प्रेमाश्रम [Premashram] Quotes
प्रेमाश्रम [Premashram]
by
Munshi Premchand246 ratings, 4.24 average rating, 12 reviews
प्रेमाश्रम [Premashram] Quotes
Showing 1-22 of 22
“खा लो, थाली परसूं।”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“मेरा पति नहीं, मेरा घर अब मेरा घर नहीं, मैं अब अनाथ हूं, कोई मेरा पूछने वाला नहीं”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“यह ईर्ष्या का भाव न था जिसमें अहित चिंता होती है, यह प्रीति का भाव न था, जिसमें रक्त की तृष्णा होती है । यह अपने आपको जलाने वाली आग थी यह वह विघातक क्रोध था जो अपना ही ओंठ चबाता है, अपना ही चमड़ा नोचता है, अपने ही अंगों को दांतों से काटता है”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“मेरे पास एक धन था, इसी का मुझे अभिमान था, इसी का मुझे बल था । तुमने मेरा अभिमान तोड़ दिया, मेरा बल हर लिया । जब आग ही नहीं तो राख किस काम की ? यह सुहाग की पेटारी है, यह सुहाग की डिबिया है, इन्हें लेकर क्या करूं ?”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“कितना करुणाजनक दृश्य था ? आंखों से अश्रु-धारा बह रही थी और वह अपनी चूड़ियां तोड़-तोड़कर जमीन पर फेंक है उसके निर्बल क्रोध की चरम सीमा थी”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“जलतरंग, ताऊस, सितार, सरोद, वीणा, पखावज, सारंगी सभी यंत्रों पर उसका विलक्षण आधिपत्य था”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“स्त्रियों के आंसू पानी हैं, वे धैर्य और मनोबल से ह्लास के सूचक हैं ।”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“जिस तरह बीमारी में मनुष्य को ईश्वर याद आता है उसी तरह अकृतकार्य होने पर उसे अपने दुस्साहसों पर पश्चाताप होता है । पराजय का आध्यात्मिक महत्त्व विजय से कहीं अधिक होता है ।”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“संसार में ऐसा कौन प्राणी है जो स्वार्थ के लिए अपनी आत्मा का हनन न करता हो”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“रेशम का जाल है, देखने में सुंदर, किंतु कितना जटिल”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“सिद्धांत-प्रियता का यह आशय नहीं है कि आत्मीयजनों से विरोध कर लिया जाए । सिद्धांतों को मनुष्यों से अधिक मान्य समझना अक्षम्य है”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“तीस वर्ष की धर्म-निष्ठा और आत्मिक श्रद्धा नष्ट हो गई । धार्मिक विश्वास की दीवार हिल गई और उसकी ईटें बिखर गई । कितना हृदय-विदारक दृश्य था। प्रेमशंकर का हृदय गद्गद हो गया । भगवान्। इस असभ्य, अशिक्षित और दरिद्र मनुष्य का इतना आत्माभिमान । इसे अपमान ने इतना मर्माहत कर दिया! कौन कहता है, गंवारों में यह भावना निर्जीव हो जाती है? कितना दारुण आघात है, जिसने भक्ति, विश्वास और आत्मगौरव को नष्ट कर डाला”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“यह पत्थर का ढेला है, निरा मिट्टी का पिंडा । मैं अब तक भूल में पड़ा हुआ था। समझता था, इसकी उपासना करने से मेरे लोक-परलोक दोनों बन जाएंगे । आज आंखों के सामने से वह पर्दा हट गया यह निरा मिट्टी का ढेला है । यह लो महाराज, जाओ, जहां तुम्हारा जी चाहे । तुम्हारी यही पूजा है । तीस साल की भगती का तुमने मुझे जो गदला दिया है, मैं भी तुम्हें उसी का बदला देता हूं”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“भगत उनके