Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan Quotes
Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
by
Guy De Paupassant12 ratings, 3.75 average rating, 1 review
Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan Quotes
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“कोई भी औरत सच्चे प्रेम के लिए तब तक परिपक्व नहीं होती, जब तक वह विवाहित जीवन की समस्त बेचैनियों और दुःखों से गुजर नहीं जाती;”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“अपने अंदर एक विचित्र भावना उठती महसूस हुई, जो शायद प्राचीन और साधारण प्रेम से कहीं अधिक अदम्य थी।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“यह तो बिलकुल नहीं महसूस करती कि मैं उन बच्चों की माँ हूँ, जो कभी पैदा ही नहीं हुए। मेरे लिए तो यही काफी है कि मैं उन्हीं बच्चों की माँ बनी रहूँ, जिन्हें मैंने पैदा किया है और उन्हें पूरे मन से प्यार करूँ। मैं वह औरत हूँ—हम वे औरत हैं जो सभ्य समाज की हैं। हुजूर! और हम सब केवल ऐसी औरतें नहीं रह गई हैं और होने से इनकार भी करती हैं, जो बस धरती की आबादी बढ़ाने का काम करती हैं।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“हमारी रची हुई एक इनसानी दुनिया नहीं है, जो शाश्वत नियतियों के लिए अप्रत्याशित और अज्ञात है। केवल हमारे मस्तिष्क ही इसे समझ सकते हैं। यह एक ऐंद्रिक और बौद्धिक विचलन है, जिसकी खोज पूरे तौर पर एक असंतुष्ट तथा अशांत नन्हे जानवर के हाथों और उसी के लिए हुई है—और वे जानवर हम हैं।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“हम जितने अधिक सभ्य, बुद्धिजीवी और सुसंस्कृत हों, उतने ही अधिक हमें उस पाशविक वृत्ति पर विजय पाने की आवश्यकता होनी चाहिए, जो हमारे अंदर ईश्वर की इच्छा का प्रतीक है।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“एक क्षण के लिए चिंतन करना पर्याप्त है, ताकि हम यह समझ सकें कि यह दुनिया ऐसे जीवन के लिए नहीं बनाई गई थी, जैसे कि हम हैं। सोच हमारे मस्तिष्क और कोशिकाओं की तंत्रिकाओं में एक चमत्कार से विकसित होती है, क्योंकि यह चमत्कार अशक्त, अज्ञानी और भ्रमित होता है और हमेशा रहेगा भी। यह हम उन तमाम लोगों को, जो बुद्धिजीवी प्राणी हैं, पृथ्वी पर शाश्वत और अभागे निर्वासित बनाता”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“स्वाभाविक है। यह हमारे मस्तिष्क के तंत्रिका केंद्र का एक आकस्मिक (दैवाधीन) कार्य है।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“तुम विश्वास करते हो कि इनसानी सोच अंधे दैवीय प्रसव की सहज पैदावार है?”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“ईश्वर की क्या कल्पना करता हूँ?’’ वह बोला, ‘‘मैं उसे अज्ञात एक ऐसे विराट्, सृजनात्मक अंग के रूप में देखता हूँ, जो अंतरिक्ष में दसियों लाख संसार बिखेरता है। ठीक वैसे ही जैसे एक अकेली मछली समुद्र में अपने अंडे छोड़ देती है। वह इसलिए सृजन करता है, क्योंकि ईश्वर होने के नाते ऐसा करना उसका कार्य है, लेकिन वह यह नहीं जानता कि वह कर क्या रहा है और वह मूर्खता की हद तक अपने कार्य में उर्वर है तथा उन तमाम किस्मों के मिश्रणों से अनजान रहता है, जो उसके बिखेरे हुए कीटाणुओं से पैदा होते”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“कहता हूँ कि प्रकृति हमारी दुश्मन है कि हमें हमेशा प्रकृति के खिलाफ लड़ना चाहिए, क्योंकि वह लगातार