स्मृति की रेखाएँ Quotes
स्मृति की रेखाएँ
by
Mahadevi Verma63 ratings, 4.40 average rating, 6 reviews
स्मृति की रेखाएँ Quotes
Showing 1-30 of 30
“विनोद के”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“रूप प्रकृति का दान है और नाम माता-पिता का उपहार”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“बिबिया ने एक बार भी गहने-कपड़े के लिए हठ नहीं किया, वह एक दिन भी पति की स्नेहपात्री को द्वन्द्वयुद्ध के लिए ललकारने नहीं गई और वह कभी पति की उदासीनता का विरोध करने के लिए कोप-भवन में नहीं बैठी। इन त्रुटियों से प्रमाणित हो जाता था कि वह पति में अनुराग नहीं रखती और जो अनुरक्त नहीं, वह विरक्त माना जायेगा। फिर जो एक ओर विरक्त है, उसके किसी दूसरे ओर अनुरक्त होने को लोग अनिवार्य समझ बैठते हैं। इस तर्क-क्रम से जो दोषी प्रमाणित हो चुका हो,”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“कुछ शिथिल जान पड़ते थे। हाथ दृढ़ता के साथ चिकारा थामता था; पर उँगलियाँ तार के साथ काँपती थीं । पैर विश्वास के साथ पृथ्वी पर पड़ते थे; पर पिंडलियों की थरथराहट गति को डगमग कर देती थी। कण्ठ में पहले जैसा ही लोच था; पर कफ की घरघराहट उसे बेसुरा बनाती रहती थी। आँखों में ममता का वही आलोक था; पर समय ने अपनी छाया डालकर उसे धुँधला कर दिया था। मुख पर वैसी ही उन्मुक्त हँसी का भाव था; पर मानो धीरे-धीरे साथ छोड़नेवाले दाँतों को याद रखने के लिए ओठों ने अपने ऊपर स्मृति की रेखाएँ खींच ली थीं।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“उनका बाह्य जीवन दीन है और हमारा अन्तर्जीवन रिक्त। उस समाज में विकृतियाँ व्यक्तिगत हैं; पर सद्भाव सामूहिक रहते हैं। इसके विपरीत हमारी दुर्बलताएँ समष्टिगत हैं, पर शक्ति वैयक्तिक मिलेगी।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“वह दंगल का मैदान है जिसका सम धरातल भी हार-जीत के दाँव-पेचों के कारण सतर्कता की भ्रान्ति उत्पन्न करता है।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“भाव यदि मनुष्य की क्षुद्रता, दुर्भावना और विकृतियाँ नहीं बहा पाता, तब वह उसकी दुर्बलता बन जाता है। इसी स्नेह, करुणा आदि के भाव हृदय की शक्ति बन सकते हैं और द्वेष, क्रोध आदि के दुर्भाव उसे और अधिक दुर्बल स्थिति में छोड़ जाते हैं।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“कवि कहेगा ही क्या, यदि उसकी इकाई सब की इकाई बनकर अनेकता नहीं पा सकी और श्रोता सुनेंगे ही क्या, यदि उन सबकी विभिन्नताएँ कवि में एक नहीं हो सकीं।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“ठंडी जमीन, चादर, पुआल आदि पर जो सृष्टि सो रही थी, उसके बाह्य रूप और हृदय में इतना अन्तर क्यों है, यही मैं बार-बार सोच रही थी। उनके हृदय का संस्कार, उनकी स्वाभाविक शिष्टता, उनकी रस-विदग्धता, उनकी कर्मठता आदि का क्या इतना कम मूल्य है कि उन्हें जीवन-यापन की साधारण सुविधाएँ तक दुर्लभ हो”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“बुझाये देती हूँ, कहने पर सहुआइन ने आगे बढ़कर आँचल की हवा से उसे बुझा दिया। बेचारी को भय था कि मैं शहराती शिष्टाचार हीनता के कारण कहीं फूँक से ही न बुझा बैठूँ।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“सहुआइन ने पहले बाहर से झाँका, फिर एक पैर भीतर रखकर विनीत भाव से जो कहा, उसका आशय था कि अब दिये को विदा कर देना चाहिए, उसकी माँ राह देखती होगी।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“साँस भर आने के कारण रुक-रुक कर, गाये हुए गीत मानो हृदय के रस से भीगकर भारी हो गये थे।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“जलहरी में विराजमान महादेवजी,”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“गाँव का जीवन इतना उत्पीड़ित और दुर्वह होता जा रहा है कि उसमें मनुष्यता को विकास के लिए अवकाश मिलना ही कठिन है”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“कला सांसारिक और विशेषतः व्यावसायिक बुद्धि को पनपने ही नहीं दे सकती और बिना इस बुद्धि के मनुष्य अपने आपको हानि पहुँचा सकता है, दूसरों को नहीं।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“जीवन के सम्बन्ध में निरनतर जिज्ञासा मेरे स्वभाव का अंग बन गई है।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“शीतलपाटी,”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“प्रतिवाद के उपरान्त तो मत-परिवर्तन सहज है; पर मौन में इसकी कोई सम्भावना शेष नहीं रहती।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“मौन मेरी पराजय का चिह्न नहीं, प्रत्युत् वह जय की सूचना है,”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“प्रश्नों की अजस्त्र वर्षा”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“तरल आँखों की चकित सभीत दृष्टि मेरा कण्ठ रूँध देती है,”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“मुन्नू की माई को सुन्दरी कहना असत्य है और कुरूप कहना कठिन। वास्तव में उसका सौन्दर्य रेखाओं में न रहकर भाव में स्थिति रखता है, इसी से दृष्टि उसे नहीं खोज पाती, पर हृदय उसे अनायास ही अनुभव कर लेता है”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“पाँच जल की धाराओं से घिरा और रंग-बिरंगे फूलों में छिपे चरणों से लेकर शून्य नीलिमा में प्रकट मस्तक तक सफेद हिम में समाधिस्थ केदार का पर्वत देखा वे ही उसका आकर्षण जान सकते हैं। मीलों दूर से ही वह उज्ज्वल शिखर अक्षरहीन आमंत्रण के समान खुला दिखाई देता है।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“उत्ताल तरंगों में ताण्डव करती हुई अलकनन्दा के किनारे,”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“प्रशान्त अलकनन्दा के तट पर बसी उस अलकापुरी में पहुँच जाने के लिए केदार का पथ छोड़ देना ठीक समझा।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“मनुष्य के भाव के समान संप्रेषणीय और कुछ नहीं है,”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“मनुष्य को संसार से बाँधने वाला विधाता माँ ही है,”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“करुणा की भाषा शब्दहीन रहकर भी बोलने में समर्थ है।”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“बहुत रात गये सोने पर भी मैं जल्दी ही उठती हूँ”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
“दिनभर के कार्य-भार से छुट्टी पाकर जब मैं कोई लेख समाप्त करने या भाव को छन्दबद्ध करने बैठती हूँ, तब छात्रावास की रोशनी बुझ चुकती है,”
― स्मृति की रेखाएँ
― स्मृति की रेखाएँ