बीच से खड़े हाथ में शालिग्राम की मूर्ति लिए उन्मत्तों की भांति बहक-बहककर कह रहे थे—यह शालिग्राम हैं ! अपने भक्तों पर बड़ी दया रखते हैं । सदा उनकी रक्षा किया करते हैं ! इन्हें मोहनभोग बहुत अच्छा लगता है ! कपूर और धूप की महक बहुत अच्छी लगती है । पूछो, मैंने इनकी कौन सेवा नहीं की? आप सत्तू खाता था, बच्चे चबेना चबाते थे, इन्हें मोहनभोग का भोग लगाता था । इनके लिए जाकर कोसों से फूल और तुलसीदल लाता था । अपने लिए तमाखू चाहे न रहे, पर इनके लिए कपूर और धूप की फिकिर करता था । इनका भोग लगा के तब दूसरा काम करता था । घर में कोई मरता ही क्यों न हो, पर इनकी पूजा-अर्चना किए बिना कभी न उठता था। कोई दिन ऐसा न हुआ कि ठाकुरद्वारे में जाकर चरणामृत न पिया हो, आरती न ली हो, रामायाण का पाठ न किया हो । यह भगती और सर्धा क्या इसलिए की कि मुझ पर जूते पड़ें, हकनाहक मारा जाऊं, चमार बनूं? धिक्कार मुझ पर, जो फिर ऐसे ठाकुर का नाम लूं, जो इन्हें अपने घर में रखूं, और फिर इनकी पूजा करूं ! हां, मुझे धिक्कार है ! ज्ञानियों ने सच कहा है कि यह अपने भगतों के बैरी हैं, उनका अपमान कराते हैं, उनकी जड़ खोदते हैं, और उससे प्रसन्न रहते हैं जो इनका अपमान करे । मैं अब तक भूला हुआ था। बोलो मनोहर, क्या कहते हो, इन्हें में फेंकूं या घूर पर डाल दूं, जहां इन पर रोज मनों कूड़ा पड़ा करे या राह में फेंक दूं जहां से सांझ तक इन पर लातें पड़ती रहें?”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“लोक-निंदा के भय से अपने प्रेम या अरुचि को छिपाना अपनी आत्मिक स्वाधीनता को खाक में मिलाना है । मैं उस स्त्री को सराहनीय नहीं समझता जो एक दुराचारी पुरुष से केवल इसलिए भक्ति करती है कि वह उसका पति है । वह अपने उस जीवन को, जो सार्थक हाे सकता है, नष्ट कर देती है । यही बात पुरुषों पर भी घटित हो सकती है”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“इच्छाओं को जीवन का आधार बनाना बालू की दीवार बनाना है । धर्म-ग्रंथों में आत्म-दमन और संयम की अखंड महिमा कही गई है, बल्कि इसी को मुक्ति का साधन बताया गया है । इच्छाओं और वासनाओं को ही मानव पतन का मुख्य कारण सिद्ध किया गया है और मेरे विचार में यह निर्विवाद है । ऐसी दशा में पश्चिम वालों का अनुसरण करना नादानी है । प्रथाओं की गुलामी इच्छाओं की गुलामी से श्रेष्ठ है”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“जो दूसरे का गड्ढा खोदेगा, उसके लिए कुआं तैयार है”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“इच्छाओं और वासनाओं को ही मानव पतन का मुख्य कारण सिद्ध किया गया है और मेरे विचार में यह निर्विवाद है”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“मेरा सिद्धांत है कि मनुष्य को अपनी मेहनत की कमाई खानी चाहिए । यही प्राकृतिक नियम है । किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरों की कमाई को अपनी जीवन-वृत्ति का आधार बनाए”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“पुरुषार्थी लोग दूसरों की सम्पत्ति पर मुंह नहीं फैलाते। अपने बाहुबल का भरोसा रखते हैं।”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“क्रोध में आदमी अपने मन की बात नहीं कहता। वह केवल दूसरे का दिल दुखाना चाहता है।”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
“क्रोध को दुर्वचन से विशेष रुचि होती है।”
― प्रेमाश्रम [Premashram]
― प्रेमाश्रम [Premashram]