हमें जानवरों वाली स्थिति में वापस लाने का काम कर रही है। यह विश्वास मानो कि ईश्वर ने इस धरती पर ऐसी कोई चीज नहीं रखी, जो साफ, खूबसूरत, शानदार या हमारे आदर्श के लिए सहायक हो; लेकिन मानव मस्तिष्क ने ऐसा करके दिखाया है। हमीं ने सृष्टि में थोड़ी सौम्यता, खूबसूरती, अज्ञात आकर्षण और रहस्य का तत्त्व डाला है। इस काम को अंजाम देने के लिए हमने इसका गुणगान किया है, इसकी विवेचना की है, कवियों के रूप में इसकी प्रशंसा की है, कलाकारों के रूप में इसे आदर्श बनाया है और उन विद्वानों के रूप में इसकी व्याख्या की है, जो गलतियाँ करते हैं, जो प्रकृति के विभिन्न व्यापारों में बुद्धितापूर्ण तर्क, सौम्यता और सुंदरता, थोड़ा अज्ञात आकर्षण और रहस्य ढूँढ़ लेते”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“लेकिन सामान्य पुरुष बच्चे पैदा करता है; वह बस एक जानवर होता है, जो कानून के जरिए एक और जानवर से बँधा होता है।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“क्या यह सोचकर घृणा नहीं होती कि ऐसा रत्न, ऐसा मोती, जिसका जन्म खूबसूरत होने, प्रशंसा किए जाने, प्रसन्न किए जाने और सराहे जाने के लिए हुआ था, उसने अपनी जिंदगी के ग्यारह साल काउंट मास्कारे के लिए वारिस पैदा करने में बिता दिए”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“जरा सोचो तो! मातृत्व के ग्यारह साल, ऐसी औरत के लिए! क्या जुल्म है! उसकी सारी जवानी, उसकी सारी खूबसूरती, सफलता की सारी आशा एक उज्ज्वल जीवन का सारा कवितामय विचार, सबकुछ प्रजनन के उस घृणित नियम की भेंट चढ़ गया, जो सामान्य स्त्री को बच्चे पैदा करने वाली मशीन भर बनाकर रख देता है।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“मास्कारे एक आदर्श पति रह चुकने के बाद अब बहुत तेज जिंदगी बिताता है। जब तक वह अच्छा पति रहा, उसका मिजाज बहुत गरम और रूखा था। किसी बात का जल्दी बुरा मान जाता था, लेकिन जबसे उसने अपनी मौजूदा लफंगों वाली जिंदगी शुरू की है, वह बिलकुल उदासीन हो गया है; लेकिन आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उसे कोई-न-कोई परेशानी तो है, कहीं कोई कीड़ा उसे खा रहा है, क्योंकि वह बहुत बूढ़ा हो गया है।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“उन गुप्त, अनजानी परेशानियों के बारे में बात करते रहे, जो परिवार में चरित्र की भिन्नताओं या शायद उन शारीरिक अरुचियों के कारण पैदा हो जाती हैं, जिन्हें पहले नहीं देखा गया होता,”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“किसी आदमी को धोखा देकर ही उससे पूरी तरह से बदला नहीं लिया जा सकता। उसे इस धोखे के बारे में मालूम भी होना चाहिए।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“जिंदगी के आखिरी दौर में, जब उसके बाल सफेद हो गए और माथे पर झुर्रियाँ पड़ गईं, तब यही शीलवान दार्शनिक एक मामूली आदमी की तरह खुद ही पकड़ में आ गया।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“वह तो बस बीस बरस की एक लड़की थी, जो किसी जंगली फूल सी प्यारी थी, जिसकी हँसी में खनखनाहट थी, जिसके दाँत धवल थे और मन ऐसा निर्मल था जैसे एक नया आईना, जिसमें अभी तक किसी का अक्स नहीं पड़ा था।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“वह उस मिथ्या सूत्र की साक्षात् मूर्ति रहा, जो सभी सार्वजनिक भवनों में दिखता है, जो स्वर्णिम युग के उन तीन शब्दों, ‘स्वतंत्रता, बंधुत्व और समानता’ से बना है और जो उन लोगों के होंठों पर कुछ-कुछ दुख भरी मुसकान ला देता है—जो सोचते हैं, जो कष्ट उठाते हैं और जो शासन करते हैं।