Apni Khabar Quotes

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Apni Khabar Apni Khabar by Pandey Bechan Sharma 'Ugra'
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Apni Khabar Quotes Showing 1-27 of 27
“शिवप्रसाद गुप्त को? ऐसे नेक–दिल आदमी को जिसकी तुलना देवता से भी करने को मैं तैयार नहीं? तो यह सारे–का–सारा उत्तम अभियान, विधिविहित दान, सबकी पूजा, सबका सम्मान, सबके लिए अपार मोहमय प्यार सदाचार नहीं, अपराध था? क्योंकि शिवप्रसादजी को विकराल, भयानक दण्ड मिला–जिसे छ: महीने की फाँसी कहते हैं । जिस ‘सेवा उपवन’ में उन्होंने सारे संसार की सेवा की थी उसी में बहुत दिनों तक वह पक्षाघात से परम पीड़ित पहियादार गाड़ी पर झुँझलाते, खुनसाते घुमाए जाते थे । वह अक्सर बनारसी बोली में व्यथा–विह्वल दोहाइयाँ दिया करते थे–“रमवाँ, रे रमवाँ ! कौन गुनहवाँ करली रे रमवाँ !” तो? तो क्या बाबू शिवप्रसाद गुप्त को भी स्वर्ग के फाटक से नहीं गुज़रने दिया गया? बाइबिल में लिखा है : सुई के सूराख़ से ऊँट निकल जाए–भले, परन्तु धनवान स्वर्ग के फाटक से त्रिकाल में भी नहीं गुज़र सकता ।”
Pandey Bechan Sharma 'Ugra', Apni Khabar
“अगर मुझे मज़े में विदित न होता कि दोष देवताओं में भी होता है, तो दिवंगत बाबू साहब को मैं आदमी न कह देवता ही कहता । लेकिन जहाँ तक मुझे मालूम है देवताओं को दिल नहीं होता और आदमी यदि भरत बन जाए या बुद्ध, ईसा या श्री रामकृष्ण परमहंस या गांधी तो वह सर–से–पाँव तक दिल–ही–दिल दिव्य दिखलाई देता है”
Pandey Bechan Sharma 'Ugra', Apni Khabar
“मुझमें जो नहीं था उसके लिए तिरस्कार सान्याल महाशय के दर्शन में नहीं था । सान्याल बाबू दुखों के दाह से सुवर्ण की तरह दप्–दप् दहकते दार्शनिक थे । कसौटी की तरह श्याम । बड़ी–बड़ी, डोरीली, करुण, आँखें !”
Pandey Bechan Sharma 'Ugra', Apni Khabar
“बच्चा गुरु की परोपकार–तत्परता दलाली कमाने–मात्र की थी और वह दो उलझनों के निकट पार्टियों को पूर्णत: उलझाकर अपना उल्लू सीधा किया करते थे”
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“ललकारते थे–अगड़ बम ! कमाए दुनिया खाएँ हम ! भोले अगड़ धत्ता ! चिलम पर चढ़ाकर फूँक दिया कलकत्ता! मैं समझता हूँ साठ वर्ष की उम्र में बच्चा गुरु ने जुआ कम कर दिया था ।”
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“वह बहुत आकर्षक वक्ता, सुरीले, परम रंगीन मिज़ाज, परम धूर्तराट, सर्वभक्षी, सर्वपायी और भगवान् झूठ न कहलाए–सर्व–भोगी थे”
Pandey Bechan Sharma 'Ugra', Apni Khabar
“पचासों पुस्तकें उन्होंने स्वान्त:सुखाय, चिद्विलास के लिए लिखीं”
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“चिलकती दुपहरी या चमकती चाँदनी में पीपल के पेड़ के निकट खड़े–खड़े पेशाब करते हुए भानुप्रताप तिवारी पूरे प्रेत मालूम पड़ते थे–हड्डीले, रक्तरहित, उजले–धँसी आँखें, चेहरे पर सारी सृष्टि के लिए श्मशानी–शाप । मैले चारख़ाने का रुईदार पायजामा और उसी रंग का लम्बा दगला रुईदार । बहुत लड़कपन में मैं तो तिवारीजी के सामने तक जाने से डरता था और यदि उस”
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“चिलकती दुपहरी या चमकती चाँदनी में पीपल के”
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“उत्तर प्रदेश–बिहार की सीमा पर स्थित चैनपुर में है । इन्हीं हरसू ब्रह्म को स्वर्गीय परम विद्वान डॉ. रामदास गौड़ आदर से मानते थे”
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“सामनेवाले घर का एक खण्ड पहले गिराया जाए, फिर आप राजा, फिर मैं रानी… ।” “स्त्री…!” रानी के बिगड़े दिल पर राजा के मुख से ‘स्त्री’ शब्द, हीन–भाव से निकलते ही साँप–सा लोट गया । वह फूल–सेज से सर्पिणी–सी सरककर कक्ष के बाहर जाने लगी–“आप मेरे प्राण ले सकते हैं–राजा हैं, मैं अबला हूँ, पर मुझे अपने मन के खिलाफ़ आचरण करने पर विवश नहीं कर सकते”
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“सुदर्शनजी जब घर लौट रहे थे तो राह के जंगल में एकाएक किसी ने तेज़ चाँटा उनके गाल पर जड़ा । “मूर्ख कहीं के ! देख तो मेरी चूँदरी चिन्दी–चिन्दी हो गई कटीली झाड़ियों में ख़रगोश का बच्चा ढूँढ़ते–ढूँढ़ते ।” चकित सुदर्शन ने देखा, सामने चिथी चूँदरी पहने खड़ी कुमारी के रूप में स्वयं जगज्जननी वात्सल्यमयी सर्वकल्याणी सर्वमंगला को !”
