राजसूय यज्ञ Quotes

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राजसूय यज्ञ (कृष्ण की आत्मकथा # 6) राजसूय यज्ञ by Manu Sharma
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“मस्तिष्क में विवेक और क्रोध का एक ही कक्ष होता है। जब विवेक आता है तब क्रोध वहाँ से भाग जाता है और जब क्रोध आता है तो विवेक नहीं ठहरता।”
Manu Sharma, राजसूय यज्ञ
“जब क्रोध असमर्थ हो जाता है तब वह गालियों के व्यर्थ बाण छोड़ने लगता है।”
Manu Sharma, राजसूय यज्ञ
“अमूर्त को मूर्त में देखना ही तो कला है, अग्रजश्रेष्ठ!”
Manu Sharma, राजसूय यज्ञ
“खाना-पीना और परिवार के साथ रहना, यह तो पशु प्रवृत्ति है। मनुष्य तो हमेशा दूसरों के लिए जीता है।”
Manu Sharma, राजसूय यज्ञ
“ईर्ष्या का विष-वृक्ष अपनत्व की धरती पर ही उगता है।”
Manu Sharma, राजसूय यज्ञ
“नारी का अहं तो पानी का बुलबुला है। अनुकूल हवा मिली तो लहरों के सिर चढ़ा और जरा सी स्थिति गड़बड़ाई तो फूटकर बिखरा।”
Manu Sharma, राजसूय यज्ञ
“शासन के लिए अनुशासन की आवश्यकता है।”
Manu Sharma, राजसूय यज्ञ
“वियोग में वही चंद्रमा जलाता है और संयोग में शीतल लगता है। चंद्रमा वही है, मन बदलते ही वह भी बदला नजर आता”
Manu Sharma, राजसूय यज्ञ
“जब चंद्रमा को लोग पाते नहीं तब चाँदनी को ही कोसते हैं।”
Manu Sharma, राजसूय यज्ञ