Mansarovar - Part 6 Quotes
Mansarovar - Part 6
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Munshi Premchand139 ratings, 4.32 average rating, 0 reviews
Mansarovar - Part 6 Quotes
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“देश छोड़कर वहाँ नहीं जा सकता। अपनी मिट्टी गंगा जी को ही”
― Mansarovar - Part 6
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“नशेबाजों के वादों पर कोई दीवाना ही यकीन कर सकता है।”
― Mansarovar - Part 6
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“दुरवस्था ही वह परीक्षाग्नि है, जो मुलम्मे और रोगन को उतार कर मनुष्य का यथार्थ रूप दिखा देती है। ऐसे ही अवसरों पर विदित होता है कि मानव-ह्रदय पर कृमित्र भावों का कितना गहरा रंग चढ़ा होता है।”
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“शिला और भँवर के बीच में राज्य की नौका को चलाते रहना कितना कष्टसाध्य था!”
― Mansarovar - Part 6
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“विकार को निकलने का मार्ग नहीं मिलता, तो वह सारे शरीर में फैल जाता है।”
― Mansarovar - Part 6
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“मधुरता और मृदुलता, शील और विनय”
― Mansarovar - Part 6
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“रोशनुद्दौला भी राजा साहब से खार खाता था। उसे सदैव शंका रहती कि यह मराठों से मैत्री करके अवध-राज्य को मिटाना चाहते है। इसलिए वह राजा साहब के प्रत्येक काम में बाधा डालता रहता था। उसे अब भी आशा थी कि अवध का मुसलमानी राज्य अगर जीवित रह सकता है, तो अंग्रेजों के संरक्षण में, अन्यथा यह अवश्य हिंदुओं की बढ़ती हुई शक्ति का ग्रास बन जाएगा।”
― Mansarovar - Part 6
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“धर्म ही वह शक्ति है जो अंतःकरण में ओजस्वी विचारों को पैदा करती है। हाँ, इस विचारों को कार्य में लाने के लिए पवित्र और बलवान आत्मा की आवश्यकता है। नहीं तो वे ही विचार क्रूर और पापमय हो जाते है।”
― Mansarovar - Part 6
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“मैं एक हिंदू कन्या हूँ, माता-पिता जिसे सौंप दें, उसकी दासी बनकर रहना धर्म है। मुझे तन-मन से उसकी सेवा करनी चाहिए। किसी अन्य पुरुष का ध्यान तक मन में लाना मेरे लिए पाप है! आह! यह कलुषित हृदय लेकर मैं किस मुँह से पति के पास जाऊँगी! इन कानों से क्योंकर प्रणय की बातें सुन सकूँगी जो मेरे लिए व्यंग्य से भी अधिक कर्ण-कटु होंगी। इन पापी नेत्रों से वह प्यारी-प्यारी चितवन कैसे देख सकूँगी जो मेरे लिए वज्र से भी हृदय-भेदी होगी! इस गले में वे मृदुल प्रेमबाहु पड़ेंगे जो लौह-दंड से भी अधिक भारी और कठोर होंगे। प्यारे, तुम मेरे हृदय मंदिर से निकल जाओ। यह स्थान तुम्हारे योग्य नहीं। मेरा वश होता तो तुम्हें हृदय की सेज पर सुलाती; परंतु मैं धर्म की रस्सियों में बँधी हूँ।”
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“सुर्ख और हरि पत्तियों से लदी हुई डालियाँ सिर झुकाएँ चहकते हुए पक्षियों से रो-रोकर कहती थीं- कर गए थोड़े दिन की प्रीति।”
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“रसीला करुण स्वर, सितार का सुमधुर निनाद, उस पर गीत का माधुर्य,”
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“आँखें भर आई। मुस्कराई। खिले हुए फूल पर ओस की बूँदें टपकीं।”
― Mansarovar - Part 6
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“भय के अंत को साहस कहते है।”
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“गंगा जी में संतोषदायी शांति विराज रही थी। तरंगें तारों को गोद में लिये सो रही थी। चारों ओर सन्नाटा था।”
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“मैंने इस कुल-कलंकिनी के लिए तीन साल तक जो कठिन तपस्या की है, उससे ईश्वर मिल जाता; पर इसे न पा सका!”
