अतीत के चलचित्र Quotes

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अतीत के चलचित्र अतीत के चलचित्र by Mahadevi Verma
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अतीत के चलचित्र Quotes Showing 1-30 of 43
“स्त्री जब किसी साधना को अपना स्वभाव और किसी सत्य को अपनी आत्मा बना लेती है तब पुरुष उसके लिए न महत्त्व का विषय रह जाता है, न भय का कारण, इस सत्य को मान लेना पुरुष के लिए कभी सम्भव नहीं हो सका। अपनी पराजय को बलात् जय का नाम देने के लिए सम्भवतः वह अनेक विषम परिस्थितियों और संकीर्ण सामाजिक धार्मिक बन्धनों में उसे बाँधने का प्रयास करता रहता है। साधारण रूप से वैभव के साधन नहीं, मुट्ठी भर अन्न भी स्त्री के सम्पूर्ण जीवन से भारी ठहरता है। फिर भी स्त्री को हारा हुआ मेरा मन कैसे स्वीकार करे, जब तक उसके परिस्थितियों से चूर-चूर हृदय में भी आलोक की लौ जल रही है।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“वास्तविक पवित्रता का प्रमाण तो यही है कि मलिन-से-मलिन दृष्टि भी उसका स्पर्श कर पवित्र हो जावे, इस सत्य को समझना सहज ही नहीं”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“हृदय से इतनी स्वच्छ लछमा को बाहर से मलिन ही रहना पड़ता”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“अपटु परिश्रम और साधनहीनता”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“मेरे-अपने बीच का अन्तर वह अपनी सहज समता से भर लेती है,”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“अपने दु:ख में न इतनी अस्थिर है, न हल्की कि उसे मेरे सहारे की आवश्यकता जान पड़े।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“कँटीली डालियों से छिदे हाथों और पैने पत्थरों से क्षतविक्षत पैरों वाली मलिन; पर हास से उज्ज्वल”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“आनन्द के प्रकाशन के लिए मेरे निकट कला ही नहीं, पशु-पक्षी, पेड़- पौधे भी महत्त्व रखते हैं, क्योंकि उन पर भी अपनी प्रसन्नता व्यक्ता करके मुझे पूर्ण सन्तोष हो जाता है।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“आशा के दुराशा सिद्ध होने पर भी लछमा की उजली हँसी निराशा की छाया से म्लान नहीं हुई।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“पागल लड़के की बुद्धिमती और परिश्रमी बहू को सास-ससुर चाह सकते हैं; पर देवर- जेठों के लिए तो वह एक समस्या ही हो सकती है,”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“स्त्री में माँ का रूप ही सत्य, वात्सल्य ही शिव और ममता ही सुन्दर है । जब वह इन विशेषताओं के साथ पुरुष के जीवन में प्रतिष्ठित होती है, तब उसका रिक्त स्थान भर लेना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो जाता है । अन्त”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“वह जीवन-रस से जितनी निचुड़ी हुई थी, दु:ख में उतनी ही भीगकर भारी हो उठी, इसी कारण उसमें न वह शून्यता थी, जो दृष्टि को रोक नहीं पाती और न वह हल्कापन, जो हृदय को स्पर्श करने की शक्ति नहीं रखता ।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“दु:ख एक प्रकार श्रृंगार भी बन जाता है, इसी कारण दुःखी व्यक्तियों के मुख, देखने वाले की दृष्टि को बाँधे बिना नहीं रहते।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“निर्जीव मिट्टी की सजीव विषमता ही उसका ध्यान आकर्षित कर सकी और न सजीव रक्त-मांस की निर्जीव कुरूरता ही उसकी समाधि-भंग करने का सामर्थ्य पा सकी।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“नियति के व्यंग से जीवन और संसार के छल से मृत्यु पाने वाला अलोपी क्या मेरी ममता के लिए प्रेत होकर मँडराता रहेगा?”