Ek Raat Aur Samaapti Quotes
Ek Raat Aur Samaapti: Do Kahaniyan
by
Rabindranath Tagore90 ratings, 4.26 average rating, 3 reviews
Ek Raat Aur Samaapti Quotes
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“अब एक प्रार्थना और है तुमसे। मैंने कितने ही मौकों पर तुम्हें मदद पहुंचाई है, क्या आज परदेस जाते समय तुम मुझे उसका कुछ इनाम दोगी?’ मृण्मयी ने आश्चर्य के साथ पूछा, ‘क्या?’ अपूर्व ने कहा, ‘तुम मुझे अपनी तबीयत से, प्यार से, मुझे एक प्यार दो।’ अपूर्व की इस अजीब प्रार्थना और गम्भीर चेहरे को देखकर मृण्मयी हंसने लग गई और फिर बड़ी मुश्किल से उस हंसी को रोककर चुम्बन देने को आगे बढ़ी। अपूर्व के मुंह के पास मुंह ले जाकर उससे न रहा गया और खिलखिलाकर हंस पड़ी। इस तरह दो बार किया और अन्त में स्थिर होकर आंचल से मुंह ढककर हंसने लगी। अपूर्व से और कुछ न बन पड़ा तो उसने डांटने के बहाने उसके बाएं कान की लोलकी (कान के नीचे का कोमल भाग) पकड़कर हिला दी। अपूर्व ने अपने मन में एक कड़ी प्रतिज्ञा कर रखी थी और वह यह कि डाका डालकर या लूट-खसोटकर वह कुछ नहीं लेना चाहेगा। इसमें वह अपना अपमान समझता है। वह चाहता है कि देवता के समान सगौरव रहकर स्वेच्छा से भेंट किये हुए उपहार को ग्रहण करे, अपने हाथ से उठाकर कुछ भी न ले। मृण्मयी फिर नहीं हंसी।”
― Ek Raat Aur Samaapti: Do Kahaniyan
― Ek Raat Aur Samaapti: Do Kahaniyan
“उस छोटे से झोंपड़े में जगह की कमी थी, आदमी की कमी थी, अन्न की कमी थी; किन्तु छोटे से छेद से जिस तरह फुहारा चौगुने वेग से छूटता है उसी तरह गरीबी के बारीक सूराख से आनन्द की धारा पूरी तेज़ी से बहने लगी।”
― Ek Raat Aur Samaapti: Do Kahaniyan
― Ek Raat Aur Samaapti: Do Kahaniyan
