स्वप्नवासवदत्ता [Swapnvastavdutta] Quotes
स्वप्नवासवदत्ता [Swapnvastavdutta]
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भास [Bhaas]16 ratings, 4.19 average rating, 2 reviews
स्वप्नवासवदत्ता [Swapnvastavdutta] Quotes
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“समर में जीते रत्नों का अभीष्ट संभोग प्रीतिकर होता है”
― Swapnvastavdutta
― Swapnvastavdutta
“अत्यन्त गुणवान् वर के लोभ और वासवदत्ता के प्रति अत्यन्त स्नेह के कारण कुछ निश्चय नहीं कर पा रहा हूँ । पहले तो मन में प्रशंसनीय कुल की कामना करता हूँ फिर चाहता हूँ कि उसमें रूप और कान्ति हो, क्योंकि स्त्रियाँ केवल गुण से तृप्त नहीं होतीं । फिर मुझे उसका वीर्यवान् होना भी अपेक्षित है, क्योंकि प्रतापवान् न होने से युवतियों की रक्षा नहीं हो सकती”
― Swapnvastavdutta
― Swapnvastavdutta
“दिन और रात समान होते हुए भी बन्धन में पड़े हुओं को तो रात ही विशेष भयानक होती है ।”
― Swapnvastavdutta
― Swapnvastavdutta
“न देने से लज्जा करती हैं, देने की बात से मन व्यथित हो उठता है । इस प्रकार धर्म और स्नेहवश देने न देने के बीच में पड़कर माताएँ दुःखार्त हो जाती हैं ।”
― Swapnvastavdutta
― Swapnvastavdutta
“अरे, मथे जाने से काठ से आग उपज जाती है, खोदे जाने से भूमि जल प्रदान करती है । उत्साहशील जनों के लिए कुछ भी असाध्य नहीं । मार्गारूढ़ हो गये लोगों के सभी प्रयत्न सफल हो जाते हैं ।”
― Swapnvastavdutta
― Swapnvastavdutta
“संकट उपस्थित होने पर भी जो शोक नहीं करता, विषम स्थिति उत्पन्न होने पर भी निराश नहीं होता, ठगे जाकर भी विषाद नहीं करता, चोट खाकर भी जो प्राण नहीं छोड़ता, निःसन्देह बुद्धिमान वही है”
― Swapnvastavdutta
― Swapnvastavdutta
“उद्योग के आरम्भ में ही सिद्धि मिल जाने से आदमी रमणीय कार्य-सम्पादन करने लगता है”
― Swapnvastavdutta
― Swapnvastavdutta
“भाग्य से शरीर-मात्र अपमानित हुआ, तेज नहीं”
― Swapnvastavdutta
― Swapnvastavdutta
“पौ फटने से तनिक पहले ही, सवारी की सुखकर वेला में, बालुका तीर्थ (घाट) में नर्मदा पारकर, सेना को वहीं रोक, छत्र-मात्र राजचिह से युक्त, गजदल को विमर्दित करनेवाली थोड़ी सेना लेकर मृगपंक्तिवाली पगडंडी से स्वामी नागवन चले गये ।”
― Swapnvastavdutta
― Swapnvastavdutta
“जो कायर और शक्तिहीन हैं वे किसी प्रकार का उत्साह कार्य नहीं कर सकते; और राज्यश्री प्राय: उत्साह से ही भोगी जाती है ।”
― Swapnvastavdutta
― Swapnvastavdutta
“सुन्दरता सबको समान रूप से अभिराम लगती है ।”
― Swapnvastavdutta
― Swapnvastavdutta
“इसका रूप इसके आभिजात्य के अनुकूल ही है ।”
― Swapnvastavdutta
― Swapnvastavdutta