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“यह औरत सबकुछ जोखिम में डाल देती है। यह ठीक इसीलिए होता है, क्योंकि वह यह जानती है, क्योंकि वह सबकुछ दे देती है, अपना दिल, अपना शरीर, अपनी आत्मा, अपनी इज्जत, अपनी जिंदगी; क्योंकि उसने सारे दुखों, सारे खतरों, सारी आफतों को पहले से देख लिया होता है; क्योंकि वह एक हिम्मत वाला काम करने का एक बहादुरी का काम करने का दुस्साहस करती है; क्योंकि वह हरेक चीज का सामना करने को तैयार और कृत संकल्प रहती है—सामना करने को अपने पति का, जो उसकी जान ले सकता है और सामना करने को उस समाज का, जो उसे बाहर कर सकता है। इसलिए तो वह अपने पति के साथ बेवफाई करने में बहादुरी से काम लेती है; इसलिए तो उसे लेने में उसके प्रेमी ने भी सबकुछ पहले से देखा ही होगा और सभी चीजों से ज्यादा उसे पसंद किया होगा, चाहे कुछ भी हो जाए। इससे ज्यादा मुझे और कुछ नहीं कहना।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“शादी की बड़ी सामाजिक अहमियत होती है, बड़ी कानूनी अहमियत होती है, लेकिन जिन हालात में यह आम तौर पर होती है, उसे देखते हुए मेरी नजर में इसकी बहुत ही कम नैतिक अहमियत है। ‘‘इसलिए जब ऐसी कोई औरत, जो इस कानूनी बंधन से तो अपने पति से बँधी होती है, लेकिन उससे कोई लगाव नहीं रखती, क्योंकि वह उससे प्यार नहीं कर सकती। जब ऐसी औरत जिसका दिल कोई बंधन नहीं मानता, जबकि वह औरत किसी ऐसे आदमी से मिलती है, जिसकी वह परवाह करती है और अपने आपको उसे सौंप देती है। जब कोई ऐसा आदमी जिसका कोई और बंधन नहीं होता, जब वह उस औरत को इस तरह से लेता है तो मैं कहता हूँ कि मेयर के सामने ‘हाँ’ कहने के मुकाबले वे इस आपसी और स्वतंत्र समझौते से एक-दूसरे के लिए अधिक वचनबद्ध होते हैं।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“जिस दिन मुझे यह अहसास हुआ कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ तो मैंने अपने आपसे यह कहा था, जो हरेक प्रेमी को ऐसे मामले में कहना चाहिए कि ‘जो आदमी किसी औरत से प्यार करता है, जो उसे जीतने की कोशिश करता है, जो उसे पाता है और जो उसे लेता है तो जहाँ तक उसका सरोकार है और जहाँ तक उस औरत का सरोकार है, वह एक पवित्र गठबंधन का अनुबंध करता है।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“मैंने देखा कि वे सभी अपने पड़ोसियों को सताने वाले रहे थे—वे द्वेष रखने वाले, बेईमान, पाखंडी, झूठे, बदमाश, निंदा करने वाले, ईर्ष्यालु रहे थे; उन्होंने चोरी की थी, धोखा दिया था, हर असम्मानजनक, हर घृणास्पद काम किया था—इन अच्छे पिताओं ने, इन वफादार बीवियों ने, इन समर्पित पुत्रों ने, इन शीलवती पुत्रियों ने, इन ईमानदार व्यापारियों ने, इन आदमियों और औरतों ने, जिन्हें निर्दोष कहा गया, इन्होंने यह सब किया था। वे सब-के-सब अपने अनंत वास स्थान की दहलीज पर, एक साथ सच लिख रहे थे; यह भयंकर और पवित्र सच था, जिससे उनके जीते-जी हर कोई अनजान था या अनजान होने का ढोंग करता था।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“यहाँ दफन है जाक ओलीवां, जो इक्यावन बरस की उम्र में मरा। वह अपने परिवार से प्रेम करता था, दयालु और इज्जतदार था और प्रभु की कृपा में मरा।’ मुरदा आदमी ने भी कब्र के पत्थर पर लिखी इबारत को पढ़ा; फिर उसने रास्ते के पास से एक पत्थर, एक छोटा, नुकीला पत्थर उठाया और सावधानी से अक्षरों को खुरचने लगा। उसने धीरे-धीरे उन्हें मिटा दिया और अपने आँखों के खोखले गड्ढों से उसने उन जगहों को देखा जहाँ वे खुदे हुए थे। फिर उस हड्डी के छोर से, जो उसकी तर्जनी हुआ करती थी, उसने चमकदार अक्षरों में ऐसे लिखा जैसे लड़के दीवारों पर दियासलाई के छोर से पंक्तियाँ लिखते हैं— ‘यहाँ विश्राम कर रहा है जाक ओलीवां, जो इक्यावन बरस की उम्र में मरा। उसने अपनी निर्दयता से अपने पिता की मौत को जल्दी बुला दिया, क्योंकि वह उनकी धन-दौलत का वारिस बनना चाहता था; उसने अपनी पत्नी को यातना दी, अपने बच्चों को सताया, अपने पड़ोसियों को धोखा दिया, जिस किसी को भी लूट सका, उसने लूटा और अभागी मौत मरा।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“मर चुके लोग मिट्टी में मिल रहे हैं, जहाँ सलीबें तक सड़-गल चुकी हैं, जहाँ संभवतया कल नवागंतुकों को जगह दी जाएगी। इस हिस्से में उपेक्षित गुलाब भरे पड़े हैं, मजबूत और गहरे रंग के सरो के पेड़ भरे पड़े हैं, यह एक उदास और खूबसूरत बाग है, जो इनसानी मांस पर पल रहा है।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“उठा और मुरदों के उस शहर में घूमने लगा। मैं चलता रहा, चलता रहा। कितना छोटा है यह शहर उस दूसरे, उस शहर के मुकाबले, जिसमें हम रहते हैं, फिर भी कितने अनगिनत हैं मुरदे जिंदा लोगों के मुकाबले। हमें चाहिए होते हैं ऊँचे-ऊँचे मकान, चौड़ी सड़कें और बहुत सारी जगह—चार पीढि़यों के लिए जो एक ही समय वजूद में आते हैं, सोते से पानी पीते हैं, लताओं से सुरा और मैदानों से रोटी खाते हैं।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“उठा और मुरदों के उस शहर में घूमने लगा। मैं चलता रहा, चलता रहा। कितना छोटा है यह शहर उस दूसरे, उस शहर के मुकाबले, जिसमें हम रहते हैं, फिर भी कितने अनगिनत हैं मुरदे जिंदा लोगों के मुकाबले। हमें चाहिए होते हैं ऊँचे-ऊँचे मकान, चौड़ी सड़कें और बहुत सारी जगह”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
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“वह आदमी सुखी है जिसका दिल वह सबकुछ भूल जाता है, जो उसमें समाया है, वह सबकुछ जो उसके सामने हुआ है, वह सबकुछ जिसने इसमें अपने आपको देखा है या जो इसके अनुराग में इसके प्यार में प्रतिबिंबित हुई है!”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“प्यार की बस एक ही कहानी होती है, जो हर बार एक सी होती है। मैं उससे मिला और उसकी कोमलता पर, उसकी सहलाहटों पर, उसकी बाँहों में, उसकी पोशाकों में, उसके बालों पर, उससे आने वाली हरेक चीज पर इतने मुकम्मिल तौर पर लिपटा, बँधा और घुला-मिला रहा कि मुझे फिर इस बात की परवाह ही नहीं रह गई कि हमारी इस पुरानी धरती पर दिन है या रात या मैं मुरदा हूँ या जिंदा?”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
“कोई प्यार क्यों करता है? प्यार क्यों करता है कोई? कितना अजीब होता है दुनिया में बस एक व्यक्ति को देखना, मन में बस एक खयाल बसाए रखना, दिल में बस एक ख्वाहिश पाले रखना और होंठों पर बस एक नाम लिये रहना—वह नाम जो आत्मा की गहराइयों से होंठों तक लगातार ऐसे आता रहता है, जैसे सोते में पानी; वह नाम जिसे व्यक्ति बार-बार कितनी ही बार दोहराता है, जिसे वह बिना रुके, हर कहीं प्रार्थना की तरह बुदबुदाता है।”
― Maupassan Ki Lokpriya Kahaniyan
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