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“मोटा काम मुखाकृति पर असर डाले बिना नहीं रहता। मजदूर सुंदर वस्त्रों में भी मजदूर ही रहता है।”
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“यह वह अध-खिला फूल न था; जिसकी पंखुड़ियाँ अनुकूल जलवायु न पाकर सिमट गई थी। यह पूर्ण विकसित कुसुम था – ओस के जल-कणों से जगमगाता और वायु के झोंकों से लहराता हुआ। विमल उसकी सुंदरता पर पहले भी मुग्ध था; पर यह ज्योति वह अग्निज्वाला थी, जिससे हृदय में ताप और आँखों में जलन होती थी। ये आभूषण, ये वस्त्र, यह सजावट!”
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“लेकिन शृंगार क्या है? सोई हुई काम-वासना को जगाने का घोर नाद, उद्दीपन का मंत्र। शीतला जब नख-शिख से सजकर बैठती है, तो उसे प्रबल इच्छा होती है कि मुझे कोई देखे।”
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“आग से सेके हुए मृदंग की भाँति लोग के स्वर कर्कश हो गए थे।”
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“लावण्य-विहीन स्त्री वह भिक्षुक नहीं है, जो चंगुल भर आटे से संतुष्ट हो जाए। वह भी पति का संपूर्ण, अखंड प्रेम चाहती है, और कदाचित सुंदरियों से अधिक, क्योंकि वह इसके लिए असाधारण प्रयत्न और अनुष्ठान करती है।”
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“संयम और आचार सम्मान-सिद्धि के मंत्र है।”
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“ज्ञान से जागे हुए विराग में चाहे मोह का संस्कार हो, पर नैराश्य से जागा हुआ विराग अचल होता है। प्रकाश में इधर की वस्तुओं को देखकर मन विचलित हो सकता है। पर अंधकार में किसका साहस है, जो लीक से जौ भर हट सके।”
― Mansarovar - Part 6
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“नारी का हृदय प्रेमपाश से नहीं बँधता, कंचन के पाश ही से बँध सकता है।”
― Mansarovar - Part 6
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“अगहन का महीना था, बरगद की डालियाँ में मूँगे के दाने लगे हुए थे।”
― Mansarovar - Part 6
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“जैसी सुरूपवती और सर्वगुणसंपन्ना थी वैसी ही प्रसन्नवदना और मृदुभाषिणी भी थी।”
― Mansarovar - Part 6
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“बहुत कठिन है। दुनिया का जंजाल अपने सिर लीजिए, दूसरों के लिए रोइए, दीनों की रक्षा के लिए लट्ठ लिये फिरिए, और कष्ट, अपमान और यंत्रणा का पुरस्कार क्या है? अपनी जीवनाभिलाषाओं की हत्या।”
― Mansarovar - Part 6
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“यह वकालत नहीं की जो मैं और मेरे हजारों भाई कर रहे हैं, जिससे न्याय और धर्म का खून हो रहा है। उनकी वकालत उच्चकोटि की थी।”
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“पत्थर की मूर्ति मानव-शरीर से अधिक श्रद्धास्पद होती है।”
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“पत्र संपादन एक बहुत ही ईर्ष्यायुक्त कार्य है, जो चित्त की समग्र वृत्तियों का अपहरण कर लेता है।”
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“वैष्णव साधु बैठे हुए प्रसाद पा रहे थे। मीरा स्वयं अपने हाथ से थाल ला-लाकर उनके आगे रखती थी। साधुओं और अभ्यगतों के आदर-सत्कार में उस देवी को आत्मिक आनंद प्राप्त होता था। साधुगण जिस प्रेम से भोजन करते थे, उससे यह शंका होती थी कि स्वादपूर्ण वस्तुओं में कहीं भक्ति-भजन से भी अधिक सुख तो नहीं है।”
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