देवांगना Quotes

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देवांगना देवांगना by Acharya Chatursen
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देवांगना Quotes Showing 1-11 of 11
“हिन्दू धर्म जीव-हत्या का धर्म है। यज्ञ और धर्म के नाम पर बेचारे निरीह पशुओं का वध किया जाता है। यज्ञ के पवित्र कृत्यों के नाम पर मद्यपान किया जाता है। इस हिन्दू धर्म में स्त्रियों और मर्दों पर भी, उच्च जाति वालों ने पूरे अंकुश रख उन्हें पराधीन बनाया है। अछूतों के प्रति तथा छोटी जाति के प्रति तो अन्यायाचरण का अन्त ही नहीं है। वे देवदासियाँ जो धर्म बन्धन में बँधी हैं, पाप का जीवन व्यतीत करती हैं।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], देवांगना
“मेरे लिए संसार मिट्टी का ढेला है और उसके लिए अन्धेरा कुआँ।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], देवांगना
“वहाँ भी तुर्कों की तलवार पहुँची, तब नेपाल जाकर वे शरणापन्न हुए। पीछे वे तिब्बत चले गए। शाक्य श्रीभद्र की भाँति न जाने कितने बौद्ध सिद्ध विदेशों को भाग गए। भारत में तो रंगे कपड़े पहनना मौत का वारंट था।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], देवांगना
“वज्रयान का एक अधिक विकृत रूप सहजयान सम्प्रदाय था। इसका धर्मरूप महा सुखद था। इसके प्रवर्तक ‘सरहपा’ थे। इन्होंने गृहस्थ समाज की स्थापना की थी, जिसमें गुप्त रीति पर मुक्त यौन सम्बन्ध पोषक चक्र, सम्बर आदि देवता, उनके मन्त्र और पूजा-अनुष्ठान की प्रतिष्ठा हुई। शक्तियों सहित देवताओं की ‘युगनद्ध’ मूर्तियाँ अश्लील मुद्राओं में पूजी जाने लगीं।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], देवांगना
“वज्रयान का एक अधिक विकृत रूप सहजयान सम्प्रदाय”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], देवांगना
“बौद्धभिक्षु अब तांत्रिक सिद्ध कहलाते थे और वामाचारी होते थे। ऐसे ‘चौरासी सिद्ध‘ प्रसिद्ध हैं, जिनकी अलौकिक शक्तियों और सिद्धियों पर सर्वसाधारण का विश्वास था।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], देवांगना
“ब्रह्मचर्य और भिक्षु जीवन, जो बौद्धधर्म की सबसे बड़ी सम्पदा थी, अब केवल एक”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], देवांगना
“इस नये हिन्दू धर्म में प्रथम पुरोहित, उसके बाद ये सामन्त राजा रहे। राजनीति में प्रथम राजा और उसके बाद ब्राह्मण रहे।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], देवांगना
“क्षत्रियों के लिए अपना प्राचीन दार्शनिक धर्म छोड़ नया मोटा धर्म निर्माण कर लिया, जिसे समझने और उस पर आचरण करने में उन विदेशियों को कोई दिक्कत नहीं हुई।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], देवांगना
“ब्राह्मणों ने प्रथम तो म्लेक्ष कहकर तिरस्कार किया परन्तु पीछे जब इन म्लेक्षों में कनिष्क और मिनिन्दर जैसे श्रद्धालुओं को उन्होंने देखा, जिन्होंने मठ और मन्दिरों में सोने के ढेर लगा दिए थे, तो उन्होंने भी इन आगन्तुकों का स्वागत करना आरम्भ कर दिया। बौद्धों ने उन्हें जहाँ समानता का अधिकार दिया था, वहाँ उन्हें ब्राह्मणों ने अत्यन्त ऊँचा केवल अपने से एक दर्जे नीचा क्षत्रिय का स्थान दिया। उन्हें क्षत्रिय बना दिया”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], देवांगना
“दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी का अन्त होते-होते उत्तर भारत में पालों, गहरवारों, चालुक्यों, चन्देलों और चौहानों के अतिरिक्त सोलंकी और परमारों के राज्य स्थापित हो गए थे।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], देवांगना