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“परम भागवत–तत्त्व व्यक्ति में तभी तक रहता है जब तक मूँछ–दाढ़ी नहीं रहती ।मर्यादा–पुरुषोत्तम होने पर भी राम या भगवान्स्वयं कृष्ण की मूँछें और दाढ़ी किसी ने देखी हैं?”
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“मैं बरसों से उम्र क्यों गिनूँ? जीवन की गति से क्यों न जाँचूँ?”
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“मुहब्बत सांसारिक हानि–लाभ के तराजू पर तौली जाने योग्य जिंस कदापि नहीं । इसका तो जीवन के सुदुर्लभ सुधा–मधुर स्वाद से सम्बन्ध है । कहा उस्ताद ने : इश्क से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया, दर्द की दवा पाई, दर्द बेदवा पाया”
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“साधुओं के लिए दूध, दही, मक्खन, मट्ठा, लस्सी, गुड़, बताशे, लड्डू, अन्न, वस्त्र, पुष्कल दे जाती थीं”
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“ज्ञान सीमित होता है जब कि अज्ञान की (ईश्वर की तरह) कोई सीमा नहीं । समझिए तो, जीवन में जितना भी सुख है अज्ञान ही के सबब होता है । देखिए तो, जगत् में ज़्यादातर जीवधारी अज्ञानी ही होते हैं”
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“उन दिनों तो घनघोर अभावों में भी मैं दुखी था, ऐसी बात नहीं । बल्कि सुखी ही था । बचपन और यौवन शायद स्वयं में इतने भरपूर होते हैं कि उस आलम में अभाव भी भावों–भरे भासते हैं । असल में अज्ञान में बड़ी गुंजायश होती है । मेरा ज्ञान मेरे गले पड़ा–लिखा कवि ‘देव’ ने–“याहि ते मैं हरि ज्ञान गँवायो ।”
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“असल में अयोध्या आदमी के बनाए बनी हुई थी, भले वे आदमी राम–जैसे शक्तिमान क्यों न रहे हों । वैसे आदमी नहीं रहे तो अयोध्या राँड हो गई । चुनार में आदमी रहें या न रहें, उसे प्रकृत्ति–दत्त शोभा सुलभ”
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“विन्ध्याचल की सुखद घाटियों में पारिजात के, पलाश के, बहेड़े के, महुवे के वन–के–वन । जब शरद ऋतु में सारी घाटी पारिजात–पुष्पों की सुखद सुगंध से भर जाती है,”
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“बालम ! आओ, हमारे गेह रे !
तुम बिनु दुखिया देह रे !
सब कोई कहै तुम्हारी नारी !
मोहि होत सन्देह रे !
एकमेक ह्वै सेज न सोहे
तब लगि कैसा नेह रे?”
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“गंगा–तरंग कल–सीकर–शीतलानि के निकट एक गुहा है । कहते हैं राजर्षि भर्तृहरि उसी में तप–स्वाध्याय–निरत रहते थे”
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“सुरसरि, तीर बिनु नीर दुख पाइहै, सुर–तरु तरे तोहि दारिद सताइहै”
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“उन दिनों तो घनघोर अभावों में भी मैं दुखी था, ऐसी बात नहीं । बल्कि सुखी ही था । बचपन और यौवन शायद स्वयं में इतने भरपूर होते हैं कि उस आलम में अभाव भी भावों–भरे भासते हैं”
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“जब तक अनगढ़ हूँ तभी तक विश्वविराट् की मूर्तियों की सम्भावनाएँ मुझमें सुरक्षित हैं”
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“महाराज,” उन्होंने हुक्के की कश का धुआँ लम्बी मूँछों से छोड़ते हुए कहा, “आप गाली ऐसे को दिया करें जो आपको उसका उत्तर दे”
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“मेरी आपकी यह शर्त नहीं थी कि मैं आपकी खूराक आधी कर दूँ । शर्त है कि जो आप खाएँ वही मैं भी खाऊँ । आप रोज़ आधा पाव अंगूर खाते हैं, तो आधा ही पाव मेरे लिए भी”
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