Uttarraamcharit Quotes
Uttarraamcharit
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Uttarraamcharit Quotes
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“भगवति पृथिवि! आप संसार की शरीर-रूप हो।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“गंगा : कौन प्राणी फल देने के लिए तत्पर भाग्य के द्वारों को बन्द करने के लिए समर्थ हो सकता है?”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“सन्तान स्नेह की पराकाष्ठा है। यह माता-पिता को परस्पर संश्लिष्ट करने वाली अविच्छेद्य ग्रन्थि है। अपत्य वह आनन्द-ग्रन्थि है, जो दम्पति के अन्तःकरण-तत्त्वों को स्नेह-बन्धनों में बाँध देती है।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“गम्भीर एवं पवित्र जल, परस्पर टकराती हुई लहरों के कारण कोलाहल करते हुए, ऊपर उछल रहे हैं।।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“प्रणयी व्यक्ति कुछ न भी करता हुआ सुखों से दुःखों को तिरोहित कर देता है। जिसका जो प्रेमी जन है, वह उसका कोई अनुपम धन है।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“संसारी साधुओं की वाणी तो अर्थ का अनुसरण करती है, परन्तु आदि ऋषियों के सम्बन्ध में यह सत्य है कि अर्थ उनकी वाणी का अनुसरण करता है।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“तेजस्वी पुरुष दूसरों के फैलते हुए तेज को सहन नहीं कर सकता। ऐसा उसका स्वभाव ही होता है,”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“यह शीतल स्पर्श चन्द्रमा की ज्योत्स्ना एवं चन्दन की रसधारा के सदृश मेरे सन्तप्त हृदय को शान्त कर रहा है।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“कोई आन्तरिक हेतु ही दो हृदयों को परस्पर स्नेह संसिद्ध करता है। बाह्म कारणों पर प्रीतियाँ आश्रित नहीं होतीं।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“मानो ब्रह्माण्ड के परित्राण के लिए मूर्तिमान क्षात्र धर्म उपस्थित हो गया है। यह कोई शक्ति का पुंज एवं गुणों की राशि—तेजस्वी राजकुमार दिखाई देता है। यह तुम्हारा वयस्य जगत् के पुण्य-संचय का प्रत्यक्ष स्वरूप है। लव : (दिल में) इस महानुभाव के दर्शन”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“जैसे विद्या द्वारा निर्विशेष सन्मात्र कूटस्थ चेतन ब्रह्म में सब नामरूपात्मक विवर्तों का विलय हो जाता है।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“प्रिय जन तो कुछ न करता हुआ भी सुख से दुःखों को तिरोहित कर देता है। प्रेमी का स्नेहार्द्र हृदय एक अनोखा द्रव्य है, जिसके महत्व को प्रेमिका का हृदय ही जानता है।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“क्रोध के कारण दोनों के केश चंचल हो रहे हैं और समस्त शरीर काँप रहा है। आँखें रक्त कमल-पत्र के समान लाल हो रही हैं। भृकुटियों के तन जाने से दोनों के मुख लांछन सहित चन्द्रमा तथा भ्रमर-चुम्बित कमल की कान्ति को धारण कर रहे”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“ब्राह्मणों का बल तो केवल वाणी में होता है। बाहुबल तो क्षत्रियों में माना जाता है। यदि ब्राह्मण परशुराम ने शस्त्र ग्रहण कर लिया और उसे तुम्हारे महाराज ने पराजित कर दिया, तो इसमें स्तुति की क्या बात है?”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“वह राजा अत्यन्त सहृदय है। (लज्जा के साथ) यदि हम वस्तुतः उस महापुरुष के इस तरह प्रेमभाजन हैं, और यदि वे अपने गुणों द्वारा सब प्रजाजनों के इस तरह प्रिय हैं, तो मेरा महाराज की सत्ता का विरोध करना सर्वथा अनुचित है।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“शत्रु के पराभव के लिए, तुम महा वराहावतार की क्षमता धारण करो।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“लोक-व्यवहार यही है कि केवल आँख मिलने से ही अनुराग उत्पन्न हो जाता है। प्रीति वस्तुतः एक अनिर्वचनीय अनुभूति है। यह अहेतुक पक्षपात है, जिसका प्रतिकार असम्भव होता है। यह वह स्नेहात्मक तन्तु है, जो प्राणियों के हृदयों को एक सूत्र में सी देता है।