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“सन्देश मिला कि अलोपी मुझे देखने की आज्ञा चाहता है। उतने कष्ट के समय भी मुझे हँसी आये बिना न रह सकी । अन्धा अलोपी असंख्य बार आज्ञा पाकर भी मुझे देखने में समर्थ कैसे हो सकता था। पर अलोपी भीतर आया और नमस्कार कर टटोलता-टटोलता देहली के पास बैठ गया”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“अलोपी के नेत्र नहीं थे, इसी से सम्भवतः वह न प्रकृति के रौद्र रूप से भयभीत होता था और न उसके सौन्दर्य से बहकता था”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“हमारा जटिल-से-जटिलतम होता हुआ अन्तर्जगत् और कृत्रिम बनता हुआ जीवन ऐसी स्थिति उत्पन्न किये बिना नहीं रहता, जिसमें बाहर के बगुलेपन को भीतर की सड़ी-गली मछलियों से सफेदी मिलने लगती है । इसी से हमारी तारतम्यहीन कथा अधिकाधिक अकथनीय बनती जाती है और सुख-दु:ख की सरल मार्मिकता निर्जीव होने लगती है।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“भिखारी की आवश्यकता से अधिक मुझे अपनी शिष्टता की परीक्षा का ध्यान था।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“हमारी शिष्टता की परीक्षा तब नहीं हो सकती, जब कोई वडा अतिथि हमें अपनी कृपा का दान देने घर में आता है, वरन् उस समय होती है, जब कोई भूला-भटका भिखारी द्वार पर खड़ा होकर हमारी दया के कण के लिए हाथ फैला देता है ।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“समाज के पास वह जादू की छड़ी है, जिससे छूकर वह जिस स्त्री को सती कह देती है, केवल वही सती का सौभाग्य प्राप्त कर सकती है ।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“जिनकी भूख जूठी पत्तल से बुझ सकती है, उनके लिए परोसा लगाने वाले पागल होते हैं।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“तब मैंने जाना कि जीवन का खरा सोना छिपाने के लिए उस मलिन शरीर को बनाने वाला ईश्वर उस बूढ़े आदमी से भिन्न नहीं, जो अपनी सोने की मोहर को कच्ची मिट्टी की दीवार में रखकर निश्चिन्त हो जाता है।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“समय के सम्बन्ध में क्या कहा जाय, जिसका कभी एक क्षण वर्ष-सा बीतता है और कभी एक वर्ष क्षण हो जाता है।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“कोई अपने गिलट के कड़े-युक्त हाथ घड़े की ओट में छिपाने का प्रयत्न-सा करती रहती है और कोई चाँदी के पछेली-ककना की झनकार के साथ ही बात करती है । किसी के कान में लाख की पैसे वाली तरकी धोती से कभी-कभी झाँकभर लेती है और किसी की ढारें लम्बी जंजीर से गला और गाल एक करती रहती है। किसी के गुदना गुदे गेहुँए पैरों में चाँदी के कड़े सुडौलता की परिधि-सी लगते हैं और किसी की फैली उँगलियों और सफेद एड़ियों के साथ मिली हुई स्याही राँगे और काँसे के कड़ों को लोहे की साफ की हुई बेड़ियाँ बना देती है।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“27 वर्ष की अवस्था में मुझे 18 वर्षीय लड़की और 22 दिन के नाती का भार स्वीकार करना ही पड़ा।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“युगों से पुरुष स्त्री को उसकी शक्ति के लिए नहीं, सहनशक्ति के लिए ही दण्ड देता आ रहा है।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“स्त्रियाँ अपने शिशु को गोद में लेकर साहस से कह सके कि ‘बर्बरो, तुमने हमारा नारीत्व, पत्नीत्व सब ले लिया, पर हम अपना मातृत्व किसी प्रकार न देंगी’ तो इनकी समस्याएँ तुरन्त सुलझ जावें।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“स्त्री अपने बालक को हृदय से लगाकर जितनी निर्भर है, उतनी किसी और अवस्था में नहीं।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र
“कीचड़ से कीचड़ को धो सकना न सम्भव हुआ है न होगा; उसे धोने के लिए निर्मल जल चाहिए।”
Mahadevi Verma, अतीत के चलचित्र

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