श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते Quotes

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श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते by Dinkar Joshi
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“बद्रीनाथ की यह प्रतिमा पारसमणि की थी। पारसमणि का स्पर्श पाकर कोई भी वस्तु सुवर्ण की हो जाती है। उद्धव को लगा, हिमालय के ये पतितपावन शीत शिखर, बर्फ से ढके नहीं थे वरन् सुवर्ण से”
Dinkar Joshi, श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“वैधव्य के साथ जुड़े हुए अन्य लक्षण—अवस्था, निराशा, प्रौढ़ता, बेचारापन—राधा में तो ऐसा कोई लक्षण नहीं। अरे, यहाँ तक कि राधा तो काल से भी अस्पर्श्य रही है। जैसी वर्षों पहले थी वैसी-की-वैसी स्वस्थ, जवान, चैतन्य से भरपूर और समर्पण में डूबी। यह कैसे संभव हुआ? महाकाल भी क्या कभी रुक जाता है? ‘‘उद्धव...’’ अंधकार को चीरती हुई राधा की आवाज सुनाई दी। उद्धव ने कदम बढ़ाए। कालिंदी-तट पर, खुले आकाश के नीच आकर राधा खड़ी हो गई। ‘‘ये रहे कृष्ण, उद्धव, ये रहे,’’ राधा उद्धव के अभिमुख होकर बोली, ‘‘आप यह आकाश देख रहे हैं न; बहती कालिंदी देख रहे हैं; हवा में लहराते उस तमाल वृक्ष के पत्ते देख रहे हैं—ये सब हैं, और आप कहते हैं कि कृष्ण नहीं? यह कैसे हो सकता है, उद्धव?क्या आप...आप कृष्ण को मात्र पार्थिव देह में ही देख सकते हैं?”
Dinkar Joshi, श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“आकाश, पृथ्वी तथा सर्व दिशाओं में व्याप्त रुद्र, मरुत, आदित्य, वारुत और सिद्ध सर्व को समेटते हुए—जिस प्रकार नदियों के प्रवाह सागर की ओर बहते हैं, उस प्रकार समग्र मनुष्यलोक को उस आकृति में एकरूप होते हुए...”
Dinkar Joshi, श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“शतधन्वा को मारकर कृष्ण ने उसे हथिया लिया; और इस अमूल्य धनराशि में से उसे बलराम को हिस्सा न देना पड़े, इसलिए उसने मणि कहीं छिपा दी। बलराम और समग्र यादवगण को कृष्ण अँधेरे में रखना चाहता है क्या?”
Dinkar Joshi, श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“व्यक्ति पर हुआ अन्याय चाहे जितना निष्ठुर हो, तब भी किसी सामर्थ्यवान् व्यक्ति को अपना एकाधिकार स्थापित करने का अधिकार नहीं मिल जाता!”
Dinkar Joshi, श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“निर्माण में जय-पराजय दोनों अनिवार्य होते हैं।”
Dinkar Joshi, श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“बकुल पुष्पों की भाँति कुम्हलाई हुई-सी स्मृति पर आपने अभी जल का जो छिड़काव किया उससे स्मृति पंखुडि़याँ फिर खिल उठी हैं। उसकी सुगंध फिर हवा में महक उठी”
Dinkar Joshi, श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“पुरानी आँखों से नई नगरी के दर्शन किए।”
Dinkar Joshi, श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“आचार्यपुत्र! तुम्हें सुदर्शन चक्र ही चाहिए न! इसमें इतनी बड़ी बात क्या है?...इसके लिए तुम्हें अपनी अमोघ शस्त्र-विद्याओं का विक्रय करने की कोई आवश्यकता नहीं। अभी तो मुझे तुम्हारी विद्याओं की कोई जरूरत भी नहीं, जब होगी, तब मैं उसकी व्यवस्था कर लूँगा, वत्स! जाओ, सुदर्शन चक्र इस क्षण से तुम्हारा हुआ। तुम खुशी से उसे यहाँ से ले जाओ,’’ और फिर कुछ रुककर इतना और जोड़ा, ‘‘यदि ले जा सको तो!’’ ‘सुदर्शन चक्र इस क्षण से तुम्हारा है!’—इतना सुनते ही अश्वत्थामा के लिए कुछ सुनना शेष न रहा। वह तो एक उल्लास में डूब-सा गया। कृष्ण के और कोई शब्द उस तक पहुँच नहीं सके—कृष्ण ने एकदम अंत में जो कहा। वह अश्वत्थामा के कान में पड़ा हो तो भी उसने वह सुना नहीं।”
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“कुरुक्षेत्र के उस प्रभात में जो हुआ, उसे कितना समय बीता होगा, उद्धव?’’ अश्वत्थामा ने अचानक ही पूछा। उसकी आँखों में चमक आई। ‘‘तात, तीन हजार वर्ष की अवधि पूरी होने में अब कितने वर्ष और शेष रह गए हैं?”
