Mansarovar - Part 7 Quotes
Mansarovar - Part 7
by
Munshi Premchand124 ratings, 4.41 average rating, 0 reviews
Mansarovar - Part 7 Quotes
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“सच पूछो तो तुम्हारी सुहाग की साड़ी ने हमें सुहागिन बना दिया, नहीं तो हम सुहागिन होते हुए भी विधवाएँ थीं। सच कहती हूँ, सैकड़ों जवानों से नित्य यही दुआ निकलती है कि आपका सुहाग अमर हो, जिसने हमारी राँड़ जाति को सुहाग दान दिया।”
― Mansarovar - Part 7
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“हा! केवल अपने सिद्धांत की रक्षा के लिए, अपनी आत्मा के सम्मान के लिए, मैं इस देवी के भावों का वध कर रहा हूँ! यह अत्याचार है।”
― Mansarovar - Part 7
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“अमंगल के भय से तुम्हारी आत्मा का हनन नहीं करना चाहती।”
― Mansarovar - Part 7
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“वर्षा ऋतु का जन्म हुआ। वर्षा की झड़ी लगी। वह लहराए, नदियों ने पुन:पुन: अपने सुरीले राग छेड़े। पर्वतों के कलेजे ठंडे हुए। मैदान में हरियाली छाई। सारस की ध्वनि पर्वतों में गूँजने लगी। आषाढ़ मास में बाल्यावस्था का अल्हड़पन था। श्रावण में युवावस्था के पग बड़े, फुहारें पड़ने लगी। भादों कमाई के दिन थे, जिसमें झीलों के कोष भर दिए। पर्वतों को धनाढ्य कर दिया। अंत में बुढ़ापा आया। कास के उज्जवल बाल लहराने लगे। जाड़ा आ गया।”
― Mansarovar - Part 7
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“वसंत आया। सेलम की लालिमा एवं कचनार की ऊदी पुष्पमाला अपनी यौवन-छटा दिखलाने लगी। मकोय के फल महके। गरमी का प्रारंभ हुआ, प्रात:काल समीर के झोंके, दोपहर की लू, जलती हुई लपट। डालियाँ फूलों से लदीं। फिर वह समय आया कि जब न दिन को सुख था और न रात को नींद। दिन तड़पता था, रात जलती थी। नदियाँ बधिकों के हृदयों की भाँति सूख गई।”
― Mansarovar - Part 7
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“चिड़िया पंख-हीन होने पर भी सुनहरे पिंजड़े में न रह सकी। 9 प्रकाश की धुँधली-सी झलक में कितनी आशा, कितना बल, कितना आश्वासन है, यह उस मनुष्य से पूछो जिसे अँधेरे ने एक घने वन में घेर लिया है। प्रकाश की वह प्रभा उसके लड़खड़ाते हुए पैरों को शीघ्रगामी बना देती है; उसके शिथिल शरीर में जान डाल देती है। जहाँ एक-एक पग रखना दुस्तर था, वहाँ इस जीवन-प्रकाश को देखते हुए यह मीलों और कोसों तक प्रेम की उमंगों से उछलता हुआ चला जाता है।”
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“वायु में उड़नेवाली चिड़िया दाने पर गिरी।”
― Mansarovar - Part 7
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“घने, सुनसान, भयानक वन में भटका हुआ मनुष्य जिधर पगडंडियों का चिह्न पाता है, उसी मार्ग को पकड़ लेता है। वह सोच-विचार नहीं करता कि मार्ग मुझे कहाँ ले जाएगा।”
― Mansarovar - Part 7
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“उज्जवल वस्त्र पर रंग भली-भाँति चढ़ता है।”
― Mansarovar - Part 7
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“आकाश की लालिमा नीलावरण हो गई। तारों के कँवल खिले। वायु के लिए पुष्प-शय्या बिछ गई। ओस के लिए हरी मखमल का फर्श बिछ गया,”
― Mansarovar - Part 7
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“मैं अब भी हिंदू हूँ। मैंने इस्लाम नहीं कबूल किया है।’ ‘जानती हूँ!’ ‘यह जानकर भी तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती! ’ श्यामा ने कठोर नेत्रों से देखा और उत्तेजित होकर बोली — तुम्हें अपने मुँह से ऐसी बातें निकालते शर्म नहीं आती। मैं उस धर्मवीर की ब्याहता हूँ जिसने हिंदू-जाति का मुख उज्जवल किया है। तुम समझते हो कि वह मर गया! यह तुम्हारा भ्रम है। वह अमर है। मैं इस समय भी उसे स्वर्ग में बैठा देख रही हूँ। तुमने हिंदू-जाति को कलंकित किया है। मेरे सामने से दूर हो जाओ।”
― Mansarovar - Part 7
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“खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो, दुनिया से कुफ्र का निशान मिटा दो। एक काफिर के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशनी कर देने का सब सारी उम्र के रोजे, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है। जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएँ लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा। और सारी जनता यह आवाज सुन कर मजहब के नारों से मतवाली हो जाती है। उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है।”
