Innerline Pass Quotes

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Innerline Pass Innerline Pass by Umesh Pant
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Innerline Pass Quotes Showing 1-13 of 13
“जितना हम शहर में रहते हैं उससे भी ज़्यादा शहर हममें रहने लगता है।”
Umesh Pant, Innerline Pass
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“इतिहास जाने बिना यात्राएँ कितनी अधूरी रह जाती हैं।”
Umesh Pant, Innerline Pass
“घुम्मकड़ी के लिए चिन्ताहीन होना आवश्यक है, और चिन्ताहीन होने के लिए घुमक्कड़ी भी आवश्यक है।”
Umesh Pant, Innerline Pass
“जितनी देर में हम यह तय करते कि यहाँ से यहाँ कूदेंगे और फिर यहाँ से यहाँ। उतनी देर में नदी उस यहाँ का अस्तित्व मिटा देती। ऐसा लग रहा था कि वो हमारे मनुष्य होने का मज़ाक़ उड़ा रही हो और कह रही हो मैं अपनी पर आ गई तो तुम्हारी कोई औक़ात नहीं”
Umesh Pant, Innerline Pass
“पैसा हासिल करने के लिए नौकरी नहीं, बल्कि अनुभव हासिल करने के लिए यात्राएँ अगर जीवन का सच बन जातीं तो ज़िंदगी कितनी हसीन होती!”
Umesh Pant, Innerline Pass
“ज़िंदगी में इससे पहले कभी भोजपत्र के पेड़, जंगली भरल, झुप्पू और ग्लेशियर नहीं देखे थे। जो नहीं जानता था कि पाँच हज़ार मीटर की ऊँचाई पर खड़े होकर दुनिया को अपने क़दमों के नीचे महसूस करना कैसा होता है?”
Umesh Pant, Innerline Pass
“यहाँ वही पहुँच पाते हैं जो ज़िंदगी के रोज़मर्रापन में थोड़ा कम यक़ीन रखते हैं। जो कुछ समय के लिए ही सही उन बेड़ियों को तोड़ पाते हैं जो आपको ज़िंदगी के बहुत क़रीब आने से रोक देती हैं। इतना क़रीब कि आप यह जानने लगें कि आपकी धड़कनें वायुमंडल का कितना दबाव सह सकती हैं। आपके पैर कितने मील चलकर डगमगाने लगते हैं। आपका चेहरा कितना थककर पसीने से नहा जाता है। आप कितनी ठंढ सहन कर सकते हैं और किसी अजनबी की मुस्कराहट देखके आप कितने ख़ुश हो सकते हैं या फिर बिना किसी पुराने रिश्ते के आप पहली बार किसी के दुःख को देखकर कितना दुःखी हो सकते हैं।”
Umesh Pant, Innerline Pass
“जहाँ हम इस वक़्त खड़े थे वहाँ बड़ी-बड़ी पर्वत शृखलाएँ हमें ख़ुद से नीचे दिखाई दे रही थीं। यह वो जगह थी जहाँ इंसान नहीं बसते। दूर-दूर तक बस हवा की आवाज़। न पेड़, न पंछी, एक शांत-सी झील मौनव्रत करती हुई। चारों तरफ़ नुकीले पहाड़ बर्फ़ पहने हुए। जैसे कोई बाहर की दुनिया हो वो जहाँ न कोई बड़ी इच्छा है, न कोई डर, न घबराहट। जैसे सारी जिज्ञासाएँ ख़त्म हो गई हों। मन धुल गया हो जैसे। यहाँ प्रकृति से कोई छेड़छाड़ नहीं थी। कुछ भी बनावटी नहीं था। बिना छेड़छाड़ के, बिना बनावट के, निहायती मौलिक हो जाना कितना ख़ूबसूरत और मासूम हो सकता”
Umesh Pant, Innerline Pass
“सारे सवालों का मौन उत्तर देता हुआ-सा एक रहस्यमय वातावरण था यह। सचमुच यहाँ एक ऐसा सम्मोहन था कि लौटने का मन नहीं कर रहा”
Umesh Pant, Innerline Pass
“बाद में पता चला कि जानवर का नाम ‘फिया’ है।”
Umesh Pant, Innerline Pass
“एक चील उसकी चोटी को छू आने की कोशिश कर रही थी। जैसे झक सफ़ेद पश्मीना ओढ़े कोई उजला शख़्स किसी सोच में डूबा कोई कविता लिख रहा हो।”
Umesh Pant, Innerline Pass
“यहाँ पहली बार हमें झुपू नाम के उस पशु से भी मिलने का मौक़ा मिला जो दरअसल याक और गाय का क्रॉस होता है। एक”
Umesh Pant, Innerline Pass
“घुमक्कड़ धर्म से बढ़कर दुनिया में कोई धर्म नहीं है। धर्म भी छोटी बात है, उसे घुमक्कड़ के साथ लगाना ‘महिमा घटी समुद्र की रावण बसा पड़ोस’ वाली बात होगी। घुमक्कड़ होना आदमी के लिए परम सौभाग्य की बात है। यह पंथ अपने अनुयायी को मरने के बाद किसी काल्पनिक स्वर्ग का प्रलोभन नहीं देता। इसके लिए तो कह सकते हैं “क्या ख़ूब सौदा नक़द है, इस हाथ ले उस हाथ दे”। घुमक्कड़ी वही कर सकता है, जो निश्चिंत है। घुमक्कड़ी के लिए चिंताहीन होना आवश्यक है, और चिंताहीन होने के लिए घुमक्कड़ी भी आवश्यक है। दोनों का अन्योन्याश्रय होना दूषण नहीं, भूषण है। घुमक्कड़ी से बढ़कर सुख कहाँ मिल सकता है, आख़िर चिंताहीनता तो सुख का सबसे स्पष्ट रूप है। घुमक्कड़ी में कष्ट भी होते हैं, लेकिन उसे उसी तरह समझिए, जैसे भोजन में मिर्च। मिर्च में यदि कड़वाहट न हो, तो क्या कोई मिर्च-प्रेमी उसमें हाथ भी लगाएगा? वस्तुतः घुमक्कड़ी में कभी-कभी होने वाले कड़वे अनुभव उसके रस को और बढ़ा देते हैं- उसी तरह जैसे काली पृष्ठभूमि में चित्र अधिक खिल उठता है। (‘घुमक्कड़ शास्त्र’ के निबंध ‘अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा’ में राहुल सांकृत्यायन)”
Umesh Pant, Innerline Pass