श्रृंखला की कड़ियाँ Quotes

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श्रृंखला की कड़ियाँ श्रृंखला की कड़ियाँ by Mahadevi Verma
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श्रृंखला की कड़ियाँ Quotes Showing 1-30 of 42
“जीवन का चिह्न केवल काल्पनिक स्वर्ग में विचरण नहीं है, किन्तु संसार के कंटकाकीर्ण पथ को प्रशस्त बनाना भी है”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“ऐश्वर्य का उपभोग करने वाले भाई की कलाई पर सरतपाव से रक्षाबंधन बाँधते देख कौन विश्वास कर सकेगा कि ईर्ष्या भी मनुष्य का स्वाभाविक विकार है”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“किसी जाति की संस्कृति उसके शरीर का वस्त्र न होकर उसकी आत्मा का रस है, इसी से न हम उसे बलात्, छीन सकते हैं और न चीर-फाड़ कर फेंक सकते हैं। उस रस का स्वाद बदलने के लिए तो हमें उससे अधिक मधुर औषधि पिलानी पड़ेगी।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“धर्म जब मनुष्य की बुद्धि पर बलात् डाल दिया जाता है तब वह अपनेभार मनुष्य की कोमल भावनाओं को कुचल-कुचल कर निर्जीव और रसहीन बनाये बिना नहीं रहता । धर्म का शासन हमारे जीवन पर वैस ही प्रयासहीन होना चाहिए, जैसा हमारी इच्छा-शक्ति का आचरण पर होता है । सप्रयास धर्म जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है ।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“बाढ़ से पहले बाँध की उपयोगिता है । जल के प्रलयंकर प्रवाह में चाहे वह न बन सके, परन्तु उसका पूर्ववर्ती होकर अनेक आधात सहकर भी स्थिर रह सकता है”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“क्रान्ति युग की प्रवर्तिका है अवश्य, परन्तु उसका कार्य, प्रवाह को एक दिशा से रोककर दूसरी में ले जाने के समान है, इसी से उसे पहले लिखा हुआ मिटाना पड़ता है, सीखा हुआ भुलाना पड़ता है और बसाया हुआ उजाड़ना पड़ता है”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“हताश और जीवन के प्रति निर्मम व्यक्तियों का समाधान सम्भव नहीं। ऐसे व्यक्तियों का वेग आंधी के समान चक्षुहीन, बाढ़ के समान दिशाहीन और विद्युत् के समान लक्ष्यहीन हो जाता है । अपने सदस्यों की मन:स्थिति ऐसी क्रान्ति तक पहुँचा देना समाज की मनोविज्ञान-शून्यता ही प्रकट करता है ।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“दासत्व बहुत काल के उपरान्त एक अद्‌भुत संहारक शक्ति को जन्म देते रहे हैं, जिसकी बाढ़ रोकने में बड़े शक्तिशाली भी समर्थ नहीं हो सके।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“किसी को बिना किसी परिश्रिम के बहुत सी सुविधाएँ दे देता है और किसी को कठिन परिश्रम के उपरान्त भी जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं से रहित रखता है, तब उसे लक्ष्य-भ्रष्ट ही कहना चाहिए; क्योंकि यह स्थिति तो बर्बरता में भी सम्भव थी।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“समाज की दो आधार-शिलाएँ हैं, अर्थ का विभाजन और स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“समाज ऐसे व्यक्तियों का समूह है, जिन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थों की सार्वजनिक रक्षा के लिए, अपने विषम आचरणों में साम्य उत्पन्न करने वाले कुछ सामान्य नियमों से शासित होने का समझौता कर लिया है।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“जो स्वयं अपना आदर नहीं करना जानता वह दूसरों के सम्मुख अपने आपको आदर का पात्र प्रमाणित भी नहीं कर सकता, यह एकान्त सत्य है।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“स्वप्न जीवन की मधुरता है तथा प्रणय उसकी शक्ति; परन्तु उनको यथार्थ समझ लेना जीवन की संजीवनी जड़ी है,”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“कहानियों का आधार, कविता का अवलम्ब, उपन्यासों का आश्रय, सब कुछ विकृत पार्थिव प्रेम ही है, जीवन-पुस्तक के और सारे अध्याय मानो नष्ट हो गये हैं,”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“वातावरण में प्रत्येक बालक-बालिका को पल कर बड़ा होना पड़ता है और उनके अबोध मन में एक दूसरे को जानने के कुतूहल के साथ-साथ जानने का अनौचित्य भी समाया रहता है । गृह और समाज दोनों उन्हें इतनी दूर रखना चाहते हैं जितनी दूर रह कर वे एक दूसरे को विचित्र स्वप्नलोक की वस्तु समझने लगें।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“भारत वैराग्यमय संयम- प्रधान देश है, अतः दुर्बल पुरुष को इस आदर्श तक पहुँचने के लिए उसके और प्रमुख प्रलोभन स्त्री तथा स्वर्ण के बीच में जितनी ऊँची प्राचीर बना सकना सम्भव था, बना दी गई।