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“दशरथ की धर्मपत्नी, मेरी प्रियसखी कौसल्या है। कौन विश्वास करेगा कि यह वही है। यह दशरथ के घर में ऐसी थी जैसे लक्ष्मी। उपमा-सादृश्य से क्या, यह तो साक्षात् लक्ष्मी थी। कष्ट है, आज वह दैववश से कुछ और ही हो गई है। प्राणियों का यह कैसा दुःखान्तक परिणाम होता है।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“सन्तान-स्नेह सब में समान रूप से रहने वाला है। यह मन का मोह-बन्धन है, प्राणियों की आभ्यन्तरिक चंचलता है। यह सन्तान-मोह संसार का तन्तुस्वरूप”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“ऋषियों का कथन है कि राक्षसी वाणी का प्रयोग उन्मत्त लोग करते हैं अथवा दृप्त लोग। यह राक्षसी वाणी सब वैर-भावनाओं की मूल होती है। इससे लोगों में प्रतिशोध की ज्वाला प्रदीप्त होती है। सब लोग इस वाणी की निन्दा करते हैं और दूसरी वाणी की प्रशंसा करते हैं। यह दूसरी सूनृता वाणी कामधेनु के समान सब कामनाओं को दुहती है, अलक्ष्मी को दूर करती है, कीर्ति का प्रसार करती है और दुष्ट हृदय वालों की दुष्टता का नाश करती है। यह सुनृता वाणी शुद्ध, शान्त एवं सब मंगलों की जननी होती है।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“बेचारी प्रजा पर क्या क्रोध-जिसमें ब्राह्मण, बालक, वृद्ध, रोगी तथा अबलाएँ ही अधिकता”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“अयोध्यावासियों की इतनी दुष्टता और निर्दयता! रामभद्र ने भी इतनी जल्दबाजी से लोकापवाद को स्वीकार कर लिया। मेरी पुत्री पर मेरे देखते इतना कठोर वज्रपात हुआ। यह तो समय है मेरे क्रोध के प्रज्वलित होने का। मुझे तो धनुष द्वारा अथवा शाप द्वारा उस राम को तथा उस अपवादिनी प्रजा को समाप्त कर देना चाहिए था।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“न केवल यह अपने अधखिले कमल-सदृश कोमल एवं उज्ज्वल शरीर से रामभद्र का अनुकरण कर रहा है, अपितु इसका स्वर भी उसी तरह कलहंस-मधुर है। इसके शरीर का स्पर्श रामभद्र के स्पर्श के समान हृदय को शीतल करने वाला है।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“जिन ब्रह्मर्षियों को परम ज्योति का आविर्भाव हो चुका है उनके वचनों में तुम्हें कभी संदेह नहीं होना चाहिए। इनकी वाणी में शुभलक्ष्मी निहित होती है। ये कोई भी ऐसा वचन नहीं बोलते, जो अर्थहीन हो।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“तुम्हें स्मरण नहीं जो तुम्हारे कुलगुरु ने ऋृष्यशृंग मुनि के आश्रम में कहा था; “भावी हो कर रहेगी, परन्तु अन्त में सब कल्याण ही होगा।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“अग्नि’ ये अक्षर ही ‘सीता’ अक्षरों के सम्मुख सर्वथा हीन हैं। सीता की पवित्रता के सम्मुख अग्नि की क्या स्थिति?”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“श्रीराम का भी अति दुर्भाग्य है जो नगरवासियों ने भीषण किंवदन्तियों को फैलाना शुरू कर दिया। उन्होंने दूर स्थित लंका में की गई अग्नि-शुद्धि पर भी विश्वास न किया। अतएव रामभद्र को वह दारुण कार्य करना पड़ा। जनक : (रोष के साथ) आः—, यह अग्नि कौन है मेरी सन्तति को शुद्ध करने वाली? अग्नि-शुद्धि पर अविश्वास करने वाले नगरवासियों के इस अपमानजनक व्यवहार से हमारा हृदय और भी छलनी-छलनी हो रहा है।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“तुम्हारी अनश्वर ज्योति सदा प्रकाशमान रहे। यह सूर्य भगवान्, जो तमस् से परे ज्योतिर्मय है, वह तुम्हें पवित्र करे।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
“सन्तान स्नेह की पराकाष्ठा है। यह माता-पिता को परस्पर संश्लिष्ट करने वाली अविच्छेद्य ग्रन्थि है। अपत्य वह आनन्द-ग्रन्थि है, जो दम्पति के अन्तःकरण-तत्त्वों को स्नेह-बन्धनों में बाँध देती”
― Uttaramcharit
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“लोकोत्तर पुरुषों के चरित्र अद्भुत होते हैं। उनके चित्तों को कौन जान सकता है, जो कभी तो वज्र के समान कठोर होते हैं और कभी फूल से भी कोमल हो जाते हैं।”
― Uttaramcharit
― Uttaramcharit