― Mansarovar - Part 7
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“जिस तरह पत्थर और पानी में आग छिपी रहती है, उसी तरह मनुष्य के हृदय में भी, चाहे वह कैसा ही क्रूर और कठोर क्यों न हो हो, उत्कृष्ट और कोमल भाव छिपे रहते हैं। गुमान की आँखें भर आईं। आँसू की बूँदें बहुधा हमारे हृदय की मलिनता को उज्जवल कर देती है।”
― Mansarovar - Part 7
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“मानव हृदय के रहस्य कभी समझ नहीं आते। कहाँ तो बच्चे को प्यार से चिपटाती थी, ऐसी झल्लाई कि उसे दो-तीन थप्पड़ जोर से लगाए और घुड़ककर बोली — चुप रह अभागे! तेरा ही मुँह मिठाई खाने का है? अपने दिन को नहीं रोता, मिठाई खाने चला है। बाँका गुमान अपनी कोठरी के द्वार पर बैठा यह कौतुक बड़े ध्यान से देख रहा था। वह इस बच्चे को बहुत चाहता था। इस वक्त के थप्पड़ उसके हृदय में तेज भाले के समान लगे और चुभ गए। शायद उनका अभिप्राय भी यही था।”
― Mansarovar - Part 7
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“व्यंगय, वक्तोक्ति अन्योक्ति और उपमा आदि अलंकारों में बातें हुईं।”
― Mansarovar - Part 7
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“मन का मैल धोने के लिए नयन-जल से उपयुक्त और कोई वस्तु नहीं है।”
― Mansarovar - Part 7
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“सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता’ और उन आदमियों की ओर चिलम पीने चला गया; किन्तु जिस प्रकार बंदूक की आवाज सुनते ही हिरन भाग जाते हैं उसी प्रकार उसे आते देख सब-के-सब उठ कर भागे। कोई इधर गया, कोई उधर। महादेव चिल्लाने लगा—‘ठहरो-ठहरो! ’ एकाएक उसे ध्यान आ गया, ये सब चोर हैं। वह जारे से चिल्ला उठा— ‘चोर-चोर, पकड़ो-पकड़ो!’ चोरों ने पीछे फिर कर न देखा। महादेव दीपक के पास गया, तो उसे एक मलसा रखा हुआ मिला जो मोर्चे से काला हो रहा था। महादेव का हृदय उछलने लगा। उसने कलसे मे हाथ डाला, तो मोहरें थीं। उसने एक मोहरे बाहर निकाली और दीपक के उजाले में देखा। हाँ मोहर थी। उसने तुरंत कलसा उठा लिया, और दीपक बुझा दिया और पेड़ के नीचे छिप कर बैठ रहा। साह से चोर बन गया।”
― Mansarovar - Part 7
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“आकुल हृदय को जल-तरंगों से प्रेम होता है। शायद इसलिए कि लहरें व्याकुल हैं।”
― Mansarovar - Part 7
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“स्वराज्य चित्त की वृत्तिमात्र है। ज्योंही पराधीनता का आतंक दिल से निकल गया, आपको स्वराज्य मिल गया। भय ही पराधीनता है निर्भयता ही स्वराज्य है। व्यवस्था और संगठन तो गौण है।”
― Mansarovar - Part 7
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“भगवान् का भरोसा मत छोड़ना और वह करना जो मरदों को करना चाहिए। भय सारी बुराइयों की जड़ है। इसे मन से निकाल डालो, फिर तुम्हारा कोई कुछ नहीं कर सकता। सत्य की कभी हार नहीं होती।”
― Mansarovar - Part 7
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“मर्द होते तो गुलाम ही क्यों होते!”
― Mansarovar - Part 7
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“जो लोग दूसरों को गुनाह से बचाने के लिए अपनी जान देने को खड़े हैं, उन पर वही हाथ उठायेगा, जो पाजी है, कमीना है, नामर्द है। मैकू फिसादी है, लठैत, गुंडा है, पर कमीना और नामर्द नहीं हैं। कह दो पुलिसवालों से, चाहें तो मुझे गिरफ्तार कर लें।”
― Mansarovar - Part 7
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“जेल सम्मान और भक्ति की एक रेखा है, जिसके भीतर शैतान कदम नहीं रख सकता। मैदान में जलता हुआ अलाव वायु मे अपनी उष्णता को खो देता है; लेकिन इंजिन में बन्द होकर वही आग संचालक शक्ति का अखंड भंडार बन जाती है।”
― Mansarovar - Part 7
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“लोग कहते हैं, जुलूस निकालने से क्या होता है? इससे यह सिद्ध होता है कि हमजीवित हैं, अटल हैं और मैदान से हटे नहीं है। हमें अपने हार न मानने वाले आत्मभिमान का प्रमाण देना था। हमें यह दिखाना था कि, हम गोलियों और अत्याचार से भयभीत होकर अपने लक्ष्य से हटने वाले नहीं और हम उस व्यवस्था का अन्त करके रहेंगे,”
― Mansarovar - Part 7
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