमारी सहज प्रवृत्ति है और उसे चाहें तो भी हम झुठला नहीं सकते और यदि हम यह कोशिश करें कि हम ऐसा नहीं करेंगे, हम अपने परिश्रम का फल नहीं छोड़ेंगे तो हम न सामाजिक मर्यादा पाते हैं न अपना आत्मसन्तोष। तब एक सुलगन-सी महसूस होती है। इंसान फल और पत्ते देने के लिए पतझर के पेड़ों की तरह अपने-आपको नंगा भी करता है, फिर हरा होने के लिए, फिर फल देने के लिए।”
― पतझर
― पतझर
“हर पीढ़ी किन्हीं खास परिस्थितियों में अपनी मान्यताएं बनाती है और परिस्थिति बदल जाने के साथ दिमाग उतनी जल्दी नहीं बदलता, क्योंकि वह संस्कार की परम्पराओं में बंधा रहता है।”
― पतझर
― पतझर
“यह प्रेम जो है अगर इसके साथ सेक्स नहीं होता और सेक्स के साथ अगर बच्चे नहीं होते डॉक्टर साहब, तो कितना अच्छा रहता!”
― पतझर
― पतझर
“दुनिया-भर की एब्नॉर्मेलिटीज़1 सेक्स की वजह से पैदा हो गई बताई जाती हैं, मैं तो जहां तक समझता हूं, ये रोटी की वजह से पैदा हुई हैं।”
― पतझर
― पतझर
“पैसे की तंगी में बड़े-बड़े प्रेम रफूचक्कर हो जाते हैं। प्रेम तो तभी सबसे अच्छा होता है जब खुद कमाना नहीं पड़ता और दोनों वक्त खाने को मिल जाता है।”
― पतझर
― पतझर
“दूसरे की थाली में जो हाथ डालेगा, उसे जूठन ही मिल सकती है और जो अपनी थाली में खाता रहेगा उसके सामने जूठन का सवाल पैदा ही नहीं होता। यह देश की सबसे बड़ी विचित्रता है कि यहां ऊंच-नीच के सैंकड़ों बंधन होते हुए भी ऊंच को यह भी अधिकार नहीं है कि वह नीच के समाज में हस्तक्षेप कर सके। बताइए, मैं गलत कहता हूं? ऐसा मुल्क आपने कहीं और देखा है?”
― पतझर
― पतझर
“मजबूरी है और खास तौर पर आदमी के लिए। सहारा चाहता है वह औरत का जो खुद उसके कन्धे पर अपना बोझ डालकर ज़िन्दगी-भर रहती है और लड़की सहारा बनाती है आदमी को, जो ज़िन्दगी-भर उस पर हुकूमत करता है।”
― पतझर
― पतझर
“आयु अपने साथ कुछ विशेष प्रकार के चिन्तन लाया करती है। आदमी उनमें से बाहर नहीं निकल पाता, इसलिए अच्छा हो कि आप जानने की कोशिश न करें।”
― पतझर
― पतझर
“हमारे संस्कार हमारे भीतर इतने गहरे उतर चुके हैं कि हम उन्हीं में पाप-पुण्य को मापते हैं। लेकिन सत्य यह है कि आज जो बहुत कुछ पाप कहलाता रहा है वास्तव में वह अपने-आपमें पाप नहीं है।”
― पतझर
― पतझर
“सनातन का नियम है। नारी ही रहस्य है क्योंकि वह सन्तान को जन्म देती है, वह पुरुष से हेय नहीं है। मेरा-तुम्हारा परिणय हुआ था थोड़े दिन का। दोनों ओर से हम एक-दूसरे को और भी चाहते रहते, तो हमारा जीवन एक-सा चलता रहता, किन्तु मैं जिस गंधर्वी की कन्या हूं, वह कुबेर की प्रिया है। मैं उसी के पास चली जाऊंगी, जहां से मैं आई थी।” और प्रतीची चली गई। विश्वावसु देखता रहा।”
― पतझर
― पतझर
