हिडिम्बा [Hidimba] Quotes
हिडिम्बा [Hidimba]
by
नरेंद्र कोहली, Narendra Kohli95 ratings, 3.89 average rating, 11 reviews
हिडिम्बा [Hidimba] Quotes
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“मोह मानसिक रोग है पुत्र! आत्मा का कलुष! यदि वह मात्र साधारण भ्रम है तो प्रबोधन से ही मिट जायेगा; किन्तु यदि वह अत्यन्त सघन है, तो मोह की सघनता के अनुपात में ही पीड़ा अथवा दण्ड पा कर ही वह छूटे तो छूटे; उनकी आकांक्षापूर्ति से तुम उनका मोह नष्ट नहीं कर सकते। यदि उनकी इच्छापूर्ति होती रहेगी, तो उनका लोभ बढ़ेगा, मोह सघन होगा,”
― हिडिम्बा
― हिडिम्बा
“मुनि बोले, “अपनी वर्तमान बुद्धि को सृष्टि का अन्तिम सत्य मत मानो। उसका विकास और संस्कार करने का प्रयत्न करो। जो सत्य दूसरों द्वारा अनुभूत है, उसके अनुभव का प्रयत्न करो। अपनी बुद्धि को इन्द्रियों का दास मत बनने दो। तब तुम देखोगे कि वस्तुतः तुम्हें उतनी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं है, जितनी तुमने एकत्रित कर ली हैं। यह तुम्हारी आवश्यकता नहीं है, जो तुम्हें अर्जन और संचय के लिए प्रेरित करती है—यह तुम्हारा मोह है। यदि इस मोह को तुम पहचान पाओगे, तो उसे त्याग भी पाओगे। मोह से मुक्त होते ही तुम अनुभव करोगे कि जीवन मात्रा, धन के अर्जन के लिए नहीं है। आवश्यकता भर धन अर्जित करना सबके लिए अनिवार्य हो सकता है; किन्तु उसकी एक सीमा है। वहाँ पहुँच कर व्यक्ति यह निर्णय करता है कि अब वह अतिरिक्त धन अर्जित करने के लिए कोई भी कार्य नहीं करेगा।”
― हिडिम्बा
― हिडिम्बा
“प्रकृति के निर्माण की समकक्षता मनुष्य नहीं कर सकता। मनुष्य तो प्रकृति का अनुकरण करता है।”
― हिडिम्बा
― हिडिम्बा
“मेरी दो बातें स्मरण रखो पुत्र! और उनपर विश्वास भी करो। पहली यह कि ईश्वरीय नियमों का जब तक स्वयं अनुभव न करो, दूसरे व्यक्ति के कहने मात्र से उसका विश्वास मत करो। दूसरी यह कि, यदि तुम वस्तुतः जल में स्थित हो, तब ही तैरने के लिए हाथ-पैर मारो।”
― हिडिम्बा
― हिडिम्बा
“हमारे भीतर के गुण ही बाह्य सृष्टि में से अपने समतुल्य गुणों को आकृष्ट करते हैं। यदि हम अपने भीतर से रजोगुण तथा तमोगुण सर्वथा समाप्त कर दें, तो बाह्य सृष्टि के ये गुण हमारी ओर आकृष्ट नहीं होते, न हम पर प्रभाव डालने की बात सोचते”
― हिडिम्बा
― हिडिम्बा
“आश्रम में तुम्हें धर्म भी मिल सकता है और न्याय-बोध भी; किन्तु न्याय तो राजसभा में ही मिल पायेगा। न्याय के साथ दण्ड-विधान भी जुड़ा है। न्याय के लिए दुष्ट-दलन करना पड़ता है, धर्म के लिए आत्म-दमन! न्याय माँगा जाता है, धर्म साधा जाता है। न्याय में अधिकार है, धर्म में दायित्व। धर्म ऋषि देता है और न्याय राजा!”
― हिडिम्बा
― हिडिम्बा
“शेष जीवन को वह उन कार्यों में लगायेगा, जिन्हें अब तक वह, गृहस्थी के लिए धनार्जन की अनिवार्यता में नहीं कर पाया था। जब अर्थ अर्जित करने की अनिवार्यता नहीं रहती, तब ही कर्म में सुख की प्राप्ति होती है; और तब ही मनुष्य अपना जीवन, उस पद्धति से व्यतीत कर सकता है, जिसके लिए प्रकृति ने उसे उत्पन्न किया है। उसका मन निर्मल हो सकता है। रजोगुण तथा तमोगुण छूटने लगते हैं; और वह प्रकृति पर मुग्ध होने लगता है। उसके लिए जीवन का रूप बदल जाता है।…”
― हिडिम्बा
― हिडिम्बा
“यदि मेरे मन में से रजोगुण और तमोगुण सर्वथा निकल जायें तो वन के हिंस्र पशुओं तथा नरभक्षी राक्षसों के मन में भी मुझ पर आक्रमण करने का विचार नहीं आयेगा; और यदि आयेगा तो वे मुझ पर आक्रमण करने का साहस नहीं कर पायेंगे। यह ईश्वरीय नियम है पुत्र!”
― हिडिम्बा
― हिडिम्बा
“हमें प्रभु ने बनाया है वत्स! इसलिए बनाया है, क्योंकि हम उसके लिए उपयोगी हैं। जब तक उसके लिए हमारा कोई उपयोग है, वह हमारी रक्षा करेगा;”
― हिडिम्बा
― हिडिम्बा
“अपने ज्येष्ठ पुत्र के अविवाहित रहते, मैं अपने दूसरे पुत्र का विवाह नहीं कर सकती। हमारे समाज में इसे परिवेदन कहते हैं और उसे अधर्म माना जाता है।…” हिडिम्बा की आँखों में हताशा उतर आयी, “किन्तु मैं आपके ज्येष्ठ पुत्र से विवाह नहीं करना चाहती माता!”
― हिडिम्बा
― हिडिम्बा