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“समाज के प्रधान अंग स्त्री तथा पुरुष का सामञ्जस्यपूर्ण सम्बन्ध ही है, जिसके बिना किसी भी समाज का ढाँचा बालू की भित्ति के समान ढह जाता है”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“जीवित तथा चलते हुए व्यक्ति को मार्ग भी चाहिए, बैठने की छाँह भी चाहिए और लेटने, विश्राम करने के लिए स्थान की भी आवश्यकता होती है, परन्तु जो शव है उसे जिस अवस्था में जीवनी शक्ति छोड़ जाती है उसी में नष्ट होने तक या पुनर्जीवन पाने तक निश्चेष्ट पड़ा रहना पड़ता है,”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“ज्ञान के वास्तविक अर्थ में ज्ञानी, शिक्षा के सत्य अर्थ में शिक्षित वही व्यक्ति कहा जायेगा जिसने अपनी संकीर्ण सीमा को विस्तृत अपने संकीर्ण दृष्टिकोण को व्यापक बना लिया हो।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“सर्प के मुख में स्वातिजल के समान विद्या विष बन गई है ।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“स्नेह ही मनुष्यता के मन्दिर का एकमात्र देवता है।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“आज असती मेनका से साखी शकुन्तला की उत्पत्ति सम्भव नहीं है, जिसे भरत-जैसे राजर्षि की जननी होने का सौभाग्य मिला था; आज वारांगना वसन्तसेना का अनन्य प्रेम स्वप्न है, जिसे पाकर कोई भी पत्नी अपने स्त्रीत्व को सफल समझ सकती थी।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“उसने कहीं इस स्त्री को देवता की दासी बनाकर पवित्रता का स्वाँग भरा, कहीं मंदिर में नृत्य कराकर कला की दुहाई दी और कहीं केवल अपने मनोविनोद की वस्तु-मात्र बनाकर अपने विचार में गुण-ग्राहकता ही दिखाई।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“पुरुष को आकर्षित करना उसका ध्येय तथा पराभूत करना उसकी कामना रही। मनुष्य में जो एक पशुता का, बर्बरता का अक्षय अंश है उसने सर्वदा ऐसी ही नारी की इच्छा की । इसी से ऐसी रूप-व्यवसायिनी स्त्री की उपस्थिति सब युगों में सम्भव रही।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“पुरुष ने कुछ सौन्दर्य की प्रतिमाओं को पत्नीत्व तथा मातृत्व से निर्वासित कर दिया। वह स्वर्ग में अप्सरा बनी और पृथ्वी पर वारांगना। राजकार्य से ऊबे हुए भूपालों की सभाएँ उससे सुसज्जित हुईं, युद्ध में प्राण देने जाने वाले वीरों ने तलवारों की झनझनाहट सुनने के पहले उसके नूपुरों की रुनझुन सुनी, अति विश्राम से शिथिल लक्ष्मी के कृपा-पात्रों के प्राण उसकी स्वरलहरी के कम्पन से कम्पित हुए और कर्त्तव्य के दृढ़ बन्धन में बँधी गृहिणी उसके अक्षय व्यावसायिक स्त्रीत्व के आकर्षण से सशंकित हो उठी।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“उनके मन तथा शरीर दोनों को नित्य नवीन ही बने रहने का अभिशाप मिला है। उनके नारीत्व को दूसरों के मनोरंजन मात्र का ध्येय मिला है तथा उनके जीवन का तितली जैसे कच्चे रंगों से श्रृंगार हुआ है, जिसमें मोहकता है, परन्तु स्थायित्व नहीं। वह संसार का विकृत प्राणी मानकर दूर रखी गई, परन्तु विनोद के समय आवश्यक भी समझी गई, जैसे मनुष्य-समाज, हानि पहुँचाने वाले विचित्र पशु-पक्षियों को भी मनोरंजन के लिए कठघरों में सुरक्षित रखता है।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“पुरुष ने स्त्री के मातृ-रूप के सामने मस्तक झुकाया, उस पर हृदय की अतुल श्रद्धा चढ़ाई”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“सम्पूर्ण नारीत्व के बल पर उसने बर्बर पुरुष को चुनौती दी! उस युग का कठोर पुरुष भी कोमल नारीत्व के सम्मुख कुण्ठित हो उठा। तब से न जाने कितने युग आये और चले गये, कितने परिवर्तन पुराने होकर नये परिवर्तनों को स्थान दे, परन्तु स्त्री तथा पुरुष के सम्बन्ध में जो तब सत्य था वह अब भी सत्य है। स्त्री ने न शारीरिक बल से पुरुष को जीता, और न विद्याबुद्धि से, फिर भी जय उसी की रही, क्योंकि पुरुष ने अपने नीरस जीवन को सरस बनाने के लिए उसकी मधुरता खोजी और उसका अधिक से अधिक मूल्य दिया।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“मनुष्य की जननी का पद देकर उसके हृदय में अधिक समवेदना, आँखों में अधिक आर्द्रता तथा स्वभाव में अधिक कोमलता भर दी। मातृत्व के कारण उसके जीवन का अधिक अंश संघर्ष से भरे विश्व के एक छिपे कोने में बीतता रहा।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ
“समय की गति धनुष से छूटे हुए तीर की तरह आगे की ओर है, पीछे की ओर नहीं ।”
Mahadevi Verma, श्रृंखला की कड़ियाँ

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