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“उस प्रत्येक घड़ी में कृष्ण का अवलंबन था, क्या आप यह भूल गए?...वस्त्रहरण की क्रूर घड़ी में, पाँच पतियों और स्वयं पितामह भीष्म से जो नहीं हो सका, वह कृष्ण ने किया था; वनवास के दुःखों के बीच, दुर्वासा की क्रोधाग्नि से हमें बचाने के लिए वे कृष्ण ही तो थे, जिन्होंने अक्षयपात्र से चावल का जूठा दाना खा लिया था...अब...अब...? वह अवलंबन अब नहीं रहा, वह आधार ही नहीं रहा...”
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“जिस राधा से कृष्ण गोकुल छोड़ने के बाद फिर कभी नहीं मिले, जिस राधा का कृष्ण ने कभी कोई उल्लेख किसीके सामने नहीं किया, वह राधा, कृष्ण के हृदय में वह राधा इस हद तक बसी थी—आज उद्धव को कितना रोमांच हो रहा था यह जानकर! वह मुग्ध हो गया था कृष्ण के इस रूप पर।”
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“कृष्ण के चरणों में सिर रखकर राधा फफक उठी थी। और फिर आँसू, उसकी आँखों से कृष्ण के तलवों तक जैसे एक थरथराता तार था—आँसुओं का। राधा से फिर कभी कृष्ण मिले नहीं। ‘‘जरा...!’’ कृष्ण ने बात पूरी की—‘‘अर्जुन से कहना, गोकुल में...गोकुल में राधा को संदेशा भेजे कि कृष्ण की प्रतीक्षा अब व्यर्थ है। बस, इतना ही...अर्जुन से कहना,”
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“भव्यता विस्तार और कद के अधीन नहीं होती,”
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“धनंजय, तुम ठीक कहते हो; पर कारावास से मुक्ति जिसने दी, पुत्र, उसीने अब यह नया कारावास भी तो दे दिया।”
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“महायुद्ध के अंतिम दिन आपने जिस रथ से मुझे पहले उतारा, उस रथ से आप ही प्रथम उतर गए होते तो...तो यह कठिन घड़ी आज मेरे सामने न होती। शस्त्रास्त्रों के कारण पहले से ही धधक रहा रथ तब पलक झपकते ही भस्म हो गया था। मैं भी उस ज्वाला के साथ ही भस्म हो गया होता”
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“अश्वों के पास शब्द नहीं हैं, भाई, किंतु उनमें भाव भी नहीं होंगे,”
Dinkar Joshi, श्याम, फिर एक बार तुम मिल जाते
“देहधारी के लिए इस परम सत्य को समझने का कदाचित् यही मौका है। देहधारी स्वयं में कोई निर्माण नहीं है, अर्जुन, वह मात्र निमित्त है! देह द्वारा प्रकट सत्य मात्र उस क्षण का सत्य होता है। उस सत्य को, उस क्षण प्राप्त करने में जो पीछे रह जाते हैं, उनके लिए फिर नया सत्य प्रकट होता है। सत्य की यही प्रक्रिया है जो शाश्वत है, वत्स!”
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